# Stop Calling Yourself Rational Just Because You’re an Atheist

## Метаданные

- **Канал:** Critical Thinking Forum
- **YouTube:** https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc
- **Дата:** 07.05.2026
- **Длительность:** 29:26
- **Просмотры:** 4,815

## Описание

In this video, we explore the relationship between atheism and rationality, arguing that while atheism is a necessary step towards rational thinking, it is not sufficient on its own. We learn the importance of critical thinking, emotional intelligence, and the need to question beliefs to achieve true rationality. We also discuss the cognitive biases that affect our reasoning and the importance of being open to changing one's views in light of evidence. The video highlights the journey from atheism to a more rational mindset, advocating for a life guided by evidence and inquiry rather than blind faith.
Takeaways
• Atheism is a necessary condition for rationality but not sufficient.
• Rationality requires constant questioning and inquiry.
• Faith often hinders the process of rational thinking.
• Emotional intelligence plays a crucial role in rational decision-making.
• Cognitive biases can lead to irrational beliefs.
• Critical thinking is essential for making informed decisions.
• One must be open to changing beliefs based on new evidence.
• The journey to rationality involves understanding one's emotional biases.
• Rational thinkers justify their beliefs with evidence before accepting them.
• Atheism can be a stepping stone to a more rational and fulfilling life

Chapters 
00:00 : The distinction between atheism and rationality
01:58:  Why atheism is a necessary but not sufficient condition for rational thinking
02:57:  The role of doubt, inquiry, and evidence in developing rational beliefs
12:08:  The influence of cognitive biases and system 1 (emotional) versus system 2 (logical) thinking
18:26:  Practical steps toward becoming a rational thinker: humility, evidence, and emotional awareness
23:11: How a real scientific mindset differs from mythological explanations
#Atheism #Rationality #CriticalThinking #Philosophy #Science #CognitiveBias #Logic #Psychology #EvidenceBased #System2Thinking #FreeThought #Skepticism #IntellectualHumility #Mindset #SelfImprovement #Debunking #EmotionalIntelligence #Inquiry #Secularism #TruthSeeking

## Содержание

### [0:00](https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc) The distinction between atheism and rationality

हेलो दोस्तों, मैंने एक चीज नोटिस की है कि जो लोग अपने को नास्तिक कहते हैं या एथस्ट कहते हैं, उनको अक्सर यह गलतफहमी हो जाती है कि वह अब रैशन हो गए हैं। क्योंकि गॉड पर विश्वास करना तो सबसे बड़ी इररेशनलिटी है और उन्होंने उस पर विजय पा ली है और इस वजह से वो रैशन हो गए हैं। दोस्तों, सिर्फ गॉड के आईडिया को ड्रॉप करना आपको रैशन नहीं बनाता। आपको क्रिटिकल थिंकर नहीं बनाता। और आज का जो वीडियो है उसमें हम इसी बात की चर्चा करेंगे कि रैशन बनने के लिए हमें क्या-क्या चीजें और करने की जरूरत है। हेलो दोस्तों, अक्सर जो है लोग यह समझते हैं कि एथिज्म जो है वो रैशनलिटी का इक्विवेलेंट है। जो आदमी नास्तिक है वो आदमी तार्किक भी है। यह बात सही नहीं है। क्योंकि अक्सर यह गलतफहमी क्यों होती है? क्योंकि जो व्यक्ति एथिस्ट होता है, उसने लॉजिक के बेसिस पे, रैशनलिटी के बेसिस पे, साइंटिफिक एविडेंस के बेसिस पे गॉड के आईडिया को ड्रॉप किया है। और इसीलिए उसको लगता है कि भाई मैं रैशन बन गया हूं। क्योंकि मैं आम जनता के पीछे की तरह नहीं हूं। मैं बिना सोचे समझे गॉड पे भी विश्वास नहीं करता। लेकिन दोस्तों यह कहानी सिर्फ आधी है। एथिज्म जो है वह आपका ग्राउंड क्लियर करता है। जिस पे आपने पुराना घर बनाया था जिस पे आपका पु्तैनी घर था जो कि जगह-जगह से था। जगह-जगह से प्लास्टर उखड़ रहा

### [1:58](https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc&t=118s) Why atheism is a necessary but not sufficient condition for rational thinking

था। कभी भी गिर सकता था। आपने उस घर को गिरा दिया। उस ग्राउंड को क्लियर कर दिया। लेकिन दोस्तों उससे आपकी प्रॉब्लम सॉल्व नहीं हुई। क्योंकि घर तो घर था। कम से कम आप वहां रह सकते थे ना। जब तक आप नया घर नहीं बनाएंगे उस जगह पे तब तक आपकी लाइफ मिज़रेबल रहेगी। इसलिए जो एथिज्म है वो पुराने घर को गिराने जैसा है। लेकिन रैशन बनना नए घर को बनाने जैसा है। जब तक आप नया घर नहीं बनाएंगे तब तक आपकी लाइफ बेकार होगी, वर्स होगी, बेटर नहीं होगी। दोस्तों सबसे इंपॉर्टेंट चीज है हमें यह जानना कि जो एथिज्म है वो नेसेसरी कंडीशन क्यों है और क्यों वो सफिशिएंट नहीं है? देखिए नेसेसरी कंडीशन इसलिए है क्योंकि जो एथिस्ट होता है वह जो भी चीजें उसको धर्म ग्रंथों से मिलती हैं ऐसी बहुत सारी चीजें जिसका कोई बेसिस नहीं है उसको उसने हटा

### [2:57](https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc&t=177s) The role of doubt, inquiry, and evidence in developing rational beliefs

दिया है उसको मानने से मना कर दिया है और अगर आप उन चीजों को मानते हैं तो आप कभी तार्किक हो ही नहीं सकते लेकिन सफिशिएंट इसलिए नहीं है क्योंकि हमारी जो इररेशनलिटी है उसका धर्म एक ही कारण है। मे बी बहुत बड़ा कारण है। लेकिन उसके अलावा जो है बहुत सारे कारण होते हैं जो हमें इररेशनल बनाते हैं। और जब तक हम लॉजिक एविडेंस या जो बायसेस है उसको अच्छे तरीके से नहीं समझते और हर एस्पेक्ट ऑफ लाइफ में उसका इस्तेमाल नहीं करते तब तक हम रैशन नहीं बन सकते। तो इस तरीके से जो एथिज्म है नास्तिकता है वो स्टेप वन है रैशन बनने के लिए। लेकिन सफिशिएंट नहीं है। अब क्यों नेसेसरी है? क्योंकि देखिए अगर आप विश्वास करते हैं कि धार्मिक किताबों में जो बातें लिखी हैं वह सही है। जैसे हनुमान जी ने सूरज को खा लिया। हनुमान जी पूरा पहाड़ उखाड़ करके वो हजारों किलोमीटर तक उड़ के चले गए। अगर आपको ऐसा लगता है कि प्रॉफेट मोहम्मद ने चांद के दो टुकड़े कर दिए। या जीसस क्राइस्ट ने पानी को शराब में कन्वर्ट कर दिया। अगर आप ऐसी चीजों पर विश्वास करते हैं तो आप कतई रैशन हो ही नहीं सकते क्योंकि यह चीजें असंभव हैं। जिस आदमी के अंदर 1% भी रैशनलिटी है वो इन चीजों को एक्सेप्ट नहीं कर सकता। लेकिन दोस्तों ऐसी बहुत सारी इररेशनल चीजें हैं जो कि धर्म से अलग भी हैं। जैसे एस्ट्रोलॉजी हो गई या बहुत सारे जो मेडिकल सिस्टम्स हैं जैसे कई बार होम्योपैथी या आयुर्वेद है या कास्परेसी थ्योरीज हैं या पॉलिटिकल या सोशल आईडियोलॉजीस होती हैं जो कि परफेक्टली रैशन नहीं है। और अगर आप गॉड को छोड़ के इन सब चीजों पर विश्वास करते हैं तब भी आप रैशन नहीं कहे जा सकते क्योंकि रैशनलिटी इंटीग्रेटेड चीज है। हर चीज पे लाइफ के वो फॉलो की जानी चाहिए। तो सबसे पहले हम जो मेन-मेन डेफिनेशन है उसके बारे में बात करते हैं। एथिज्म क्या होता है? एथिज्म कोई धर्म नहीं है। कोई सोच नहीं है। एथिज्म का सिर्फ एक मतलब है कि आप भगवान पे विश्वास नहीं करते। गॉड बस अगर आप करते आप एथिस्ट हैं। और फेथ का क्या मतलब होता है कि जब आप किसी भी चीज पे विश्वास करते हैं चाहे वो गॉड हो चाहे आईडियोलॉजी हो चाहे किसी टाइप का सूडो साइंस हो बिना किसी एविडेंस के और उसके खिलाफ में एविडेंस प्रेजेंट किए जाए तब भी आप उस पे विश्वास करते रहें तब वो बेसिकली फेथ होता है। जब आपको विश्वास करने के लिए एविडेंस की कोई जरूरत महसूस ना हो और बल्कि उसके खिलाफ में हजार एविडेंस भी दिए जाए तब भी अगर आपका विश्वास कायम है तो वो होता है फेथ। उसको हम कहते हैं माइथोलॉजी माइंडसेट। और दूसरे साइड में जो रैशन थिंकिंग होती है वो क्या होती है? जब आप किसी भी चीज को यकीन करने से पहले विश्वास करने से पहले एविडेंस की बात करें, लॉजिक की बात करें और अपना जो आपका विश्वास है उसको कांस्टेंटली अपग्रेड करते रहें, अपडेट करते रहें। जैसे-जैसे आपको फैक्ट्स मिलते हैं। जो रैशन पर्सन होता है, वह अपने को माइथोलॉजी माइंडसेट से हटा करके वो रियलिटी माइंडसेट में रहता है। आपको यह समझना पड़ेगा कि बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो गॉड पर विश्वास नहीं करते। लेकिन वो विश्वास करते हैं बहुत सारी सुपर नेचुरल चीजों पे जिसका कोई आधार नहीं है। तो हमें फर्क जानना पड़ेगा कि रैशन बिलीफ और इररेशनल बिलीफ में क्या फर्क होता है। दोस्तों इसके लिए चार्ल्स पियर्स हैं जो कि अमेरिकन प्रगमेटिज्म के फाउंडर माने जाते हैं। उन्होंने एक प्रोसेस बताया कि कैसे हम बिलीफ को फॉर्म करते हैं। उन्होंने कहा मान लीजिए आप किसी भी चीज पर विश्वास करते हैं। तो विश्वास क्या होता है? यह बेसिकली दुनिया को देखने का एक नजरिया होता है। जैसे मान लीजिए आप इस बात को विश्वास करते हैं कि अगर कोई भी बॉल गिरेगी नीचे तो उसको ग्रेविटी अट्रैक्ट करेगी और अगर आप साइंस के स्टूडेंट हैं तो आप जानते हैं उसका एक्सीलरेशन 9. 8 मीटर पर सेकंड स्क्वायर होगा। इसी तरह आप विश्वास कर सकते हैं कि गॉड जो है वह आपकी प्रेयर को सुनता है। न्याय करता है। आपको सही रास्ते पर ले जाता है। मुसीबतों से बचाता है। यह भी विश्वास की बात है। अब अगर कोई ऐसी घटना आपके सामने आती है, कोई ऐसा फैक्ट आता है जो उस विश्वास के ढांचे में फिट नहीं होता तब आपको डाउट क्रिएट होता है। जैसे बैलून है जो ऊपर जाने लगे या मान लीजिए कि कोई बच्चा है जिसकी कोई गलती नहीं है उसका किसी ने रेप और मर्डर कर दिया तो आपको लगता है कि भाई गॉड कहां है गॉड ने क्यों नहीं बचाया लोग तीर्थ यात्रा पे जा रहे हैं रोड एक्सीडेंट हो गया मर गए तो क्या होता है डाउट क्रिएट होता है आपके दिमाग में कि भाई ऐसा क्यों है उसको इरिटेशन ऑफ डाउट कहा जो नेक्स्ट स्टेज है। उसके बाद में क्या हुआ जब ऐसा होता है कि जब आपकी रियलिटी और विश्वास में मैच नहीं होता तो फिर आप क्या करते हैं इन्वेस्टिगेशन करते हैं इंक्वायरी करते हैं और पता करने की कोशिश करते हैं कि भई क्या प्रॉब्लम है क्यों ये चीजें मैच नहीं कर रही हैं और जब आप इंक्वायरी कर लेते हैं तो फिर क्या होता है जो उसका कंक्लूजन होता है वो आपको नया बिलीफ देता है कि हां भाई गॉड डज नॉट एक्सिस्ट या आपने देखा कि भाई जो बैलून ऊपर जा रहा है क्योंकि उसके अंदर हवा भरी हुई है इसलिए नहीं कि ग्रेविटी उसके ऊपर एप्लीकेबल नहीं है। अगर हवा की जगह पे उसको वैक्यूम में डाला जाए तो नीचे जाएगी। मतलब यह है कि फिर आप एक नए विश्वास पर पहुंचते हैं और फिर जब वो नया विश्वास है वो स्टेबल रहता है। आपके माइंड को पीस देता है। लेकिन जब फिर कोई ऐसी घटना आपके सामने आती है जो उस विश्वास से मैच नहीं करती तो फिर डाउट क्रिएट होता है और फिर इस तरीके से इंक्वायरी करके आप यह साइकिल आपका जिंदगी भर लगातार चलता रहता है। आप अपने बिलीफ को नॉलेज को अपग्रेड करते रहते हैं। तो एथिज्म या नास्तिकता क्यों जरूरी है रैशन बनने के लिए? और क्यों धार्मिक लोग रैशन नहीं हो सकते? क्योंकि देखिए जो फेथ होता है, धर्म होता है वो यह जो साइकिल से डाउट और इंक्वायरी का जो कंपोनेंट है उसको हटा देता है। उसको हाईजैक कर लेता है, डिलीट कर देता है। आप जो धर्म ग्रंथों में चीजें लिखी उसको डाउट ही नहीं कर सकते। और जब आप डाउट नहीं करेंगे तो इन्वेस्टिगेट नहीं करेंगे। क्योंकि आप इस बात को आंख बंद करके मान लेते हैं कि कोई चीज अगर नहीं हुई तो भाई भगवान जाने उसने ऐसा क्यों किया। गॉड वर्क्स इन मिस्टीरियस वेज़। आप नहीं जान सकते कि गॉड ने ऐसा क्यों किया। कुछ ना कुछ सोच के किया होगा और आप इंक्वायर नहीं करते। कहानी वहीं खत्म हो जाती है। तो इस तरीके से यह पूरे प्रोसेस को किल कर देता है। क्योंकि ना तो आप डाउट करेंगे ना आप इंक्वायरी करेंगे। तो जो बाप दादा ने आपको सिखा दिया जो धर्म ग्रंथों में पढ़ लिया उसपे आप आंख बंद करके विश्वास करते रहेंगे। और वह कभी चेंज नहीं होगा। लेकिन दोस्तों जो असली नॉलेज होती है उसके तीन कंपोनेंट होते हैं जस्टिफाइड ट्रू बिलीफ जिसको हम कहते हैं जेटीबी मॉडल मतलब कोई भी चीज उसको सही मानने के लिए या नॉलेज मानने के लिए नंबर वन वो सही होनी चाहिए ट्रू होनी चाहिए आपका जो बिलीफ है और उसको आप जस्टिफाई कर सकें अगर वह सच नहीं है और उसको आप जस्टिफाई नहीं करते तो वो नॉलेज नहीं मानी जाती है फेथ इस प्रोसेस उसको रिवर्स कर देता है। यह सबसे पहले जो आपकी बिलीफ है उसको सच मान लेता है। उस पे कोई क्वेश्चन नहीं है और फिर उसका जस्टिफिकेशन ढूंढता है। जबकि जो रैशन व्यक्ति है वो सबसे पहले जस्टिफिकेशन ढूंढता है। उसके बेसिस पर सच का निर्धारण करता है। यहां पे प्रोसेस उलट हो गया। जो फेथ होता है वो अथॉरिटी पर रिलाई करता है। एविडेंस पर रिलाई नहीं करता। उसको चाहे जितना डाटा दे दीजिए जो धर्म ग्रंथों में लिखा हुआ है वह उसी पर विश्वास करेगा क्योंकि जो फेथफुल व्यक्ति है जो धार्मिक व्यक्ति है उसके लिए तो सच पहले ही बता दिया गया है और वह सच वो है जो उसके धर्म ग्रंथों में लिखा हुआ है। तो इसलिए अगर आप यह मानते हैं कि कुछ ऐसे क्लेम्स हैं जिसको आप क्वेश्चन नहीं कर सकते हैं तो आप रैशन बन ही नहीं सकते। आपने रैशनलिटी की जर्नी खत्म कर दी। इसके पहले कि आप इस जर्नी को स्टार्ट करते हैं। तो इस तरीके से जो नास्तिकता है, एथिज्म है, यह नेसेसरी कंडीशन है रैशन बनने के लिए। धार्मिक हो के आप रैशन बन ही नहीं सकते। लेकिन यह सफिशिएंट नहीं है। क्योंकि यह फर्स्ट स्टेप है। आगे आपको बहुत सारी मंजिलें तय करनी है। क्योंकि जो हमारी इररेशनलिटी है, उसके बहुत सारे कारण हैं। गॉड सिर्फ एक कारण है। जैसे आप अगर नास्तिक भी हैं तो आप सूडो साइंस पर

### [12:08](https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc&t=728s) The influence of cognitive biases and system 1 (emotional) versus system 2 (logical) thinking

विश्वास कर सकते हैं। जैसे एस्ट्रोलॉजी हो गया, क्रिस्टल हीलिंग हो गया, क्वांटम हीलिंग हो गया, पाल्मिस्ट्री हो गया, वास्तुशास्त्र हो गया। उसी तरह आपका एक पॉलिटिकल डाग्मा हो सकता है कि जो मैं समझता हूं वही सही है। उसके लिए एविडेंस की जरूरत नहीं है। चाहे आप कम्युनिस्ट हो, चाहे आप कैपिटलिस्ट हो। वह भी एक तरीके से इरेशनलिटी है। फिर आपकी रीजनिंग जो है इमोशनल है कि जो मेरे दिल को लगता है वही सही है। जो सिस्टम वन है माइंड का जिसको मैं अभी आपको शॉर्टली बताऊंगा वो आपका डोमिनेट करता है सिस्टम टू को जो लॉजिकल माइंड है। जो आपको फील गुड है वही सही है और जो आपको फील बैड है वह गलत है। मतलब इमोशनली अगर कोई चीज सही लग रही है तो सही है। अदरवाइज गलत है। इसी तरीके से आप प्रोपोगेंडा के शिकार हो सकते हैं। जैसे हिटलर है वह तो एक तरीके से एथिस्ट ही था। लेकिन उसका जो रूल था उसने जो प्रोपोगेंडा किया उसने हर तरीके के लोगों को इन्फ्लुएंस किया। तो इस तरीके से आप अगर पॉलिटिकल प्रोपोगेंडा पे भी विश्वास करते हैं और उसको इन्वेस्टिगेट नहीं करते तब भी आप चाहे इररेशनल चाहे आप एथिस्ट हो आप तब भी इररेशनल हैं। तो दोस्तों अगर आपने गॉड को ड्रॉप कर दिया लेकिन हॉरोस्कोप को एक्सेप्ट कर लिया तो आपने एक बिना एविडेंस के विश्वास बिलीफ को छोड़ के दूसरे को एक्सेप्ट कर लिया तो आपका दिमाग स्मार्ट नहीं बन गया बेटर नहीं बन गया बल्कि वो उतना ही डंब रहा। बस उसकी जो डंबनेस है वह दूसरे साइड में कन्वर्ट हो गई। गॉड की जगह पे एस्ट्रोलॉजी या बाकी चीजों में कन्वर्ट हो गई। तो हमें समझना पड़ेगा कि जो हमारी रैशनलिटी है उसका सबसे बड़ा दुश्मन कौन है? सिस्टम वन। जब हमारा माइंड सिस्टम वन डोमिनेट करता है तो हम इररेशनल रहते हैं। अब ये सिस्टम वन क्या है? दोस्तों डेनियल कोलमैन है जो कि नोबेल लॉरेट रहे हैं इकोनॉमिस्ट में। उनकी एक किताब है थिंकिंग फास्ट एंड स्लो। उसके अंदर उन्होंने कहा कि हमारा माइंड दो सिस्टम में काम करता है। एक है सिस्टम वन जिसको उन्होंने कहा फीलिंग ब्रेन है जो कि इमोशनल ब्रेन है। चीजों को फील करता है। वो बड़ा फास्ट होता है। ऑटोमेटिक होता है। इमोशनल होता है। जो हमारे गट फीलिंग है, इंटशंस हैं ये वहां से आते हैं। यह जो माइंड है सबसे पहले विश्वास करता है। फिर उसको जस्टिफाई करता है। इसके विपरीत जो सिस्टम टू होता है, वह हमारा थिंकिंग या लॉजिकल ब्रेन होता है। जो स्लो होता है। हमें एफर्ट फुल्ली उस पे काम करना पड़ता है। तब हमें चीजें समझ में आती है, मेहनत करनी पड़ती है। वो लॉजिकल होता है। वो एविडेंस पे बेस्ड होता है। कैलकुलेशन वो डाउट करता है। इसके अंदर हम पहले चीजों को जस्टिफाई करते हैं। उसके बाद में हम विश्वास करते हैं। जस्टिफाई फर्स्ट बिलीव लेटर। अब ये जो हमारी जो क्रिटिकल इंसाइट है अगर हम एथिज्म को फॉलो करें नास्तिक बन जाएं तो हमने सिस्टम वन का एक शॉर्टकट हड़ा दिया गॉड का जब हम मानते थे हर चीज गॉड कर रहा है लेकिन बाकी हजार ऐसे सिस्टम हो सकते हैं 100 जो अभी भी हमारे माइंड में हैं और वो हमें इररेशनल बनाएंगे तो जो नास्तिक होता है अपने गॉड मोड को तो स्विच ऑफ कर देता है लेकिन उसका ट्राइबल मोड हो सकता है। उसका एंगर होप मोड हो सकता है। उसका फियर मोड हो सकता है। और वो सारी चीजें ऐसी हैं जो उसके माइंड को ओवराइट कर सकती हैं और उसको गलत रास्ते पर ले जा सकती हैं। अब हम इसको एक सिंपल केस स्टडी के माध्यम से देखते हैं। दो व्यक्ति हैं एक रैशन एथिस्ट है और एक इररेशनल एथिस्ट है। दोनों एथिस्ट हैं। दोनों नास्तिक हैं। एक रैशन है, एक इररेशनल है। अब जब हम गॉड के बारे में क्लेम करेंगे तो दोनों यह कहेंगे कि वो गॉड पर विश्वास नहीं करते क्योंकि गॉड को कोई एविडेंस नहीं है। यहां पर दोनों एकमत है। लेकिन अगर मान लीजिए वैक्सीन पर बात हो गई कोविड वैक्सीन की बात हुई तो जो रैशन एथिस्ट है वो यह कहेगा कि भाई जो रैंडमाइज कंट्रोल ट्रायल होते हैं, आरसीटी होते हैं उसके डाटा देखते हैं। इसमें क्या रिस्क है, क्या बेनिफिट है, उसके बेसिस पर हम डिसाइड करेंगे कि जो वैक्सीन का क्लेम है, सही है कि नहीं है। वहीं पर जो इररेशनल एथिस्ट होगा, वो कहेगा यह जो बड़ी-बड़ी फार्मा कंपनीज़ हैं, वह सब डेविल हैं। सिर्फ पैसा कमाना चाहती हैं। उनको जनता से कोई मतलब नहीं है। इसलिए वैक्सीन लोगों को मारती है, वैक्सीन किल करती है, नुकसानदेह होती है। उनको डाटा से मतलब नहीं है। उसी तरीके से मान लीजिए कि पॉलिटिकल क्लेम की बात होती है। जैसे रिजर्वेशन हो गया या फ्री बी हो गया जो लोग फ्री में दे रहे हैं आजकल पॉलिटिकल पार्टीज तो जो रैशन एथिस्ट है वह कहेगा कि ठीक है मुझे डाटा दिखाओ इस पॉलिसी का क्या फायदा हुआ क्या नुकसान हुआ उसको लॉजिकली दोनों साइड सुन करके वो डिसाइड करेगा लेकिन वहीं पे जो इररेशनल एथस्ट है वो यह कहेगा कि भाई अगर वो काम उसकी पार्टी कर रही है तो सही है और दूसरी पार्टी करे तो गलत है तो जो काम मेरी पार्टी कर रही है वो सही कर रही तो उसके पास में कोई जस्टिफिकेशन नहीं है। तो क्या मेथड फॉलो करते हैं ये दोनों तरीके के लोग? जो रैशन एथिस्ट होते हैं वो डाउट होता है। फिर वो इंक्वायरी करते हैं और इंक्वायरी करने के बाद में बिलीफ को फॉर्म करते हैं और उसको कांस्टेंटली अपग्रेड करते रहते हैं। अपडेट करते रहते हैं। वहीं पे जो इररेशनल एथिस्ट होते हैं वो जब डाउट उनको होता है तो वो इमोशनल बेसिस पे अपने बिलीफ को फॉर्म करते हैं और उसको फ्रीज़ कर देते हैं। उसको कभी चेंज नहीं करते हैं। तो ये एक बड़ा मेजर डिफरेंस होता है दोनों टाइप के एथिस्ट में। तो दोस्तों किस तरीके से हम प्रॉपर रैशन पर्सन बन सकते हैं तो हमें एथिज्म के अलावा कुछ और चीजें करने की जरूरत है। अगर हम उसको करेंगे तभी जो है हम रैशन पर्सन बन सकते हैं। तो सबसे पहली बात यह होती है जिसको हम कहते हैं इपेस्टमिक ह्यूमिलिटी। इसका मतलब यह होता है कि आप हंबल बने रहें।

### [18:26](https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc&t=1106s) Practical steps toward becoming a rational thinker: humility, evidence, and emotional awareness

रहें। आप इस बात को एक्सेप्ट करें कि भाई मैं गलत हो सकता हूं। आप डाउट को इनवाइट करें। अगर मान लीजिए आप कहते हैं भ गॉड नहीं है तो जो लोग एविडेंस दे रहे हैं उनको आप ओपन माइंड तरीके से एग्जामिन करें कि क्या उनके एविडेंस में कुछ दम है? और ऐसे कुछ एविडेंस अगर आपके सामने आ जाते हैं जिसका कोई जवाब नहीं है साइंटिफिक कम्युनिटी के लिए तो फिर आप उस बात को पार्टली एक्सेप्ट भी कर सकते हैं। अगर आप रैशन बनना चाहते हैं तो आपको जेटीबी या जस्टिफाइड ट्रू बिलीफ को रिगरसली फॉलो करना होगा। किसी भी नॉलेज को आप तब तक विश्वास ना करें जब तक वह सच हो और उसका प्रॉपर जस्टिफिकेशन हो। कोई शॉर्टकट जो है आप ना माने। इसके लिए आपको सीखना पड़ेगा लॉजिक क्या होता है? आर्गुमेंट्स कैसे किए जाते हैं? रीजनिंग कैसे की जाती है? लॉजिकल फैलेसी क्या होती हैं? इस चीजों को सीखे बिना आप प्रॉपर जस्टिफिकेशन नहीं कर पाएंगे। क्योंकि जो स्मार्ट लोग होते हैं वो फैलेसियस लॉजिक से आपको कन्विंस कर सकते हैं कि यह चीज सही है। तो लॉजिकल फैलेसी का ज्ञान होना बहुत जरूरी है। उसके बाद में बायस ट्रेनिंग की बहुत जरूरत है। आपको ये समझना पड़ेगा कि हम सब इमोशनल क्रिएचर हैं। और जो भी इमोशनल क्रिएचर होते हैं उनके इमोशनल बायसेस होते ही होते हैं। उसी तरीके से हम क्विक डिसीजन लेना चाहते हैं। यह ब्रेन का मैकेनिज्म है, नेचर का विधान है कि हम एनर्जी को बेस्ट तरीके से यूज़ करना चाहते हैं। और इसीलिए आपको पता होना चाहिए कि आपकी जो इमोशनल वीकनेसेस क्या हैं? इमोशनल बायसेस क्या है? प्रजुडिसेस क्या हैं? ताकि आप प्रोपोगेंडा जो हो रहा है उसको आप समझ सकें। इसके लिए आपको कॉग्निटिव बायोसेस के बारे में जानकारी करने की जरूरत है। अगर आप कॉग्निटिव बायोसेस को स्टडी नहीं करेंगे तो आप समझ ही नहीं पाएंगे कि हमारा माइंड किस तरीके से इररेशनल तरीके से काम करता है। और मैंने आपको जैसे बताया कि कॉग्निटिव बायोसेस डेनियल कोलमैन ने जो रिवील किया मुश्किल से 50-60 साल पहले उनको नोबेल प्राइज मिला है। इतना ज्यादा इंपॉर्टेंट है हमारी लाइफ में। उसके बाद में दोस्तों इमोशनल डोमिनेंस को हमें समझने की जरूरत है। ऑस्कर वाइल्ड ने उन्होंने कहा था कि यूज इमोशंस डोंट बी एट देयर मर्सी। इमोशंस के मास्टर आप बने, इमोशंस के नौकर ना बने। और इसके लिए जरूरी है कि आप इमोशनल इंटेलिजेंस को डेवलप करें। अपने रैशनलिटी को इतना बढ़ाएं, रैशन माइंड को इतना स्ट्रांग करें कि वो इमोशंस को कंट्रोल करें बजाय इसके कि जो आपकी इंटेलेक्ट है वो इमोशंस से कंट्रोल हो। तो इसलिए आपको जरूरी है कि इमोशनल इंटेलिजेंस को बढ़ाएं ताकि इमोशंस को आप कंट्रोल में रखें। उसके बाद में दोस्तों फाल्सी फायबिलिटी बहुत जरूरी है जो कि साइंट्स का बहुत इंपॉर्टेंट प्रिंसिपल है। जब आप किसी भी बात को बताते हैं तो आपको यह बताना पड़ेगा कि अगर ऐसा होता है तो मैं मान लूंगा कि मैं गलत हूं। मतलब जो भी बात आपने क्लेम की उसको गलत कैसे प्रूफ किया जा सकता है। अब जैसे मान लीजिए कि मैं कहता हूं भाई ठीक है अगर आप मुझे डेमोंस्ट्रेट कर दो कि कोई आदमी पानी पर चल सकता है तो मैं मान लूंगा भगवान है या कोई आदमी मुर्दे को जिंदा कर सकता है तो मैं मान लूंगा भगवान है। तो इस तरीके की चीजें कि जो क्लेम्स की गई हैं जिसके बेसिस पर आपने डिसरगार्ड किया है या मना किया है अगर कोई व्यक्ति प्रूफ कर देता है तो फिर आप उस बात को एक्सेप्ट करें और अपने व्यूज को गलत मान लेंगे जिसको हम फॉल्सिफायबिलिटी का क्लेम कहते हैं जो बहुत जरूरी है। तो दोस्तों एथीस में जो है एक तरीके से ऐसा है कि जैसे कि आप सिगरेट पीते हैं, शराब पीते हैं, आपने छोड़ दिया। बहुत अच्छी बात है। अगर आप मान लीजिए मैराथन रनर बनना चाहते हैं। टॉप स्पोर्ट्समैन बनना चाहते हैं तो डेफिनेटली अगर आप स्मोकिंग छोड़ देंगे आपको फायदा होगा। लेकिन इससे आप मैराथन रनर नहीं बन पाएंगे। उसके लिए जरूरी है कि आप रोज प्रैक्टिस करें। तो इसी तरीके से जब आप एथिस्ट होते हैं तो आप एक तरीके से पहला बड़ा इंपॉर्टेंट स्टेप आपने ले लिया। लेकिन उसके बाद में भी बहुत मंजिल आपको कवर करनी जरूरी है। दोस्तों, कई बार लोग यह कहते हैं कि साहब जो रिलीजियस लोग हैं उन्होंने तो साइंस के बड़े-बड़े इन्वेंशंस किए हैं। तो कैसे आप कह सकते हैं कि जो रिलीजियस लोग हैं वो रैशन नहीं होते। देखिए यह बात सही है कि बहुत सारे साइंटिस्ट जो हैं उन्होंने बहुत जो बड़े-बड़े इन्वेंशंस किए हैं वो भी गॉड पे विश्वास करते थे।

### [23:11](https://www.youtube.com/watch?v=Xz2UxVhxkEc&t=1391s) How a real scientific mindset differs from mythological explanations

लेकिन जब वह साइंस प्रैक्टिस करते थे तो उस समय गॉड के जो कांसेप्ट है उसको उन्होंने सस्पेंड कर दिया था। उस समय वह गॉड को पे विश्वास नहीं करते थे। जैसे अगर हम न्यूटन की बात करें तो जब उन्होंने मान लीजिए ग्रेविटी उन्होंने देखा ऑब्जरवेशन किया। फिर उन्होंने इंट्यूशन से सोचा भाई ऐसा क्यों हो रहा था। फिर उन्होंने हाइपोथेसिस बनाई और उसके बाद में उससे उन्होंने ये कंक्लूजन ड्रॉ किया कि भ कोई ग्रेविटी एग्जिस्ट करती है। फिर उसके बाद में उन्होंने एक्सपेरिमेंट किया। मैथ्स का इस्तेमाल किया कि किस तरीके से ग्रेविटी का अस्तित्व है उसको मेजर कैसे किया जाए। यहां पर उन्होंने धार्मिक या गॉड का नहीं सहारा लिया कि गॉड गिरा रहा है या ईश्वर जो चाहता है वही होता है। आपको समझना पड़ेगा कि जिस पीरियड में न्यूटन थे उस समय बिग बैंग थ्योरी का डिस्कवरी नहीं हुआ था जिससे पता चले यूनिवर्स कैसे बना या डार्विन का जो इवोल्यूशन का प्रिंसिपल है नहीं पता चला जिससे पता चले कि लाइफ कैसे क्रिएट हुई या लाइफ कैसे ग्रो करी अगर ये सारी बातें न्यूटन को पता होती तो शायद वो भी गॉड पे विश्वास नहीं करते हैं। तो जो रियलिटी माइंडसेट होती है वो हाउ पे फोकस करती है। जबकि जो माइथोलॉजी माइंडसेट है वह वाई पे फोकस करती है। अब कैसे? अब जैसे कि मान लीजिए कि कोई आदमी मर गया तो जो माइथोलॉजी माइंडसेट का आदमी रहेगा। इररेशनल व्यक्ति रहेगा। वो कहेगा भाई ईश्वर की मर्जी थी। चला गया। इसका समय पूरा हो गया। व्हाई? बिकॉज़ गॉड बिल्ड इट। ईश्वर चाहते थे। जबकि साइंस क्या करेगा? इस पे आएगा हाउ कैसे उसकी डेथ हुई? हार्ट फेल होने से हुई, डायबिटीज से हुई, गोली लगने से हुई वो उस पे जाता है। यह फर्क है। जो मॉडर्न साइंस है देखिए वो हाउ पे फोकस करती है। वाई पे फोकस नहीं करती है। वो यह कहती है भ ग्रेविटी क्या है? कितनी है? वो इस बात पे ग्रेविटी आई क्यों? उससे उसको मतलब नहीं है। वह सवाल इंपॉर्टेंट है। लाइफ का क्या पर्पस है? इन सब चीजों के चक्कर में यह माइथोलॉजी वाले पड़ते हैं। उसको रियलिटी पे फोकस करना है। तो दोस्तों जो आप रिलीजियस होकर के भी एक अच्छे साइंटिस्ट हो सकते हैं। अगर आप अपनी रिलीजियस फीलिंग को और रैशनलिटी को कंपार्टमेंटलाइज कर दें कि जब आप लैब में जाएं तो साइंटिस्ट की तरह सोें और बाहर मंदिर में जाएं तो एक रैशन व्यक्ति की तरह इरशनल व्यक्ति या धार्मिक व्यक्ति की तरह सोें। लेकिन अगर आप इन दोनों जो फैकल्टीज हैं इनको कंपार्टमेंटलाइज करते हैं तो आप रैशन नहीं। जो रैशन व्यक्ति होता है उसमें यह दोनों चीजें इंटीग्रेटेड रहती हैं। मतलब आपके दो माइंडसेट नहीं है। आपका एक ही माइंडसेट है और वो है रियलिटी माइंडसेट। वहां पे कोई फर्क नहीं आपके प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ में। क्योंकि जो साइंटिफिक प्रिंसिपल्स हैं, जो लॉजिक है, रीजन है, उसका आप जिंदगी के हर फील्ड में इस्तेमाल करते हैं। तो दोस्तों, इसलिए हमें अगर हम एथिस्ट बन गए, नास्तिक बन गए, तो हमने बहुत इंपॉर्टेंट स्टेप लिया। लेकिन वहां से हमें जर्नी तय करनी है रैशन बनने की। तभी हमारी जिंदगी बेटर होगी। एथस्म में जो है वो फेथ बेस्ड कंक्लूजन जो होते हैं कि गॉड ने यह किया उन चीजों को हटा देता है जो कि बहुत नेसेसरी है क्योंकि फिर हम रैशन कंक्लूजन की तरफ जाते हैं। साइंटिफिक लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग बहुत जरूरी है ये जानने के लिए कि एविडेंस बेस्ड मेथड से हम कंक्लूजन कैसे ड्रॉ करें और वो बहुत जरूरी है अगर हम रैशन थिंकर बनना चाहते हैं। तो सवाल उठता है कि हम कैसे जाने कि हम रैशन बन गए हैं? आपको इसके लिए एक सिंपल टेस्ट करना है कि आपके जो व्यूज हैं पॉलिटिक्स के बारे में, हेल्थ के बारे में, रिलेशनशिप्स के बारे में क्या आप उनको चेंज करने के लिए तैयार हैं? अगर आपको नए फैक्ट्स प्रेजेंट किए जाएं? अगर इसका जवाब है हां, तो इसका मतलब कि आप रैशन हैं और अगर इसका जवाब है ना, तो इसका मतलब कि रैशन हैं आप। फिर आप ऑस्कर वाइल्ड का टेस्ट यूज कर सकते हैं कि क्या आपके इमोशंस डोमिनेट करते हैं आपको या आप इमोशंस को डोमिनेट करते हैं। अगर आपका हैं तो आप रैशन हैं। तो दोस्तों इस तरीके से जो एथिज्म है वो हमारे आंखों के सामने जो कोहरा है उसको हटा देता है ताकि हम दूर तक की चीजों को बहुत ही अच्छे तरीके से देख सकें। लेकिन सड़क तो आपको खुद बनानी पड़ेगी। रास्ता आपको खुद बनाना पड़ेगा। चलना भी आपको खुद पड़ेगा। तभी आप रैशन बन पाएंगे। अगर हम पुराने एग्जांपल की बात करें तो एथज में बनके आपने पुराना जो जीर्णसीर्ण मकान था उसको तो डिमोलिश कर दिया लेकिन अब आपको नया मकान बनाना है रैशनलिटी के माध्यम से। जहां पर आप रहेंगे जहां पे आप एक अच्छी जिंदगी जिएंगे। तो दोस्तों फाइनली हमें इस बात को समझना है कि नास्तिक होने से आप सही नहीं हो जाते। आप रैशन नहीं हो जाते। अगर आप चाहते हैं कि आप वाकई में एक रैशन पर्सन बने, जिंदगी के सारे फैसले रैशन बेसिस पे लें, तो आपको क्रिटिकल थिंकिंग की जरूरत है। उसके सारे टूल्स को मास्टर करने की जरूरत है। जैसा मैंने इस वीडियो में बताया है। तभी आपको पता चलेगा कि सही क्या है, गलत क्या है। उसके बाद जब आप डिसीजंस लेंगे तो आपके ज्यादातर डिसीजंस सही होंगे और बहुत कम डिसीजंस गलत होंगे। और आप दोनों तरीके के डिसीजन से सीखेंगे क्योंकि सही डिसीजन से आपको पता चलेगा आपको क्या करना है। गलत डिसीजन से नहीं करना है। और इस तरीके से आगे बढ़ के जिंदगी में जो आपकी गलतियां हैं वो कम हो जाएंगी। सही डिसीजंस सही हो जाएंगे। ज्यादा होंगे और आप जिंदगी में ज्यादा सफल हो पाएंगे। तो दोस्तों आज का वीडियो आपको कैसा लगा और आप अपने कमेंट दें। अपने विचारों को शेयर करें और इस बात को समझ लें कि नास्तिक होना सफिशिएंट नहीं है। आपको अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है। अगर आप वाकई में एक रैशन पर्सन बनना चाहते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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*Источник: https://ekstraktznaniy.ru/video/50242*