# The Education Scandal in India: A Teacher Tells All

## Метаданные

- **Канал:** Critical Thinking Forum
- **YouTube:** https://www.youtube.com/watch?v=sxf2kdMWl0M
- **Дата:** 02.05.2026
- **Длительность:** 45:52
- **Просмотры:** 44,135
- **Источник:** https://ekstraktznaniy.ru/video/50243

## Описание

In this episode, we explore the deep-rooted issues plaguing India’s education system, with thoughtful insights from Dr. Dharmpal Singh, a retired English professor and education expert. Discover how systemic reforms, character-building, and technology integration can foster better learning outcomes and societal progress.
Key Topics
• The decline in quality of government schools over the past decades
• The role of coaching centers and privatization in education quality
• Shortcomings of assessment methods and evaluation systems
• The importance of teacher dedication, character, and system reforms
• The impact of family environment and societal values on students
• How technology can enhance education access and quality
• The need for systematic policy changes for sustainable improvement
• India's position in global innovation and creativity compared to the West
• The significance of moral and scientific temper in education
Chapter Timestamps
00:00:00 - Introduction and guest credentials

## Транскрипт

### Introduction and guest credentials: Dr. Dharmpal Singh's contributions []

तो मैं आपको अपना पर्सनल एक्सपीरियंस बताऊंगा इवैल्यूएशन का एक कि 2008 में जौनपुर विश्वविद्यालय की परीक्षा में जो कॉपियां हमने जांची थी उसमें जिनको जीरो मिला था उनको दो और दो पेपर्स में 55 56 मिले उस समय कोचिंग करना तो एक शर्म की बात मानी जाती थी अगर कोई कोचिंग कर रहा है इसका मतलब ये बड़ा वीक स्टूडेंट है ट्यूशन पढ़ना भी बड़ी [गला साफ़ करने की आवाज़] शर्म की बात मानी जाती थी ये गुरु नहीं है ये सब नौकर है इनका जब तक हंटर्स लेकर के कोई खड़ा होके काम नहीं करेगा रहेगा तब तक बिल्कुल कुछ भी नहीं हो सकता है। कोई [घंटी की आवाज़] हेलो दोस्तों, क्रिटिकल थिंकिंग फोरम पर आपका स्वागत है। दोस्तों, आज हमारे गेस्ट हैं डॉ. धर्मपाल सिंह साहब। आप जो हैं एक रिटायर्ड एसोसिएट प्रोफेसर हैं इंग्लिश डिपार्टमेंट के गणपत सहाय पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज सुल्तानपुर के। आपने बहुत सारी किताबें लिखी हैं। जैसे कि फिलॉसफी पर आपने लिखा हुआ है जर्नी थ्रू दी लाइफ डिवाइन जो कि अरविंदो जी के ऊपर है। उसके अलावा ए किंग विदाउट होम विलेज गॉड्स और उसके अलावा आपने इंग्लिश पे भी किताबें लिखी हैं। मास्टरिंग इंग्लिश क्योंकि यह इंग्लिश डिपार्टमेंट में प्रोफेसर थे। तो इस वजह से इनकी जो इंग्लिश की नॉलेज है वो काफी परफेक्ट है। बट इसके बावजूद इन्होंने ऑलमोस्ट जितनी किताबें लिखी हैं, उसका उन्होंने हिंदी वर्जन भी निकाला है। और हिंदी के लिए बहुत ही डेडिकेटेड आप रहे हैं। और बहुत सारे सोशल वर्क में आपका एसोसिएशन रहा है जिससे कि हमारा जो कल्चरल अपलिफ्टमेंट हो और हमारा इंटेलेक्चुअल अपलिफ्टमेंट हो और जो हम सोसाइटी के लिए कर सकते हैं उनको एक बेटर सिटीजन बनाने के लिए उस डायरेक्शन में आप बहुत सालों से काम करते रहे हैं। तो डॉक्टर साहब आपका बहुत-बहुत स्वागत है हमारे प्लेटफार्म पर और आपने अपना समय दिया इसके लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। धन्यवाद। तो डॉक्टर साहब हम बेसिकली जो आज चर्चा करने जा रहे हैं उसका जो मेन हमारी जो थीम है वो है हमारे देश की जो शिक्षा व्यवस्था है, जो एजुकेशन सिस्टम है, उसके अंदर क्या

### Historical perspective: Previous standards in education and evaluation [2:25]

कमियां है? क्योंकि आप उस फील्ड में कई दशकों तक इनवॉल्व रहे हैं। आपने बहुत ही क्लोज इसको देखा हुआ है और डेफिनेटली आपने इसके अंदर कुछ कमियां और कुछ अच्छाइयां महसूस की होंगी। तो हम उसको कैसे दूर कर सकते हैं? यह बेसिकली हमारा आज का टॉपिक है। तो सबसे पहले मैं आपसे जानना चाहता हूं कि जो आज के समय हम देखते हैं एग्जामिनेशन में तो साहब जिसको देखिए वो 90% 95% नंबर लेकर के एग्जाम में आ रहा है। मतलब आप बोर्ड का रिजल्ट आप कभी भी देखें किसी भी बोर्ड का। हम लोगों का जो समय था आपका तो उससे भी पहले का समय है। उसमें फर्स्ट डिवीजन लाना ही बहुत बड़ी एक अचीवमेंट मानी जाती थी और मुश्किल से 30 35% लोग पास हुआ करते थे और फर्स्ट डिवीजन तो बहुत ही रेयर हुआ करती थी और 75% नंबर लाने वालों को विद ऑनर्स कहा जाता था कि साहब आप विद ऑनर्स पास हो गए। वह तो एक्सेप्शनली लोग बहुत ब्रिलियंट होते थे तब आते थे। और जो पूरे स्टेट की जो मेरिट होती थी उसके जो टॉपर्स हुआ करते थे वो 80-85% नंबर पर वो लोग पूरे स्टेट में टॉप कर जाते थे। आजकल हम लोग देखते हैं साहब कि 90% 95% और 99% तक लोगों के नंबर आते हैं। तो पहले तो मैं जानना चाहता हूं कि ये आपका क्या व्यू है कि क्या वाकई में हमारे देश में एजुकेशन जो है प्रणाली में इतना सुधार हुआ है कि लोगों के इतने अच्छे नंबर आने लगे हैं। पहले के मुकाबले में अब सिस्टम बहुत अच्छा हो गया है। या आप कुछ और कारण देखते हैं कि जिसकी वजह से इतने ज्यादा नंबर आते हैं। लेकिन एक्चुअली जो

### The impact of systematic evaluation and the pitfalls of mark-centric assessment [4:00]

स्टूडेंट पास करते हैं उनके पास में शायद उतना ज्ञान नहीं है जितना कि पहले अह समय में होता है या फिर जैसा हम उससे एक्सपेक्ट करते हैं कि जो 95 या 99% नंबर लेके आ रहा है उसके इतना ज्ञान उसके अंदर होना चाहिए। देखिए सबसे पहले तो यह कहना चाहूंगा कि यह शिक्षा जो है व्यवसाय बना दी गई है। लॉर्ड मैकाले जब आए तो उनको जो है क्लर्क की जरूरत थी तो उन्होंने अपने हिसाब से कैसे उस मानसिकता वाले लोगों को बनाने के लिए वो शिक्षा का पैटर्न उन्होंने लागू किया। जी जो बात आप ये कह रहे हैं कि 90% [गला साफ़ करने की आवाज़] 99% उनहीं परीक्षाओं में यदि आप देखें तो जो यूपीएससी की परीक्षा है उस साल उसमें 52. 8% पे टॉप किया है। बिल्कुल सही कह रहे हैं। तो ये मैं कैसे कहूं कि जो इवैल्यूएशन हो रहा है वो बहुत सही है। उसमें इवैल्यूएशन की हालत यह है कि अब एक होड़ लगी है कि जितना परसेंट नंबर आएगा उसमें एडमिशन होंगे और एडमिशन जैसा मैंने पहले बताया व्यवसाय जी वो हर कॉलेज में हर यूनिवर्सिटी में वो कितना पैसा मिल जाएगा तो जितना ज्यादा स्टूडेंट है स्टूडेंट के पेरेंट्स जो है वो मार्कशीट देके वो चमत्कृत होते हैं कि 90% 95% 99% तो मैं आपको अपना पर्सनल एक्सपीरियंस बताऊंगा इवैलएशन का एक कि 2008 में जौनपुर विश्वविद्यालय की परीक्षा में जो कॉपियां हमने जांची थी उसमें जिनको जीरो मिला था उनको दो और दो पेपर्स में 55 56 मिला था लड़कों ने मेरे लड़के लड़कों ने मेरे ऊपर केस कर दिया इलाहाबाद हाई कोर्ट में 2009 और मैं वहां गया तो जज जो है उनको लगा कि ये कैसे हो गया ये इंग्लिश में आप जीरो दे रहे हैं मैथ फिजिक्स है खैर होते अंतगत तो हुआ कि क्या आप वो 55 6% जो बच्चे पाए हैं उस पेपर को यहां कोर्ट के बीच प्रमाइस में आप चेक करेंगे चेक कर देंगे दो कॉपी दिया उन्होंने हम तो एक कॉपी में देता मैं जीरो किसी का कुछ नहीं था लेकिन अब वो परेशानी थी कि जीरो देने पर चिल्लाहट हो रही थी तो मैंने दो नंबर देके कॉपी भेज दिया वहां तो जज ने कहा कि स्टॉप उसके बाद उन्होंने कहा कंट्रोलर कौन है साहब खैर होते ब्रीफली बताऊ कि मैं ससम्मान हाई कोर्ट से बरी हुआ। मेरा ही इवैल्यूएशन माना गया कि यही सही इवैलएशन। अब आप बताइए जो आप बात कह रहे हैं उसका क्या सेंस है? कितना नंबर किसको मिला है, क्या मिला है, कैसे मिला है? उसकी कौन सी बात की जाए? तो सारा इवैल्यूएशन जो है वो केवल वो हो रहा है। आप विश्वविद्यालय के जो कंट्रोलिंग रूम है जाके देख लीजिए। वो सब कॉपी खोलते हैं और कुछ लोग तो कॉपी भी नहीं खोलते हैं। तो कहां सब हां

### The decline of government schools and quality of private coaching centers [7:00]

देखिए इसमें मैं बेसिकली जैसे मैं जैसे हम लोग अपने समय की बात करते हैं। मेरा जो समय था 1983 में जैसे मैंने 12th पास किया था। अब उस साल हमारे जो बोर्ड में नंबर थे वो 70% करीब नंबर थे। मैं गवर्नमेंट जुबली इंटर कॉलेज में पढ़ता था। ओवरऑल जो नंबर थे वो 70% थे। हम पीसीएम में करीब 80% नंबर थे हम और हमारे सेक्शन से करीब सात बच्चे थे जो फर्स्ट क्लास पास हुए थे मतलब 60% के अबव हम और जिसमें से पांच का जो है वो आईआईटी के अंदर एडमिशन हो गया था हम क्योंकि उस समय जो बोर्ड के अंदर जो पैटर्न था उनका यूपी बोर्ड का वो कॉम्पिटिटिव एग्जाम से मैच करता था बिल्कुल और उसका लेवल भी ऐसा था कि मैचिंग था और दोनों साल का पेपर आया करता था जैसे 12th में आप जाएंगे तो दोनों साल 11th और 12th का पेपर पर आता था। तो हम लोगों का जो बैच था उसमें प्रैक्टिकली किसी ने कोई कोचिंग ज्वाइन नहीं की थी। उस समय कोचिंग-वचिंग का कोई प्रचलन नहीं हुआ करता था। और सब लोग अपनी मेहनत करके जो है वो आईआईटी में निकल जाते थे। जब हमने सिविल सर्विज दिया, यूपीएससी दिया उस समय भी कोचिंग का प्रचलन नहीं होता था। अब मैंने ये देखा है कि विगत कुछ सालों में कुछ इस तरीके से पैटर्न हुआ कि जो बोर्ड में नंबर लाना बड़ा आसान होता चला गया। पेपर बड़े आसान हो गए और यहां तो लोग ले आते हैं 95% और 99% लेकिन अगर हम उनकी एक्चुअल नॉलेज की बात करें या कॉम्पिटिटिव एग्जाम की बात करें तो पता चला कि उनका किसी भी कंपटीशन में आईआईटी में सिलेक्शन नहीं होगा या कहीं भी नहीं होगा तो उस फिर उसकी वजह से धीरे-धीरे करके कोचिंग कल्चर स्टार्ट हो गया। ये कोचिंग कल्चर 30-40 साल पहले नहीं होता था जब हम लोग करते थे। उस समय कोचिंग करना तो एक शर्म की बात मानी जाती अगर कोई कोचिंग कर रहा है इसका मतलब कि बड़ा वीक स्टूडेंट है। ट्यूशन पढ़ना [गला साफ़ करने की आवाज़] भी बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी। आज का समय अगर आप देखिए तो बिना कोचिंग किए हुए किसी भी इंजीनियरिंग कॉलेज में या किसी भी एसएससी, यूपीएससी या कोई भी आप कॉम्पिटिटिव एग्जाम लीजिए तो उसमें कोचिंग कॉलेजेस का बाल्य हो गया। मतलब वो तो हजारों लाखों करोड़ का बिजनेस हो गया है और वहीं पे जो एजुकेशन सिस्टम है जो हमारे स्कूलों में है चाहे प्राइवेट स्कूल भी ले लें उसका लगातार डिक्लाइन हुआ है। तो ये जो कोचिंग सेंटर का जो एक कल्चर बना है और तरीके से उत्थान हुआ है उसके लिए भी हमारी एक तरीके से शिक्षा व्यवस्था जिम्मेदार है कि जब हम क्वालिटी चीज नहीं कराएंगे तो फिर ऑटोमेटिकली वो बच्चे फिर वहां पे जाएंगे कॉम्पिटिटिव एग्जाम के लिए। तो इसके बारे में आपका क्या वो है? क्योंकि कोचिंग तो हर एक आदमी अफोर्ड नहीं कर सकता और अच्छी शिक्षा सबको मिल नहीं रही है। तो ऐसे सिचुएशन में कैसे विद्यार्थी जो है आज के समय में सफलता को पाए? देखिए मैं पहले तो आपको यह बताना चाहूंगा कि यह कोचिंग सेंटर्स जो है इनको क्वालिटी से कोई मतलब नहीं है। इनको भी क्वांटिटी चाहिए और कई बार रिजल्ट्स आते हैं जब आईएस के जिसके तो उसमें जो है हर कोचिंग वाला पता चलता है कि वो 10-10 कोचिंग वालों सब एक जगह हम एक मतलब सबके यहां वो पढ़े हैं। 10 कोचिंग में वो लड़का जो आईएएस हुआ है वो पढ़ा है। एक मैं पर्सनल एक्सपीरियंस बताना चाहूंगा। हमारे एक फ्रेंड थे हम और उनका बच्चा जो है वो नहीं हो रहा था। आईपीएस आईएएस चाहता था तो मैंने कहा कि कॉपी मंगवाइए भाई तभी मैं उसको तो एस्स में मैंने गाइड करने की बात की और एस्स की कॉपी बाजीराम जो कोचिंग सेंटर है बड़ा मशहूर वहां से आई 12525 के नंबर में उसको जो है 62 नंबर और दूसरे में 66 62 66 दिया था आउट ऑफ 125 आप भी सिविल सर्वेंट रहे हैं। आप जानते हैं एसए में सबसे टफ नंबर होता है। एसए में मुश्किल हो जाता है लोगों को अच्छा नंबर पाना। हम जब मैंने कॉपी देखी तो जानते हैं मैंने गलतियां पॉइंट आउट की और उसमें 32 और 36 मैंने अवार्ड किया। कॉपी गई कोचिंग सेंटर पे। वहां हंगामा मचा। वो लेकर के जो है किसी प्रोफेसर पास गए जो पढ़ाते थे शायद बताते थे कि वो रिटायर्ड आईएस थे तो प्रोफेसर ने कहा कि भाई कॉपी एकदम सही जाची गई है जो मतलब इसमें हां इवैल्यूएशन आप 32 का 34 कर सकते हैं 36 का 38 40 नहीं कर सकते आप बताइए कहां 40 नंबर आप जब टेस्ट ले रहे हो तो किसके लिए ले रहे हो कि बच्चे की क्या कमी है कहीं पर कमी हो तो बताइए और दूसरी चीज बताएं उस लड़के के लेटर का

### The coaching culture's rise and its influence on true knowledge acquisition [11:27]

एम एन आर एस यू वी टी एल सी ई दोनों में माइक्रोस्कोप लगा फर्क नहीं बता सकते खैर लड़का मेहनती था उसको मैंने बताया वो अपना काम किया और अपनी वीकनेस समझा आईपीएस हो गया अंतिम तो कोचिंग की तो ये हाल है अब रही बात एक दूसरी मैं ऐड करना चाहता हूं अपनी तरफ से आप तोकि आप लोगों के मेरा भी लड़का है उसमें तो बताता है कि हर साल हम लोगों का इवैल्यूएशन होता है, पर्सनल फाइल खुलती है तब इंक्रीमेंट मिलता है। कुछ लोगों का प्रमोशन जरूरी नहीं कि इतने साल पे हो जाए। और ये मैं आपको बताना चाहूंगा कि जो प्रोफेसर हमारे यहां 14 साल में जो स्केल पाता है वो एक आईएएस ऑफिसर 23 इयर्स के सर्विस के बाद पाता है और हर कितने बच्चे हैं वो प्रमोशन लेट होता है क्योंकि उनकी पर्सनल फाइल में यहां डिग्री कॉलेज यूनिवर्सिटी में कोई जो है ये नहीं पूछने वाला है कि आपके बच्चे क्यों कुछ नहीं पा रहे हैं क्यों कुछ नहीं जान रहे हैं मैं आपके इस चैनल पे यह डिमांड करता हूं कि तीन लाख सैलरी पाले पाने वालों से कोई मतलब ही नहीं है। आप चाहे लड़का सब फेल हो जाए चाहे किसी कुछ ना आवे तो भैया आप किस लिए काम क्यों कर रहे हो? एक आईएएस कितने प्रेशर में काम करता है। आईपीएस गलत और सही तरह के प्रेशर्स आते हैं। इसके बावजूद भी उसका इंक्रीमेंट जो है बिना पर्सनल फाइल देखे नहीं होता। और यहां बिना पर्सनल फाइल के सब पांच साल में सीनियर और नौ साल में एसोसिएट प्रोफेसर और 13 14 13 साल में जो है प्रोफेसर हो गए और तो यह जरूरी आखिर प्राइवेट स्कूल्स जो है वहां पर बेटर क्यों है? वहां बेटर इसलिए है कि वो डेडिकेटेड है कि ये लड़का नहीं हमारे यहां से निकलेगा तो हमको पैसा नहीं मिलेगा। और यहांकि सैलरी बैंक में जानी है, पेंशन मिलनी है। एंजॉय करिए। आपको मैं बताऊं आप चले आइए सुल्तानपुर में ही किसी कॉलेज में जिसमें 4000 लड़के हैं उसमें 100 लड़के आपको कैंपस में नहीं मिलेंगे। ये तो पढ़ाई हो रही है। तो ये कोचिंग और ये सब जो है इनको अगर आपको इसको व्यवस्था बटरी पे लाना है तो मैं आपको पैसा दे रहा हूं। आप एक लेबर लाते हैं और लेबर को लाने के बाद में उसका बार-बार जब दो बार तंबाकू खाने बैठ जाता है तो आप कहते हैं कि आपका ब्लड प्रेशर गड़बड़ होने। अरे भाई तंबाकू खाओगे यहां साहब ये है कि हफ्ते में दो दिन आके दस्तखत करके चले जा रहे हैं। डिग्री कॉलेज की बात मैं कर रहा हूं। रेगुलर साकेत जैसा कॉलेज जिसमें कुछ लोग हैं जो 10 साल से कभी क्लास नहीं गए हैं। सैलरी जा रही है। इस पर गवर्नमेंट क्यों नहीं देख रही है? केवल बुलडोजर चलाने से गवर्नमेंट नहीं होती। यह भी होना चाहिए। इन पर भी बुलडोजर चलना चाहिए और इनकी पर्सनल फाइल भी बननी चाहिए। इनका प्रमोशन रोका जाना चाहिए। इसमें मैंने यह देखा कि मैं जैसे हम लोग जब 12th क्लास में जैसे मैं था 11th 12th में जो मैंने गवर्नमेंट जुबली इंटर कॉलेज से पढ़ाई की। जी। अब उस समय आप ये समझिए कि बेस्ट स्टूडेंट जो है वो जाया करते थे इन गवर्नमेंट कॉलेजेस में हम और हमारे जो टीचर्स थे वो भी बिल्कुल टॉप क्लास टाइप के टीचर थे ज्यादातर मतलब अभी-अभी मुझे याद है कि हम लोग कोई क्वेश्चन पूछते थे तो हमारे मैथ्स के टीचर या जो हमारे फिजिक्स के टीचर थे, केमिस्ट्री के टीचर थे वो तड़ात जो है बोर्ड पे सॉल्व करने लगते थे। तुरंत बताने लगते थे। हम उस तरीके के टीचर की क्वालिटी जो है हमने किसी प्राइवेट स्कूल्स में भी देखी नहीं और डेफिनेटली उन्हीं टीचर्स के मतलब पढ़ाए होने की वजह से हम लोग बिना किसी कोचिंग के और बिना किसी माध्यम के हम लोग एक तरीके से एक मिडिल क्लास फैमिली से आते हुए भी आईआईटी में सेलेक्ट हो गए। तो लेकिन ये तकरीबन देखिए मैंने तो करीब 40 साल से ऊपर हो गया मुझे पास किए हुए। अब मैं यह देखता हूं कि गवर्नमेंट के जो स्कूल्स हैं उनकी क्वालिटी में इतना डेटरेशन हो गया है कि जैसे हमारी जनरेशन के जो लोग हैं उनके बच्चे जो हैं शायद ही कोई ऐसा बच्चा हो जो गवर्नमेंट स्कूल को भेजना चाहे। आखिरकार अ वही स्कूल्स बिल्डिंग्स अभी भी हैं। लेकिन उसके अंदर जो है जो क्वालिटी ऑफ़ एजुकेशन है वो बहुत डिक्लाइन कर गई है। और ये एक चिंता का विषय इसलिए है क्योंकि देखिए जैसे हम लोग थे तो ₹10 हमारी फीस पड़ती थी। अब ₹10 फीस में कोई भी आदमी अफोर्ड कर सकता था। भेज सकता था। आज दसों हजार की फीस देने के बाद में भी जो एजुकेशन की क्वालिटी प्राइवेट स्कूल से मिलती है क्योंकि मेरे बच्चे भी प्राइवेट स्कूल में गए हुए हैं तो और उनके टीचर से मैं मिलता रहता था। मैंने नहीं देखा कि उनके अंदर वो क्वालिटी हो जो हमारे गवर्नमेंट स्कूल्स में एक जमाने में हुआ करती थी। तो ये जो डिक्लाइन हुआ है ये धीरे-धीरे हुआ है। प्रोग्रेसिव डिक्लाइन हुआ है। और इसका क्या कारण आप देखते हैं? क्योंकि आप तो इतने लंबे समय से इस प्रोफेशन में

### How private sector influences education and the need for regulation [16:32]

रहे हैं। तो डेफिनेटली आप आपको अंदाजा होगा कि पिछले 30-40 सालों में जो डिक्लाइन हुआ है उसके क्या कारण क्या कर सकते हैं हम लोग कि इसको रिवर्स किया जाए। ये जो डिक्लाइन है। देखिए पहली बात तो जब कोई चीज डिक्लाइन शुरू होती है तो वो उसकी गति बढ़ती जाती है। आज जो है डिक्लाइन का ये आलम है। मैंने आपको WhatsApp पे भेजा भी था क्योंकि मैं एक कक्षा छ सात आठ में ग्रामर पढ़ाता हूं और उसमें जो विद्या भारती की प्रिस्राइब बुक है उसमें 5050 गलतियां ग्रामर की किताब में है। अब आप बताइए यह तो डिक्लाइन का लेवल है। दूसरी चीज यह है जो आप कह रहे हैं कि डिक्लाइन वो पहले जो मैंने कहा कि रिस्पांसिबिलिटी क्यों ना तय की जाए। आपको मैं 10 स्टूडेंट देता हूं और 10 स्टूडेंट को आप फेल कर दीजिए। सबको बाहर कर दीजिए। लेकिन यदि पढ़ाने के बाद में वो पास करके आप भेजते हैं और उनका जस्टिफिकेशन नहीं होता है तो आपकी सैलरी रोक दी जानी चाहिए। जब तक आप टाइट तरीके से हंटर लेकर के यह गुरु नहीं है। यह सब नौकर हैं। इनका जब तक हंटर्स लेकर के कोई खड़ा होके काम नहीं करेगा तब तक बिल्कुल कुछ भी नहीं हो सकता है। कोई देखिए यदि आप जो है टीचर्स को यू कैन टेक द हॉर्स टू द वाटर बट कांट मेट मेक ड्रिंक। जब तक आप जो है उनके अंदर पहले अनुशासन के साथ उनको क्लास में जाने का उनकी रिस्पांसिबिलिटी तय करने का कार्यक्रम नहीं करेंगे तो जो ये ऐसे गिरा हुआ है और गिरता चला जाएगा। नहीं इसका देखिए दूसरा हम हमें देखिए हमारा यह है कि इसका एक सिस्टमेटिक तरीका होना चाहिए। जैसे मैं आपको बताता हूं कि जैसे मैंने अनअकडमी पे बहुत दिनों तक पढ़ाया। अनअकडमी पे मैं यूपीएससी के लिए एस्स और एथिक्स पेपर पढ़ाता था। अब वहां पे कोई भी जो क्लास होता था उसके बाद में एक तो उनका सिलेक्शन क्राइटेरिया इस बात पर होता था कि आपकी जो अप्रूवल रेटिंग है वह कम से कम 85 90% की होनी चाहिए। तो स्टूडेंट जो होते थे उनको फीडबैक देना होता था कि भ आप कितना सेटिस्फाइड हैं वहां से। तो एक तो देखिए वो क्राइटेरिया हो गया कि स्टूडेंट जो है वो कितना सेटिस्फाइड हैं टीचर की परफॉर्मेंस है। दूसरा क्राइटेरिया ये हो सकता है कि हम जो स्टूडेंट है उनकी ओवरऑल परफॉर्मेंस देखें। चाहे बोर्ड एग्जामिनेशन में, चाहे कॉम्पिटिटिव एग्जामिनेशन में। कहने का मतलब यह है कि हमें इसमें मल्टीप्रोंग अटैक करने की जरूरत है। क्योंकि जो टीचर है आप उसको मान लीजिए क्लासरूम तक ले भी जाते हैं। लेकिन वो पढ़ा रहा है कितनी अच्छी क्वालिटी का पढ़ा रहा है। यह चीज इंश्योर करना भी जरूरी है। जो बीएसए है या जो गवर्नमेंट है वो इस बात को कर सकती है कि भ आप टीचर को बोल दीजिए आप क्लास में जाइए। वो क्लास जाएगा। लेकिन वह क्या पढ़ाएगा यह भी एक इंपॉर्टेंट चीज है। और फिर हमारे पास में एक ऐसा सिस्टम होना चाहिए कि जो टीचर्स अच्छा नहीं पढ़ा रहे हैं चाहे वो इस काबिल नहीं है चाहे वो जानबूझ के नहीं पढ़ा रहे हैं उनको निकालने की व्यवस्था होनी चाहिए। उनको जो है इस तरीके का सिस्टम होना चाहिए कि उनके प्रमोशंस ऑटोमेटिक ना हो। कहने का मतलब यह है कि परफॉर्मेंस बेस्ड आपका सैलरी होनी चाहिए, इंक्रीमेंट होनी चाहिए या प्रमोशनंस होने चाहिए। तो यह हम बेसिकली पॉलिसी के लेवल पर चीजों को डिस्कस करें कि किस तरीके से हम यह जो सिस्टम है इसको बेटर कर सकते हैं। यह एक इंपॉर्टेंट चीज है। तो आप उस नजरिए से जो गवर्नमेंट स्कूल्स में जो सिस्टम है उसके अंदर जो करंट सिस्टम है उसको बेटर करने के लिए हम क्या कर सकते हैं? ये चीज नहीं मैं वही तो कह रहा हूं कि बेटर करने का सिस्टम ये है कि क्यों ये खराब हुआ? खराब इसलिए हुआ कि आपको जो पढ़ाते थे टीचर्स या मैं खुद मैं तो संडे को भी क्लास लेता था। मैं विंटर वेकेशन में क्लास लेता था। यह कोई बात मैं ऐसे नहीं कह रहा हूं कि आप कह रहे हैं तो ऐसे आप किसी से पूछ लीजिए। हमारी तरह के भी टीचर्स रहे हैं। प्रोफेसर लक्ष्मीराज शर्मा इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के रिटायर होने के बाद ऑनलाइन पढ़ाते थे। आज इंडिविजुअल इनिशिएटिव की नहीं सिस्टमेटिक इंप्रूवमेंट की बात कर रहे हैं। सिर्फ सिस्टेटिक इंप्रूवमेंट कैसे किया? तभी होगा जब आप लोगों पर पनिशमेंट करेंगे। आप उनको दंडित नहीं कर करने वाले हैं। तो नहीं दंडित करने वाले हैं तो अपने मन से काम पॉलिसी होनी चाहिए। यही तो मैं आपसे जानना चाहता हूं कि क्या पॉलिसी गवर्नमेंट में हो जिससे क्वालिटी इंप्रूवमेंट हो? पॉलिसी सीधी होनी चाहिए कि मैंने यदि आपके यहां कोई मिस्त्री आया उसने काम किया और आपकी दीवार गिर गई तो आप मिस्त्री के ऊपर कुछ केस करेंगे कि नहीं करेंगे? या उस मिस्त्री को दोबारा तो नहीं बुलाएंगे। नहीं भाई मान लीजिए कि टीचर अच्छा पढ़ा रहा है। स्टूडेंट नहीं पढ़ रहा है तो उसके लिए टीचर को आप कैसे जिम्मेदार तो नहीं कह सकते कि सारे जो है स्टूडेंट टीचर ही जिम्मेदार नहीं पढ़ रहा है तो स्टूडेंट को आउट कर दीजिए ना। फेल करिए उसको। आखिर मैंने जो जीरो नंबर दिया था बच्चों को वही सारे जीरो को मिला होता तो पढ़ते वो लेकिन आज की जो स्थिति है मैं उस पर साफ आपको बता रहा हूं ये कुछ भी इसमें सुधार होने की मुझे दूर तक कोई गुंजाइश

### The necessity of systematic reforms rather than individual efforts [21:31]

नहीं लगती हजारों स्कूल खोले पड़े हैं। सारे नेताओं के स्कूल हैं। सारे बिजनेसमैन के स्कूल हैं। सब स्कूल खोले हैं। ब्लैक मनी उसमें लगा के सब वो वाइट कर रहे हैं। तो फैक्ट आपको ऐसा लगता है कि शिक्षा में व्यवस्था में सुधार का कोई स्कोप या फ्यूचर नजर नहीं आ रहा। कहां सुधार हो रहा है? आप कहां देखिए उम्मीद है कि नहीं? उम्मीद है कि नहीं है या उम्मीद हो? उम्मीद जब कोई करने की बात शुरू करे तब ना हो। हम हमको तो नहीं दिखाई पड़ता। हमें तो नहीं समझ में आता। मैंने तो तीन साल पहले जो है चीफ मिनिस्टर प्राइम मिनिस्टर को सबको लंबी चिट्ठी दी। आपको भी मैंने भेजा था वो लेटर। आप कोई असर नहीं हुआ। कोई बात नहीं हुई। जब कोई बात ही नहीं सुनना चाहता है तो आप क्या करेंगे? तो कैसे लाएं ऐसे टीचर्स को हमारे एजुकेशन सिस्टम में? नहीं कौन ये पॉलिसी चेंज करेगा? अभी सवाल ये उठता है कि जो गवर्नमेंट करेगी नहीं गवर्नमेंट है उसको कौन इ करता है? यही तो ये जनता तो बार-बार उसको इ करती है। अरे तो इ करने का तो मामला फिर क्लियर कर दिया आपने। इ करने में तो 10 जो गांजा पीने वाले हैं वो और आप हम जैसे पीएचडी और डीली जो है उनका एक वोट आपका है और 10 वोट गांजा पीने वालों का है। तो तभी तो देश की ये हाल है। अरे भाई देश की हाल क्यों है? पार्लियामेंट और असेंबली में जो है कितने लोग ब्लैकिस्टेड भरे पड़े हैं। लेकिन कॉमन आदमी के परसेप्शन में तो आईएस आईएएस, आईपीएस या आईएएस ऑफिसर तो बड़े करप्ट होते हैं और जो टीचर्स होते हैं बड़े अच्छे होते हैं। टीचर्स को तो गुरु को जो है हम लोगों ने साहब ब्रह्म बोला है साहब कि गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु और गुरु को तो भगवान से भी ऊपर का दर्जा दिया गया है। तो आप तो बिल्कुल ऑोजिट बातें कर रहे हैं। कहां है? वो गुरु कहां है? ये तो गुरु घंटाल है। [हंसी] पैसा लेकर के कॉपी में नंबर बढ़ाया जाता है। भाई साहब आप बात क्या कर रहे हैं? हम तो उस डिपार्टमेंट में हैं। तो देखिए एक तो जो आपने बताया शिक्षा व्यवस्था की लेकिन अगर हम मान ले कि जो हमारे देश में कुछ अच्छे विद्यार्थी भी होते हैं जो अच्छी शिक्षा पाते हैं। वाकई में डिर्व करते हैं। जो बोर्ड के टॉपर होते हैं वाकई में मतलब सिंसियर टाइप के होते हैं। लेकिन हमने यह देखा कि जो हमारी जो शिक्षा प्रणाली है उसके अंदर जो है जो लोग बहुत अच्छी परफॉर्म भी करते हैं वह भी एक तो जैसे जो एंटरप्रेन्योरशिप है कि जैसे आप देखेंगे अगर अमेरिका के अंदर जाइए या जर्मनी में जाइए या वेस्टर्न कंट्रीज में जाइए तो वहां पे एक से एक बड़ी आपको एंटरप्राइजेज मिल जाएंगी जो कि लोग सेट करते हैं। वहां पे बहुत सारे इनोवेशंस होते हैं। जैसे नोबेल प्राइिस हैं। अब इंडिया में अगर आप देखिए तो आजादी के बाद से अभी तक किसी भी आदमी इंडियन को इंडिया में रहते हुए इंडिया में काम करते हुए कोई नोबेल प्राइज नहीं मिला। चाहे वो आपका साइंस से रिलेटेड फील्ड हो या इकोनॉमिक्स लिटरेचर से रिलेटेड फील्ड हो इसमें कोई नोबेल प्राइज नहीं मिला। तो हम लोग किसी भी जो इनोवेशन के जो कैटेगरी है या क्रिएटिविटी की फील्ड है उसमें इवन जो बेस्ट ब्रेन हमारे हैं जो कि आईएम्स में आईआईटीस में जाते हैं यूपीएससी में जाते हैं कहीं भी जाते हैं वो लोग भी कुछ कर नहीं पाते हैं तो आपके हिसाब से इसका क्या कारण है मतलब क्यों हम लोग क्रिएटिव नहीं है क्यों हम लोग कुछ नया नहीं कर पाते हैं भाई ऐसा है कि नया तब करेंगे जब नए के लिए हमको प्रेरित किया जाएगा आपके यहां विश्वविद्यालयों में जो पीएचडी जिसको आप कह रहे हैं क्यों नहीं उसका रिकग्निशन है वो पीएचडी थीसिस तो जो है वो एक जमा होती है दूसरा उसको दूसरे नाम से करके उसको करवा पब्लिश करवा देता है यूनिवर्सिटी ऑफ़ सना में मेरा लड़का लाइफ साइंस में पीएचडी कर रहा था उसकी थीसिस को सात कंट्री के डिफरेंट प्रोफेसर्स के पास गई जचने के लिए जिसमें कोई एक दूसरे को नहीं जानता था और उसके बाद में उसमें से तीन अगर एक की भी रिपोर्ट जरा सा भी एंटी आती तो इनको फिर काम करना पड़ता और चार वो तीन प्रोफेसर्स को बाहर से बुलाया गया उन्हीं में से वाइवा लेने के लिए और हाल में द होल डे वाइवा है पार्टिसिपेंट्स भी सुनने वाले भी और प्रोफेसर भी तब जाके पीएचडी की डिग्री मिली तो वो पीएचडी की डिग्री में और आपके यहां जो पीएचडी की डिग्री है जैसे मैंने बताया कहां से किया था उन्होंने ये यूनिवर्सिटी ऑफ़ सना अच्छा जी स्पेन अच्छा जी और हमारे यहां पे कैसे डिग्री मिलती है पीएचडी। हमारे यहां डिग्री बता तो रहे हैं कि कितनी पीएचडी की डिग्रीज़ हैं। अगर आप 10 यूनिवर्सिटी का देख लीजिए तो इस यूनिवर्सिटी में जो जमा की गई है दूसरी यूनिवर्सिटी में उसको कवर निकाल के वो करके कर दी जमा कर दिया जाता है। पीएचडी हो जाती है। हम तो मतलब यह है कि जो डिग्री में या बोर्ड में नंबर आते हैं उसको आप ये सब फर्जी है। मतलब उसको सैक्रोसेंट नहीं मान सकते। उसको आप उसको कोई रिस्पेक्ट नहीं दे सकते। तो फिर आप कह रहे हैं मैं हाई कोर्ट में बैठ के 56 नंबर की कॉपी में दो नंबर देने के बाद मैं बरी हुआ विद ऑनर जजमेंट है अखबार के पहले पन्ने पर आया था वो तो क्यों 56 वाले को पनिशमेंट नहीं दिया गया दिया जाना चाहिए था कि नहीं दिया चाहिए था या तो मैं पनिश्ड होता या तो वो पनिश्ड हूं अच्छा ये जो ऑनलाइन एजुकेशन है बहुत सारा आजकल देखिए के जैसे ऑनलाइन कोचिंग्स होती हैं। उसके अलावा गवर्नमेंट भी इस तरीके के वीडियोस बना सकती है या इस तरीके के जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स हैं। इससे क्या है कि आप जैसे मोबाइल फोन के माध्यम से या लैपटॉप फिर आप टीवी के माध्यम से जो है अच्छे टीचर्स जो बेस्ट टीचर्स होते हैं उन उनसे आप उनको घर-घर तक पहुंचा सकते हैं या उनसे स्टूडेंट को शिक्षा दे सकते हैं क्योंकि अच्छे टीचरों की तो बहुत कमी है। ये तो आप भी महसूस करते हैं कि अ जितने हमें टीचर चाहिए लाखों की संख्या में उतने अच्छे टीचर नहीं है। तो ये जो टेक्नोलॉजी है उसका क्या इस्तेमाल आपके हिसाब से हो सकता है एजुकेशन को बेटर कर ले। फिर वही बात आई कि एटम बम एटम का जो जिसने आविष्कार किया जी वो जापान पे जो है जब उसका एटॉमिक बॉम्बिंग हुई जी तो बेचारा वो सर पकड़ के बैठ गया कि बताइए हम इसके लिए थोड़ी किए थे हम इसी तरह से आपने बहुत अच्छा प्रश्न उठाया हम ऑनलाइन और फिजिकल तरीके से जो क्लास है इस दोनों में फर्क होता है अगर ऑनलाइन हम बात कर रहे हैं। तो जिस लड़के की मैं बात कर रहा हूं उसका एम एन

### The influence of political and administrative interference [28:02]

आर एस यू वी टी एल ये कहां से करेक्शन होता है? तो जो सामने बात होती है उसका कोई अल्टरनेट नहीं है। लेकिन आप जो है ऑनलाइन बात करके अपनी बातें पहुंचा सकते हैं। लेकिन रिसीविंग तो होनी चाहिए। आज किस चीज की रिसीविंग है? मैं तो शाम को वाक पे जाता हूं। सारे एडोलेसेंट बच्चे जो है मोबाइल पर आंख गड़ाए बैठे हैं। मोबाइल में मैं भी सवेरे गीता सुनता हूं। अच्छे-अच्छे आपके क्रिटिकल थिंकिंग का मैं ऑडियो वो वीडियो देखता हूं सुनता हूं और दो ढाई घंटे प्राणायाम करता आसन करता हूं। तो आप इसमें कुछ भी करें तो जो है सही आपके हाथ में बंदर के हाथ में आपने उसरा दे दिया। सारी यंग जनरेशन खत्म है। सारी आपकी उसको तो मोबाइल पकड़ा दिए हैं और यह लैपटॉप हो गया है। फिर जो चाहे वो करें सब ब्लू फिल्म देख रहे हैं। कर क्या रहे हैं? दो एक और पॉइंट है। वो पॉइंट ये है कि हमारे हमारा परिवार नहीं रह गया। परिवार एक तो सब कैप्सूल फैमिली हो गई है। और कैप्सूल में भी बच्चे क्या कर रहे हैं? नहीं मतलब है वो खुद मोबाइल में वो खुद सीरियल में रात में 2:00 बजे तक सीरियल देखा जा रहा है 9 10 बजे उठा जा रहा है लड़का अपने उसमें जा रहा है कोई अपने काम में कोई पता नहीं है कौन क्या कर रहा है तो ये बहुत जरूरी है कि पहले परिवार जो है वहीं से सब कुछ सीखा जाता है आप देखिए अभिमन्यु पेट में था तब उसको जो है विद्या चक्रव्यूह भेदने का वो ज्ञान हुआ था और आज डॉक्टर्स कहते हैं कि फीिटस जो है दो महीने के बाद हो जाता है तो मदर क्या सोचती है? मदर क्या खाती है? मदर किस वातावरण में रहती है? उसका सबका असर बच्चे पर पड़ता है। जी जी तो वो बच्चे पर पड़ता है इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। पैदा होने के बाद बच्चा जो है वो देख के करता है। आप क्या कर रहे हैं? तब वही वो सीखता है। बैठ के आप शराब पी रहे हैं। सिगरेट पी रहे हैं तो क्या करेगा वो? वो भी वही करेगा। उसके लिए लाइफ वही है। तो पहली बात एजुकेशन जो है एजुकेशन इज नॉट अ क्लास रूम टीचिंग। एजुकेशन इज द डेवलपमेंट ऑफ पर्सनालिटी एंड यू कैन डेवलप अकॉर्डिंग टू माय डेफिनेशन ऑफ एजुकेशन टीचिंग इज द रीचिंग ऑफ द सोल ऑफ द स्टूडेंट। जी नॉट बाय डिलीवरिंग अ लेक्चर नॉट बाय यूजिंग फ्रेज एंड इड्स बट बाय योर एक्शन एंड कैरेक्टर सो वी हैव टू मेंटेन डेवलप आवर ओन कररेक्टर देन वी कैन बी अ टीचर देन वी कैन आवर टीचर डस नॉट मीन समथिंग पुटिंग इनू द बॉय हम वो स्प्राउट कराना है हम पेड़ जो है वो नहीं गाड़ा जाता बीज को अच्छी खाद, अच्छा पानी, अच्छी जेब डाल दिया जाता है। फिर वो स्प्राउट करता है। ऐसे एजुकेशन टीचर के कपड़े पहनने से, टीचर की बात करने से, टीचर के पंक्चुअल होने से सारी चीजें जो है बच्चों बच्चे ग्रेस कर एक चीज मैंने यह भी देखी कि आजकल देखिए क्या है कि आपकी बात से मैं कुछ हद तक सहमत हूं। काफी लेकिन क्या होता है कि जो टीचर है वो तो बच्चों के साथ में मान लीजिए छ सात घंटा तक रहता है। लेकिन जो पेरेंट्स हैं जो आपने पहले जिस बारे में बात किया [गला साफ़ करने की आवाज़] कि पेरेंट्स तो आपके साथ 24 घंटे हैं प्रैक्टिकली। हम अब पेरेंट्स की भी तो दायित्व होता है कि वो अपने रोजमर्रा की जिंदगी में ऐसा बिहेवियर करें जिससे कि बच्चे जो है वो सही रास्ते पर रहें। गलत चीजें उनसे ना सीखें। बिल्कुल। लेकिन एक चीज मैंने देखी है कि आजकल बहुत सारे जो पेरेंट्स होते हैं वो जैसे कि एक टीचर जो है या स्कूल जो है उसको एक सर्विस प्रोवाइडर की तरह देखते हैं। वो ऐसे सोचते हैं कि भ मैंने फीस दे दी। अब ये टीचर्स की जिम्मेदारी है कि उसको सही सिखाएं। मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं है। जब हमारे बच्चे छोटे थे हम कई बार पेरेंट टीचर मीटिंग में जाते थे। तो वहां पे मैंने बहुत सारे पेरेंट्स को लड़ते हुए देखा टीचर के साथ में कि भ आपने नहीं कराया। क्यों बच्चा हमारा फेल हुआ? आपकी जिम्मेदारी है। तो यह जो मुझे ऐसा लगता है कि यह जो बच्चों को पढ़ाने का या उनको सही रास्ता दिखाने की जो जिम्मेदारी है यह पेरेंट्स और टीचर दोनों की बराबर है और पेरेंट्स को भी अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करना पड़ेगा क्योंकि कररेक्टर की जो नींव पड़ती है वो तो कहीं ना कहीं पेरेंट्स का ज्यादा उसमें इंपॉर्टेंट रोल रहता है। जी जी तो इसके बारे में आप क्या कहना चाहते हैं? देखिए ऐसा है कि एक हमारे परिचित थे बहुत पहले तो शायद एक्सपायर कर गए हैं। वो आईपीएस थे पीपी सिंह तो [गला साफ़ करने की आवाज़] हमारी उनसे कुछ एक किसी वजह से हो गई थी फ्रेंडशिप टाइप उम्र में बहुत गैप था तो वो जो है बता रहे थे अपने घर में कि मेरे बाबा जो है वो दो डंडा मारते थे अगर हम दातून खड़े होकर कर रहे थे दो डंडा बैठकर आज भी कह रहे थे कि मैं ब्रश या जो भी करता हूं मैं बैठ के ही करता हूं तो वो शुरू में अनुशासन दिया गया घर से बताया गया समझाया गया परिवार आदर्श नागरिकता की प्रथम पाठशाला है। ये कोटेशन है किसी विद्वान का तो जब परिवार में ठीक नहीं होगा कोई आज तो सारी चीजें डिस्टर्ब कर दी गई है। आपसे मैं विनम्रता पूर्वक कहना चाहता हूं कि आपका जो समाज है यह ना भारतीय रह गया है ना पाश्चात्य रह गया है। पाश्चात्य समाज में भी कुछ वैल्यूस हैं जो मैं एक बार जाके देख आया हूं। उनके अंदर जो सिविक सेंस है, उनके अंदर जो प्रोट्यूड डिसिप्लिन है, वो यहां नहीं है। और जो हमारी परंपरा थी भारतीय परंपरा ऋषियों मुनियों की और नहीं वो भी खो दिया है। तो हम लोग तो ना इधर के हैं ना उधर के हैं। देखिए मैंने अभी कई कंट्रीज में आपने भी न्यूज़पेपर्स में पढ़ा होगा कि बहुत सारे कंट्रीज में 16 साल से कम के जो बच्चे हैं उनको मोबाइल फोन पे बैन लगा दिया गया है। कि 16 साल से कम के बच्चों को मोबाइल फोन नहीं देंगे क्योंकि मोबाइल [गला साफ़ करने की आवाज़] फोन जो है इतना बड़ा डिस्ट्रक्शन हो जाता है। मैंने देखा बहुत सारी मेरे अपने परिवार के अंदर लोगों को मैंने देखा है कि बच्चा जहां 2 साल तीन साल का हुआ उसको मोबाइल दे दिया टैब दे दिया कि वो उसी में अपना बिजी रहता है और उसका आप पेरेंट्स को भी बड़ा आराम हो जाता है कि भाई अब हमें मतलब परेशान नहीं करना। जो चाहे वो करें वो करेगा अपना। लेकिन वहां से जब आप सोचिए दो-ती साल से उसकी जो आदत बिगड़ जाती है वह जैसे-जैसे बड़ा होता है वैसेवैसे उसको इसका एडिक्शन हो जाता है। तो कई कंट्रीज ने इस बात में किया है कि 16 साल के नीचे वो मोबाइल को अलाउ नहीं करेंगे। तो आपको ऐसा लगता है कि ये चीज हमारे देश में भी इस तरीके की पॉलिसी आनी चाहिए। देखिए मैं दो साल पहले वो मेरे मित्र हैं जी और यूपी पुलिस के डीजीपी रहे हैं सुलखान सिंह साहब। जी जी मैं उनके पास बैठा था तो इसी पर चर्चा हो रही वो भी थोड़ा आध्यात्मिक व्यक्ति है जी और वो भी वैल्यूस को चाहते हैं कि सोसाइटी में वो हो तो हमने पूछा कि सिंह साहब ये बताइए ये जो गंदे वीडियोस और गंदी तरह के रील्स जो है मोबाइल पर पड़ी हुई है क्या इनको गवर्नमेंट नहीं कर सकती तो उनका कहना था कि इसमें एक मिनट भी नहीं लगेगा हम लेकिन कौन कौन करना चाहता है हम सरकार करना ही नहीं चाहती बिहार में नीतीश कुमार जी ने शराबबंदी कर दी तो जो शराब की बोतल ₹200 की मिलती थी वो ₹500 की मिलने लगी। इतना ही हुआ फायदा। हां शराब पीने का मैं देखिए वो बहुत मुश्किल है। आज का नेता एक एग्जांपल मैं दे रहा हूं। शास्त्री जी थे। ताशकंद समझौते पे उनको जाना था। जी। तो ये हुआ कि वहां ठंडा मौसम रहेगा। कोर्ट जो है एक नया बनवा लीजिए। तो उन्होंने कहा कि पुराना वाला निकालो। तो पुराना वाला निकाला गया। तो उसकी बाह जो है फटी हुई थी। सिलन उसकी टूट गई थी। तो उन्होंने कहा कि भाई ये तो इसका सिलन बनवा दो। बस क्या जरूरत है दूसरा और सिलन बनवा करके चले गए। दोबारा नहीं लौट के आए। उन्होंने कहा कि अनाज की प्रॉब्लम है तो एक दिन हम लोग उपवास कर ले। जय जवान जय किसान। जब कररेक्टर हो आपका एक दुर्घटना हुई रेल की। उन्होंने रेल मंत्री से इस्तीफा दे दिया। आपके सामने आज कौन है? आज आपके सामने है। देखिए दिन भर में चार बार एक नेता है कपड़ा बदलते हैं। 10 लाख का सूट बनवाते हैं। अपना नाम लिखवाते हैं। तो क्या करेंगे? ले लीजिए काम खत्म। हमने एक चीज ये देखी कि जैसे आज के समय में आपको मालूम ही है साइंस जो है जैसे कि कंपलसरी होती है। आई थिंक 10थ तक तो सभी को कंपलसरी है। उसके बाद में भी लोग जो है वो साइंस में ग्रेजुएशन करते हैं। पीसीएम तो सभी लोग पढ़ते हैं जब कोई इंजीनियरिंग देना हो या मेडिकल देना हो। उसके बाद में टेक्नोलॉजी में जो जाते हैं वो भी साइंस की एजुकेशन करते हैं। लेकिन जब हम साइंस तो बहुत पढ़ते हैं लेकिन साइंस को साइंटिफिक टेंपर डेवलप नहीं करते हैं। अभी भी आप अगर देखिए तो हमारे यहां पे जो बाबाओं के जो बड़े-बड़े बाबा लोग होते हैं उनके पीछे करोड़ों लोग जाते हैं और अभी आपको पता होगा कि कुछ समय पहले जो है एक बाबा के चरणों की धूल लेने के लिए इतने सारे लोग भागे कि उसमें कई लोगों की डेथ हो गई है। आपको पता होगा कुछ सालों पहले एक साल पहले की बात है। कई ऐसे बाबा लोग हैं जो कि रेप के केस में, मर्डर के केस में कॉन्विक्ट हो चुके हैं और उसके बावजूद उनको लगातार बेल मिलती रहती है और जब वो जाते हैं, बाहर जाते हैं तो साहब उनका ऐसा स्वागत किया जाता है कि जैसे वो कोई ऋषि मुनि का भी क्या स्वागत या राजा महाराजा का स्वागत हो। तो ये जो एक बात है कि आप लोगों को पढ़ा दें चीजें। लेकिन वह जो पढ़ाई है उसका रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल करना साइंस पढ़कर के साइंटिफिक टेंपर डेवलप करना जो कि हमारे कॉन्स्टिट्यूशन का भी पार्ट है वो हमें लगता है कि हमारे देश से कोसों दूर है। तो ये चीज भी एक बड़ी इंपॉर्टेंट प्रॉब्लम है कि लोग पढ़ तो जाते हैं आजकल हर आदमी ग्रेजुएट बन जा रहा है। लेकिन उस नॉलेज को ना तो वो इस्तेमाल करता है कहीं डेली लाइफ में ना उससे कोई क्वालिटी इंप्रूव होती है। बस उसका काम यही है पढ़ो लिखो नौकरी पा जाओ किसी तरीके से बस उसके बाद में हमें कोई मतलब नहीं है उससे हां तो वो जो बातें अभी आप कह रहे थे कि वो जो है

### Education reforms needed for rural and underprivileged areas [38:34]

आपने जैसे पुस्तक में लिखा हुआ था वैसे आपने अपने ब्रेन में लिखा लिख लिया और एग्जाम दे दिया पास हो गए शिक्षा ये नहीं है शिक्षा वो है कि पुस्तक से प्राप्त ज्ञान को अपने व्यवहार और आचरण में उतार कर आप जब प्रस्तुत करें तो वो आपके से शिक्षा है जो महात्मा गांधी जी ने सही बात तब चल पड़े कोट पग उसी ओर जो दो पैर उनके चले तो कोर्ट पग उनका फॉलो किए क्योंकि वो जो करते थे आचरण से उसको सिद्ध करते थे कि ये है तो जो साइंटिफिक टपर की बात आप कर रहे हैं जब वो अंतरिक्ष में इसरो मतलब भेजने के लिए नारियल फोड़ा जाएगा मैं किसी धर्म के उस पर नहीं बात कर रहा हूं। लेकिन वो जो भी या वो मुसलमानों के यहां जाकर के किस पर वो पत्ती लपेटते हैं क्या करते हैं सबके यहां वो है। ये हमारी आपकी वीकनेस है। हमारे आपका कररेक्टर बिल्डिंग नहीं हुई है। गुरु नानक जी ने इससे जब कहा कि भाई इधर पैर करके ना लेटो। इधर जो है वो मस्जिद मक्का है तो कहे कि भाई हमारा पैर हटा दो जिधर ना हो। जब उधर किए तो उधर भी मक्का होगा। इसका इसकी टीचिंग का मतलब क्या है? ये है कि गॉड इस एवरीवेयर सर्वम खदम ब्रह्म तो सर्वम खलदम ब्रह तो नारियल फोड़ने की क्या जरूरत है हम इस उस विमान में भी ईश्वर है यहां भी ईश्वर है लैब हम हर जगह ईश्वर है क्या जरूरत है उसको करने की ये देखिए ये शिक्षा ही तो नहीं हो रही है होगा तो मैं आपसे आखिर में ये पूछना चाहता हूं कि आप जो हमारे स्टूडेंट्स हैं या टीचर्स हैं उनको आप क्या मैसेज देना चाहेंगे कि किस तरीके से वह करें और फाइनली आप सरकार को क्या मैसेज देना चाहेंगे कि किस तरीके से वो हमारा जो एजुकेशन सिस्टम है नंबर वन उसकी क्याेंस है यह समझने की जरूरत है इस देश के उत्थान में और दूसरा यह है कि उनको सबको अपने-अपने लेवल पे क्या करना चाहिए ये इस बारे में आप क्या कहना चाहेंगे देखिए टीचर के लिए भी पेरेंट्स के लिए भी नेता के लिए भी सबके के पूरे इस प्रकृति में जो कुछ है सबके लिए एक सूत्र हमारे ऋषि मुनियों ने दिया है एक वाक अर्धांश है आत्मना प्रतिकानी परेशा समाचरे जो चीज मुझे खराब लगती है वो मैं दूसरे के साथ ना कर मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे को पढ़ा के कोई बहुत बड़ा अर्थमेटिक मैटिशियन बना दे और हम हिंदी पढ़ाते हैं तो हम हिंदी नहीं पढ़ाने जाना चाहते यही हाल नेता अगर सारे लोग अपना सेल्फ क्रिटिसिज्म करें, सेल्फ एनालिसिस करें और अपने को ठीक करके करने के बारे में सोचेंगे तभी समाज ठीक हो पाएगा। मॉडर्न टाइम्स का सबसे बड़ा अंग्रेजी का पोएट जिसने आपके उपनिषद वेद को जो है कोट किया है। टी एस एलियट जी वो अपनी प्रसिद्ध पोएम द वेस्टलैंड में 424 पंक्ति की है जिसको कहा जाता है एपिक ऑन मॉडर्न टाइम्स महाकाव्य है। उसमें वो कहता है एक पात्र कहता है कि शैल आई सेट माय लैंड इन आर्डर। हम भगवान बुद्ध का एकमात्र उपदेश है अपदीपो अगर हम ठीक होंगे तो हमारे आसपास भी कुछ लोग ठीक होना शुरू करेंगे देख और आगे जाए अब रही बात आपको इस एजुकेशन सिस्टम पे तो भैया उसके लिए तो जो है जैसे मैंने पहले कहा कि माफिया के लिए जैसे बुलडोजर चला है वही बुलडोजर का कोई कार्यक्रम प्रोफेसर्स जो तथाकथित बने घूम रहे हैं। आता जाता किसी को कुछ नहीं। मैं बहुत लोगों से मिलता हूं। बहुत लोगों की पोस्ट पढ़ता रहता हूं। ना हिंदी आती है ना अंग्रेजी आती है। तो वो जो है उन पर जो है डंडा बिना चलाए बिना उनको ठीक किए कुछ भी एजुकेशन में ठीक होने वाला नहीं। तो आपकी बात से मुझे याद आता है कबीर दास जी का वो दोहा जब उन्होंने कहा था कि बुरा जो देखन मैं चला बुरा ना मिलिया कोई। जी जी द दिल खोजा आपने मुझसे बुरा ना खोए। तो आजकल हमारे यहां पे सब लोग दूसरों की कमी निकालने की कोशिश करते हैं। पर अपना सुधारने की कोशिश नहीं करते हैं। नहीं हां अपने अपना सुधारना ही सबसे जरूरी है क्योंकि गांधी जी ने भी जो एक उनका एक बहुत ही फेमस मैसेज था कि बी द चेंज यू वांट टू सी इन द वर्ल्ड कि दुनिया में जो आप बदलना बदलाव लाना चाहते हैं वो आपको स्वयं अपने अंदर चेंज करने की जरूरत है। तभी आप इस दुनिया में बदलाव ला पाएंगे। बिलकुल। आई थिंक आपने जो मैसेज दिया मेरे ख्याल से हम सभी लोगों को इस बात का फॉलो करना चाहिए। देखिए जो दो तीन चीजें जो बहुत इंपॉर्टेंट है जो आपसे डिस्कशन करके हमें पता चली। पहली तो देखिए इंपॉर्टेंट चीज ये है कि अगर आप एक अच्छे टीचर हैं तो आप एक टीचर के धर्म को समझें और अपनी अहमियत को समझे कि सोसाइटी में आप कितना इंपॉर्टेंट कंट्रीब्यूशन कर रहे हैं और उसके लिए मन से आप काम करें। ये इंपॉर्टेंट चीज है। एक स्टूडेंट के लिए सबसे इंपॉर्टेंट मेरे ख्याल से यह है कि भाई टीचर की रिस्पेक्ट करें और वो ज्ञान पे फोकस करें। नॉलेज पे फोकस करें। क्योंकि देखिए मैंने भी यह एक्सपीरियंस किया है कि नॉलेज अगर आपको है और आप पढ़ना एंजॉय करते हैं तो नंबर तो अपने मन से आएंगे। नंबर फोकस नहीं होना चाहिए। नंबर शुड बी द आउटकम ऑफ योर गुड एजुकेशन एंड नॉट द गोल मींस नॉट दी एंड ऑफ द एजुकेशन जो कि आजकल के समय में बन गया है और ये भी एक इंपॉर्टेंट मैसेज जो आपने दिया है कि भ हम लोग दूसरे की कमी निकालने से पहले अपनी कमी को देखें और हर आदमी अगर अपना-अपना डिपार्टमेंट सही कर ले तो मेरे ख्याल से हमारा देश जो है वो बहुत आगे बढ़ सकता है और चेंज की शुरुआत जो है वो कहीं ना कहीं अपने घर से होनी चाहिए। तो आप और कुछ फाइनली कुछ मैसेज देना चाहेंगे आज चेंज नहीं बस जितना कह दिया गया है वो एग्जीक्यूट हो जाए और मैं आपको आश्वस्त करना चाहता हूं कि मैं एज अ टीचर जब तक जीवित रहूंगा तब तक मैं टीचिंग करता रहूंगा निष्ठा के साथ जी इसमें कोई बंद ये कभी बंद नहीं होने वाली। चलिए बहुत-बहुत धन्यवाद आपका। आज हमारे प्लेटफार्म पे आप आए और आपने अपने विचार दिए। और मैं देखिए इस बात को फाइनली कंक्लूड करने से पहले यह कहना चाहता हूं कि टीचर टीचिंग करना एक बहुत ही नोबेल प्रोफेशन है। क्योंकि जो भी आदमी अच्छा टीचर होता है वो अपनी पूरे करियर के अंदर हजारों लोगों की जिंदगी ट्रांसफॉर्म करता है। उनको अच्छे सिटीज़ंस बनाता है और इसीलिए ज़रूरी है कि सरकार की तरफ़ से भी यह पॉलिसी हो और हमारे देश के लोगों का भी अह ऐसा दायित्व है कि अच्छे से अच्छे लोग जो है वो टीचिंग प्रोफेशन में आए ताकि हमारे देश को आगे ले जाए क्योंकि मैं समझता हूं कि जब तक अच्छे टीचर हमारे देश में नहीं होंगे तब तक हम किसी भी कीमत पे एक अच्छा देश नहीं बन सकते हैं। बहुत-बहुत धन्यवाद। थैंक यू वेरी मच।
