# The universal Dharma and it's first Pillar - Morality - Goenka ji - Hindi

## Метаданные

- **Канал:** Vipassana Meditation
- **YouTube:** https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY
- **Дата:** 09.05.2026
- **Длительность:** 58:55
- **Просмотры:** 4,750

## Описание

Goenkaji talks about importance of Sila/ morality as a base for learning Vipassana meditationHe explains about the human life being of utmost importance because it gives the opportunity to learn and practice DhammaTalks about how we don’t take responsibility of our own miseryExplains the meaning of word DHARAM - and where it comes fromHe makes us cautious about blind faith and how it will be harmful to oneself and proper understanding will help to strengthen the faith.


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May all be benefited. May all beings be happy.
© Vipassana Research Institute

## Содержание

### [0:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY) Segment 1 (00:00 - 05:00)

कोल्हापुर के नागरिकों, शांति प्रेमी सज्जनों, सनारियों, शांति किसे नहीं चाहिए? सभी तो अशांत हैं। सभी बेचैन हैं। सभी दुखियारे हैं। किसी को किसी बात का दुख, आज एक बात का दुख। तो हो सकता है कल किसी दूसरी बात का दुख। कैसे शांति प्राप्त करें? हमारे इस महान देश के ऋषियों ने, मुनियों ने, संतों ने, अरहंतों ने, बुद्धों ने सब ने इसी बात की खोज की कि इस दुख से भरे हुए संसार में व्यक्ति को शांति कैसे उपलब्ध हो। सब ने यही बात देखी कि शांति धर्म में ही है। अधर्म में शांति नहीं। यह बात स्वीकार लें तो यह भी समझना चाहिए कि धर्म क्या है? अपने यहां दुर्भाग्य से धर्म शब्द का अर्थ ही खो बैठे। आज तो जहां कहीं धर्म शब्द का प्रयोग हो तो सुनने वालों के कान खड़े होते हैं। यह व्यक्ति कौन से धर्म की बात करेगा? हिंदू धर्म की कि बौद्ध धर्म की कि जैन धर्म की कि ईसाई धर्म की कि मुस्लिम धर्म की कि सिख धर्म की इत्यादि दुर्भाग्य की बात हुई। पिछली कुछ सदियों से धर्म और संप्रदाय हमारे देश में पर्यायवाची हो गए। यह सोचना ही भूल गए कि भाई धर्म हिंदू कैसे होगा? धर्म मुस्लिम कैसे होगा? जैन कैसे होगा? सिख कैसे होगा? ईसाई कैसे होगा? पारसी कैसे होगा? ये अलग-अलग समाज है, अलग-अलग समूह है, अलग-अलग संगठन है, अलग-अलग जमात है, अलग-अलग संप्रदाय हैं। आज संप्रदाय शब्द बड़ा दूषित हो गया। जब आरंभ हुआ था तो अच्छे अर्थ में हुआ था। जो समता प्रदान करे वह संप्रदाय पर अब तो कहां समता प्रदान करता है तो संप्रदाय ना कहें ये भिन्नभिन्न समाज है धर्म नहीं धर्म तो सार्वजनीन होता है सार्वदेशिक होता है सार्वकालिक होता है धर्म भारत में विश्व के विधान को कहते थे निस्ग के नियमों को धर्म कहते थे। कुदरत के कानून ऋत को धर्म कहते थे। स्वभाव को धर्म कहते थे। प्रकृति को धर्म कहते थे। यह धर्म की पुरानी परिभाषा अभी भी कभी-कभी सुनने में आ जाती है। धर्म शब्द का प्रयोग सही मायने में आज भी कभी-कभी हो जाता है। जैसे कोई पुरानी गूंज हमें सुनाई दे रही हो। जब कोई कहता है कि अग्नि का धर्म जलना है और जलाना है। यह उसका धर्म है। यह उसका स्वभाव है। यह उसकी प्रकृति है। अगर वह जलती नहीं और जलाती नहीं तो और कुछ होगी। अग्नि नहीं हो सकती। अग्नि है तो

### [5:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=300s) Segment 2 (05:00 - 10:00)

जलेगी जलाएगी। इसी तरह से कहें बर्फ का धर्म है शीतल होना और शीतल करना। यह उसका स्वभाव है। यह उसकी प्रकृति है। ठीक इसी प्रकार अपने देश में ऋषियों ने, मुनियों ने, महापुरुषों ने अंतर्मुखी होकर के देखा कि निस्ग के क्या नियम है, क्या स्वभाव है? उसी को उन्होंने रीत कहा। क्या रीत है? हम अपने चित्त में जो चित्त वृत्ति धारण करते हैं उस चित्त वृत्ति का क्या स्वभाव है? मैंने अपने चित्त में क्रोध जगाया, द्वेष जगाया, दुर्भावना जगाई। उसका स्वभाव है व्याकुल होना और व्याकुल करना। यह हो नहीं सकता कि मैं अपने मन में क्रोध भी जगाऊं, द्वेष भी जगाऊं, दुर्भावना भी जगाऊं और भीतर ही भीतर बड़ी शांति महसूस करूं। भीतर ही भीतर बड़ा सुख महसूस करूं और औरों के लिए भी सुख शांति का प्रजनन करूं। हो नहीं सकता। असंभव है क्योंकि क्रोध का, द्वेष का, दुर्भावना का यही स्वभाव है। जैसे अग्नि का स्वभाव जलना है। जिस पात्र में अग्नि रख देंगे पहले अग्नि उस पात्र को जलाएगी। और फिर वो ताप आसपास के वातावरण में फैलेगा। जो उसके संपर्क में आएगा उसी को संतापित करेगी। यह उसका धर्म है। यह उसका स्वभाव है। ठीक इसी प्रकार जो व्यक्ति अपने भीतर क्रोध जगाएगा, द्वेष जगाएगा, दुर्भावना जगाएगा, दुर्मनश्यता जगाएगा, पहले स्वयं जलने लगेगा। बड़ा व्याकुल होगा, बड़ा व्याकुल होगा। और आसपास के सारे वातावरण को व्याकुलता से भर देगा। उस समय उसके संपर्क में जो आए वही व्याकुल हो जाएगा। क्यों? क्योंकि यह धर्म है। क्रोध का ऐसा धर्म है, द्वेष हर विकार का ऐसा धर्म है कि वो व्याकुल बना देगा, दुखियारा बना देगा, बेचैन बना देगा। और किसी भी प्रकार से हम विकार को दूर कर ले। अपने चित्त से चित्त विकारों से विमुक्त हो जाए तो एक और रीत है, एक और नियम है, एक और कुदरत का कानून है कि जैसे ही चित्त निर्मल हुआ मैत्री से भर उठेगा, करुणा से भर उठेगा, सद्भावना से भर उठेगा। और यह मैत्री यह करुणा यह सद्भावना ऐसी चित्तवत्तियां है कि जैसे ही चित्त में यह चित्तवत्तियां जागेगी उनका अपना स्वभाव है बड़ी शांति बड़ा सुख जैसे ही मन में सद्भावना जागी मन में बड़ी शांति जागी सद्भावना भी जागे और अंदर से हम संतापित भी हो व्याकुल भी हो नहीं सकता या तो संतापना सद्भावना नहीं है। सद्भावना के नाम पर किसी धोखे में है। सद्भावना जागी है। प्यार जागा है। करुणा जागी है। मैत्री जागी है। तो उसके साथ-साथ शांति जागी है। सुख जागा है। और वो सुख वो शांति आसपास के वातावरण में पैरने लगेगी। उस समय जो व्यक्ति हमारे संपर्क में आएगा उसे भी सुख शांति महसूस होगी। जिस पात्र में बर्फ रख देंगे, वह बर्फ पहले उस पात्र को शीतल करेगी। फिर वह शीतलता आसपास के वातावरण में समाने लगेगी। आसपास के वातावरण के संताप को दूर कर देगी। यह प्रकृति का नियम है। यह नियम है। कुदरत का कानून है। यही रित है। कुदरत के इन नियमों को समझते हुए हम उसके अनुसार अपना जीवन ढालना शुरू कर दें। उसी को धर्म कहते हैं। चित्त को विकारों से विमुक्त करें तो हम धर्मवान हो गए। हमारा चित्त विकारों से विमुक्त हो जाएगा तो वाणी से ऐसी बात बोली नहीं जाएगी जो किसी दूसरे को हानि पहुंचाए किसी दूसरे को दुख पहुंचाए पीड़ा पहुंचाए किसी दूसरे का अनिष्ट करे अमंगल करे हो नहीं सकता

### [10:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=600s) Segment 3 (10:00 - 15:00)

चित्त हमारा विकारों से निर्मल हो जाए तो हमारे शरीर से कोई ऐसा काम हो नहीं सकता जो औरों को हानि पहुंचाए पीड़ा पहुंचाए जाए उनका अनिष्ट करें उनका अमंगल करे हो ही नहीं सकता आधार तो चित है ना सारे कर्मों का आधार चित्त है सारे कर्म पहले चित्त में जागते हैं और आगे बढ़ते हैं तो वाणी पर प्रकट होते शरीर पर प्रकट होते हैं। तो जड़े तो चित्त में है। यही हमारे देश के ऋषियों ने, मुनियों ने, महापुरुषों ने यही बात देखी कि चित्त अगर हमारा सुधरता है, निर्मल होता है, तो हम धर्मवान होते चले जाते हैं। चित्त हमारा मैला होता है, तो हम अधर्मी होते चले जाते हैं। और जब-जब धर्मवान होते हैं, तब-तब बहुत सुख शांत का लाभ होते हैं। स्वयं भी बहुत सुख शांति महसूस करते हैं। औरों के लिए भी सुख शांति का वातावरण प्रजनन करते हैं। और जब अधर्मी होते हैं माने जब चित्त को विकारों से विकृत करते हैं स्वयं भी बड़े दुखियारे हो जाते हैं। औरों को भी दुखी बनाते हैं। इतनी सीधी सी बात धर्म की और कहां उलझा लिया? यह हिंदू धर्म, यह बौद्ध धर्म, यह जैन धर्म, यह ईसाई धर्म, यह सिख धर्म कैसे धर्म हुआ भाई? धर्म तो सबका एक ही है ना। तो कैसे होगा? अगर कोई हिंदू अपने चित्त में दुर्भावना जगाता है, क्रोध जगाता है, द्वेष जगाता है और फिर भी व्याकुल नहीं होता, बहुत शांति महसूस करता है। तब तो एक विशेष बात हुई है। हिंदुओं का अलग धर्म हुआ। ऐसे ही कोई मुस्लिम, कोई सिख, कोई ईसाई, कोई बौद्ध, कोई जैन दुर्भावना जगा के भी बड़ी शांति महसूस करता है तो इनका अलग धर्म हुआ। या कोई आदमी सद्भावना जगाता है और व्याकुल होता है तो यह नई बात हुई। यह इनका अलग धर्म हुआ। ऐसा नहीं होता ना। धर्म तो सबका एक जैसा है। अग्नि का धर्म जलना है तो इसमें हिंदू पने की क्या बात आई? बौद्ध पने की कि जैन पने की कि ईसाई पने की कि मुस्लिम पने की? बात क्या है? उसका धर्म है। उसका स्वभाव है। बर्फ का धर्म शीतल होना है। ना हिंदू की बात ना बौद्ध की बात ना जैन की बात उसका स्वभाव है। ऐसे ही चित्त पर जागे हुए विकारों का धर्म है व्याकुल बना देगा। चित्त से दूर हुए विकारों से मुक्त हुए चित्त का स्वभाव है। शांति से भर जाएगा। सुख से भर जाएगा। यह धर्म है, यह स्वभाव है। धर्म की इतनी सीधी सी बात जो आदमी जितनी जल्दी समझ लेता है, वो और जंजालों से अपने को मुक्त कर लेता है। अपने आप को हिंदू कहने वाले लोग एक संगठन में, एक समूह में, अपने आप को मुस्लिम एक समाज में एकत्र हो। इसी तरह से बौद्ध, जैन, सिख, ईसाई कोई दोष की बात नहीं। अपने पर्व त्यौहार मनाएं। अपनेप तीज त्यौहार मनाएं। अपनेप व्रत उपवास करें। अपनेप कोई कर्मकांड करने हैं सो करें। अपनीपनी कोई दार्शनिक मान्यता है सो माने। ये दार्शनिक मान्यता मानते हैं वो दार्शनिक मान्यता मानते हैं। माने। धर्म का इससे कोई लेनदेन नहीं। धर्म के लिए तो एक ही मापदंड है। दूसरा मापदंड नहीं। चित्त विकारों से मुक्त हो रहा है कि नहीं हो रहा? हो रहा है तो हम धर्मवान होते जा रहे हैं। धार्मिक चित्त विकारों से भरा पड़ा है। बंधा हुआ है विकारों से। तो हम अधर्मी होते जा रहे हैं। अपने आप को हिंदू कहें, बौद्ध कहें, जैन कहें, ईसाई कहें, कुछ फर्क नहीं पड़ता। अपने आप को भारतीय कहें, पाकिस्तानी कहें, अंग्रेजी अंग्रेज कहें, अमेरिकन कहें, रूसी कहें, कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसने अपने चित्त में विकार जगाया वो धर्म से चत हो गया। अपनी हानि करने लगा औरों की हानि करने लगा। जिसने अपने चित्त से विकारों से मुक्ति पाई वो धार्मिक हो गया। स्वयं सुख शांति महसूस करने लगा। औरों के लिए सुख शांति का वातावरण तैयार करने लगा। अब वो अपने को चाहे जिस नाम से पुकारे। चाहे जैसे तीज त्यौहार मनाता हो, चाहे जैसे पर्व उत्सव व्रत उपवास करता हो, चाहे जैसे अन्य

### [15:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=900s) Segment 4 (15:00 - 20:00)

कर्मकांड करता हो, चाहे जैसी दार्शनिक मान्यता मानता हो, चाहे जैसे पहनावा पहनता हो, चाहे जैसा रहन-सहन हो, कुछ फर्क नहीं पड़ता। वो सब अपनी जगह वो सारी सामाजिक बातें हैं। धर्म की तो एक ही बात है। चित्त निर्मल हो रहा है कि नहीं? हो रहा है तो अपने को हिंदू कहने वाला व्यक्ति भी धार्मिक जा रहा है। बौद्ध कहने वाला भी, जैन कहने वाला भी, भारतीय कहने वाला भी, अमेरिकन कहने वाला भी अन्यथा धर्म से कोई लेनदेन नहीं है। जब आग पर कोई आदमी हाथ रख देता है, अनजाने में ही रख देता है, तो आग इस बात को नहीं देखेगी कि यह व्यक्ति अपने आप को हिंदू कहता है कि बौद्ध कहता है कि जैन कहता है कि ईसाई कहता है। कि यह आदमी ऐसी वेशभूषा वाला है कि वैसी वेशभूषा वाला है। यह आदमी ऐसे कर्मकांड करने वाला है कि वैसे कर्मकांड करने वाला है। यह आदमी ऐसी दार्शनिक मान्यता मानने वाला है कि वैसी है। कुछ नहीं देखेगी। अग्नि का अपना धर्म है। उस पर हमने चाहे अनजाने में ही हाथ रख दिया हाथ जलेगा ही। हमें कोई बचाने वाला नहीं। ठीक इसी प्रकार जब मन में क्रोध जागेगा, द्वेष जागेगा, दुर्भावना जागेगी तो कुदरत इस बात को नहीं देखेगी कि जिस व्यक्ति ने अपने भीतर क्रोध जगाया है, द्वेष जगाया है, दुर्भावना जगाई है, वो अपने को किस नाम से पुकारता है? वो अपने को हिंदू कहता है कि बौद्ध कहता है कि जैन कहता है कि ब्राह्मण कहता है कि वैश्य कहता है कि शूद्र कहता है? क्या कहता है? किस नाम से पुकारता है? कैसे वेशभूषा वाला है? कैसे व्रत त्यौहार मनाने वाला है, कैसे कर्मकांड करने वाला है, कौन-कौन से दार्शनिक मान्यता मानने वाला है, कुछ नहीं देखेगी। प्रकृति कुछ नहीं देखेगी। तूने चित्त में विकार जगाया, तुझे दंड मिलेगा ही तत्काल मिलेगा। हम जिस राज्य में रहते हैं उस राज्य के अपने कानून हैं। जो व्यक्ति राज्य के कानून को तोड़ेगा राज्य उसे दंड देगा। दंड संिता इसीलिए बनी है उसे दंड देगा। लेकिन हो सकता है कि वो व्यक्ति अपराध करने वाला व्यक्ति नियमों को तोड़ने वाला व्यक्ति दंड से बच जाए। किसी के पकड़ में नहीं आए। आ भी गया तो दंड देने वाले उधर देखने लगे। उस पर ध्यान नहीं दिया। किसी कारण से बच गया। कुदरत के दंड से कोई नहीं बच सकता। या यूं कहें परमात्मा किसी राज्य के कानून तोड़ने पर दंड मिलते बरसों लग सकते हैं। कुदरत का कानून तोड़ने पर तत्काल दंड मिलता है। देर नहीं लगती। जैसे ही मैंने क्रोध जगाया, द्वेष जगाया, दुर्भावना जगाई, अपने मन को विकारों से विकृत किया, तत्काल व्याकुल हो गया। मुझे तत्काल दंड मिलने लगा। कुदरत इस बात के लिए प्रतीक्षा नहीं करेगी। यह व्यक्ति कब मरे और तब इसको मैं नरक में भेजूं। नहीं प्रतीक्षा करेगी। तत्काल दंड देगी। ठीक इसी प्रकार चित्त को निर्मल करके मैत्री से करुणा से सद्भावना से भरा कि तत्काल पुरस्कार मिला उसी क्षण चित्त में ऐसी शांति आएगी ऐसा सुख आएगा कुदरत इस बात की प्रतीक्षा नहीं करेगी या यूं कहें परमात्मा करेगा यह आदमी कब मरे और तब इसको स्वर्ग भेजूं अरे नहीं यही दंड मिलता है अभी दंड मिलता है यही पुरस्कार मिलता है अभी पुरस्कार मिलता है। बड़ी सीधी बात है धर्म की। बड़ी सरल और उलझा लिया हमने। ये इनका धर्म, यह उनका धर्म, यह मेरा धर्म, ये तेरा धर्म, अरे धर्म तो जो धारण करे उसका धर्म भाई कोई धारण कर ले। चित्त की निर्मलता कोई धारण कर ले वही धार्मिक हो गया। जैसे हम अग्नि को यह लेबल नहीं लगा सकते कि यह हिंदू अग्नि है कि बौद्ध अग्नि है कि जैन अग्नि है कि मुस्लिम अग्नि है। जैसे हम क्रोध को कोई लेबल नहीं लगा सकते कि हिंदू क्रोध है कि बौद्ध क्रोध है कि जैन क्रोध है। जैसे इस क्रोध से जो व्याकुलता आई है उसको लेबल नहीं लगा सकते। यह हिंदू व्याकुलता है कि बौद्ध व्याकुलता है कि जैन व्याकुलता है। ठीक इसी प्रकार मैत्री और सद्भावना जगाने पर जो शांति आई जो सुख आया उस पर लेबल नहीं लगा सकते। अब ये हिंदू सुख आया शांति आई। अब ये मुस्लिम ये बौद्ध सुख आया शांति आई। नहीं तो उलझ गए। धर्म के नाम पर कहां

### [20:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=1200s) Segment 5 (20:00 - 25:00)

उलझ गए? एक साधे सब सधे एक बात समझ में आ जाए और हम उसके पीछे लग जाए कि हम अपने आप को सुखी बनाने के लिए आंतरिक शांति महसूस करने के लिए हम कैसे धर्मवान बने तो कैसे विकारों से छुटकारा पाएं और सारी बातें गौण ये प्रमुख बाद और चल पड़े इस रास्ते पर तो खूब समझ में आने लगेगा। जैसे कि देश के पुराने ऋषियों को, मुनियों को, अरहंतों को, बुद्धों को समझ में आया कि भाई धर्म के तीन पांव होते हैं। तीन चरण होते हैं। तीन सोपान होते हैं। पहले को कहते हैं शील, सदाचार। माने वाणी और शरीर से कोई ऐसा काम नहीं करें जिससे अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होती हो। कोई ऐसा काम नहीं करे जिससे अन्य लोगों का अमंगल होता हो। अनिष्ट होता हो। उसी को कहा शील उसी को कहा सदाचार। दूसरा कदम मन को वश में कैसे करें? आदमी खूब समझ जाए कि मुझको वाणी और शरीर से कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जो औरों को हानि पहुंचाता है। लेकिन फिर भी बेचारे का मन वश में नहीं है तो क्या करें? तो धर्म का दूसरा कदम सिखाया जाता है। मन को वश में करना सीखो। मन के मालिक बनो। मन के गुलाम नहीं। मन के मालिक ही बन गए। लेकिन फिर भी अंतर्मन की गहराइयों में अनेक जन्मों से और कुछ लोग ऐसे होते हैं अनेक जन्म को नहीं मानते हैं ना माने इस जन्म में भी हमने कितने विकार इकट्ठे किए ऐसा एक स्वभाव बना लिया जब देखो तो विकार ही पैदा करेंगे राग पैदा करेंगे द्वेष पैदा करेंगे ईर्ष्या पैदा करेंगे अहंकार पैदा करेंगे मासरी पैदा करेंगे दर्मनस पैदा करेंगे कोई ना कोई विकार पैदा करेंगे यह हमारे मानस का स्वभाव बना लिया इस स्वभाव शिकंजे के बाहर इस मानस को कैसे निकालें? तो यह सबसे महत्वपूर्ण कदम चित्त को विकारों से मुक्त कैसे करें? वो भी जड़ों तक कैसे मुक्त करें? तो शील कहा दूसरे को समाधि कहा। तीसरे को प्रज्ञा कहा। अपने प्रत्यक्ष ज्ञान से आदमी देखता है कि देख व्याकुल हुआ ना। मैंने विकार जगाए और व्याकुल हुआ ना? अंतर्मुखी होकर देखिएगा तब ना मालूम होगा अन्यथा जान ही नहीं पाएगा धोखे में रह जाएगा जिस दिन भारत की यह पुरातन विद्या कि अपने आप को जानो अपने भीतर जो सत्य है जो धर्म है जो कुदरत का कानून है जो विश्व का विधान है जो रीत है उसको जानते हुए प्रज्ञा जगाओ तो ऋतम भरा प्रज्ञा होगी ऋत को जानती हुई प्रज्ञा होगी तो खूब समझेगा देख विकार जागा और व्याकुल हुआ ना अब तो क्या होता है विकार जागते ही अपनी ओर नहीं देखता क्रोध आया तो क्रोध के आलंबन को देखेगा उस व्यक्ति ने मुझे गाली दी उस व्यक्ति ने मेरा अपमान किया यह अनचाही बात हो गई यह मनचाही बात नहीं हुई तो क्रोध इस बात पर आया उस बात पर आया मन में वही घूमता रहेगा उसने ऐसा किया और क्रोध में अपने आप को जलाए जा रहा है। व्याकुल हुए जा रहा है। जिस दिन आत्ममुखी होकर के स्वयं हो करके अंतर्मुखी होकर के अपने भीतर की सच्चाई देखने लगेगा। उस दिन धर्म देखने लगेगा। अरे उसने गाली दी उसने मेरा अनादर किया, अपमान किया। ये उसकी समस्या है ना। मेरी थोड़ी है। जिसने गाली दी उसने अपने मन में क्रोध जगाया तब ना गाली दी। अरे क्रोध जगाया तो वो व्याकुल हुआ। यह उसका प्रॉब्लम है। वो प्रॉब्लम मेरे सिर पर क्यों लगाऊं? उसको देखकर मैं क्यों व्याकुल हूं? मैं क्यों अपने भीतर अग्नि जलाऊं? क्रोध जगाऊं? कब होगा? इन प्रवचनों से नहीं होता। जरा भी नहीं होता। मेरा अपना अनुभव अनेकों का अनुभव। यह शास्त्रों के पढ़ने से नहीं होता। यह भीतर सच्चाई को देखतेदे अनुभव होते जो प्रज्ञा जागेगी अपनी प्रज्ञा जागेगी। परोक्ष नहीं प्रत्यक्ष प्रज्ञा जागेगी। सुनी सुनाई बात नहीं, पढ़ी पढ़ाई बात नहीं। हमने स्वयं जाना है। विकार जगाते ही प्रकृति मुझे दंड देने लगती है। तत्काल बाहर का कारण चाहे जैसा

### [25:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=1500s) Segment 6 (25:00 - 30:00)

दंड देने लगती है। बाहर का कारण चाहे जैसा हो। क्योंकि मैंने विकार जगाया है। मुझको दंड मिलने वाला है। मिलता ही है। देख मिला ना। तो दूसरी बार जरा हिचकेगा। विकार जगाते हुए। फिर गलती से जगा लेगा। फिर देखेगा। अरे जलने लगा ना फिर हिचकेगा। यूं करते-करते उस स्वभाव के बाहर निकलना शुरू हो जाएगा। अनजाने में किसी आदमी ने आग पर हाथ रख दिया। हाथ रखा कि जला हाथ पीछे खींचता है। जलना नहीं अच्छा लगा। फिर कभी गलती से रख दिया। फिर हाथ जला फिर हाथ खींचता है। अरे नहीं ये तो आग है ये जलाती है। बड़ा सजग हो जाएगा। आग है जलाती है। अनुभव हुआ है ना। अनुभव हुआ आग पर हाथ रख के। इसी प्रकार अंतर्मुखी होकर के जब यह अनुभव होने लगेगा अरे देखिए आग है ना मैंने विकार जगाया और जलने लगा भीतर जलने लगा जलना नहीं अच्छा लगता कभी अपनी ओर देखते नहीं ना व्याकुल होना किसको अच्छा लगेगा दुखी बेचैन होना किसको अच्छा लगेगा बेचैनी में पिसे जा रहे हैं दुख जलन में जले जा रहे हैं और मानस हमारा बाहर के किसी आलंबन में है उसने ऐसा कह दिया उसने ऐसा कर दिया ऐसी बात हो गई वैसी हो गई और यह आग बढ़ाए जा रहे हैं तो भाई धर्म नहीं समझ में आया ना यह प्रवचनों से नहीं समझ में आने वाला थोड़ी देर बुद्धि विलास हो जाएगा थोड़ी देर वाणी विलास हो जाएगा अब समझ गया धर्म खूब समझ गया व्यवहार में नहीं आएगा और जिस दिन अंतर्मुखी होकर अपने आप को देखना सीख लोगे और उस अभ्यास में पारंगत होते चले जाओगे अपने आप उसके बाहर निकलना शुरू हो जाएगा समय लगेगा आज देखने लगे और आज ही हम बिल्कुल पारंगत हो गए सो नहीं होता लेकिन एक विद्या मिल जाएगी अपने आप को देखें तो इसीलिए संतों ने कहा आपो जाने आपो आप रोगन व्यापे तीनों ताप जो अपने आप को जानने लगा अपने बारे में क्या सच्चाई है इसे जानने लगा वो सारे भव तापों से मुक्त होने लगा। सारे दुखों क्योंकि उसने सारे कानून को अनुभूति के स्तर पर जान लिया। यह होगा तो दुखी हो ही जाऊंगा। ये नहीं होगा तो दुखी नहीं होऊंगा। बाहर की घटना चाहे जैसे घटे मैंने विकार नहीं जगाया। तो मैं तो दुखी नहीं हुआ। बाहर की घटना चाहे जैसे घटे। मैंने विकार जगाया। मैं तो दुखी हो गया। अरे तो मेरे दुख का कारण मेरे भीतर का जगा हुआ विकार है ना। ना कि बाहर की घटना है। यह बात जिस दिन अनुभूति से समझ में आने लगेगी, जीवन बदलता चला जाएगा, जीवन बदलता चला जाएगा। फिर वो आदमी अपने आप को हिंदू कहे बड़ी अच्छी बात। बौद्ध जैन कहे बड़ी अच्छी बात। मुस्लिम कहे बड़ी अच्छी बात। ईसाई कहे कि यहूदी कहे कुछ फर्क नहीं पड़ता। अब वो व्यक्ति धार्मिक होने लगा। अपनी सुख शांति का मालिक होने लगा। औरों के लिए भी सुख शांति देने वाला होने लगा। अन्यथा अपने आप को भी दुखी करता है औरों है। तो बेचारे को धर्म समझ में नहीं आया। धर्म के नाम पर उलझ गया। तो इस तीन दिनों के प्रवचनों में पहले शील सदाचार की बात को समझें। जैसे अभी कहा पहला कदम है और आखरी कदम भी है। पहला कदम इस मायने में है कि जब कभी आदमी अपने मन को एकाग्र करने का कोई अभ्यास करेगा तो कम से कम उतने समय के लिए जैसे लोग 10 दिन के किसी शिविर में आते हैं कि विद्या सीखने के लिए आत्ममुखी होकर के स्वयं मुखी होकर के अपने भीतर की सच्चाई को कैसे देखें? धर्म का दर्शन कैसे करें? इस काम के लिए आते हैं तो कम से कम जब तक वह काम कर रहे हैं तब तक शील सदाचार का पालन करना अनिवार्य है। क्यों? कि शील तोड़ते चले जाएंगे। सदाचार तोड़ते चले जाएंगे तो भीतर से इतनी व्याकुलता होगी कि चित्त को एकाग्र कर ही नहीं पाएंगे। चित्त को निर्मल करना तो दूर रहा। हम एकाग्र ही नहीं कर पाएंगे। तो इसलिए पहला कदम इस मायने में लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ते जाएंगे चित्त को एकाग्र करना सीख लिया। चित्त के मालिक होने लगे। चित्त को निर्मल करना सीख लिया। चित्त निर्मल होने लगा। अब वो शिव जीवन में बोलने लगेगा। जीवन व्यवहार में बोलने लगेगा। अब ये व्यक्ति का आचरण बदलने लगा। क्योंकि इसका मानस बदलने लगा। इसके मानस के विकार निकलने लगे। वह उसका परिणाम भी शील होगा। सदाचार का जीवन होगा और विद्या सीखने के लिए पहला कदम भी शील होगा। सदाचार होगा। क्या शील क्या सदाचार? जैसे अभी कहा कोई

### [30:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=1800s) Segment 7 (30:00 - 35:00)

ऐसा काम शरीर से या वाणी से नहीं करेंगे जिससे अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होती हो। हत्या नहीं करेंगे। चोरी नहीं करेंगे। व्यभचार नहीं करेंगे, झूठ नहीं बोलेंगे, कड़वी बात नहीं बोलेंगे, चुगली की बात नहीं बोलेंगे, पर निंदा की बात नहीं बोलेंगे। इनमें से कोई सा भी काम किया हिंसा करने का काम किया चोरी व्यभचार का काम किया कड़वी बात बोलने का काम किया चुगली की झूठी बात बोलने का काम किया अंतर्मुखी होंगे तो देखेंगे कि जैसे ही किया भीतर से व्याकुल होने लगे और सारे वातावरण को हमने संस्थापित कर दिया। यह खूब समझ में आने लगेगा कि हमने एटमॉस्फियर को कितना पोल्यूशन से भर दिया। ये जो केमिकल पोलशंस वगैरह है इनके सामने कुछ नहीं। जो विकारों का पोल्यूशन है सारे एटमॉस्फियर में समा जाता है। मैं क्रोध पैदा करता हूं। सारे वातावरण में क्रोध की तरंगे, क्रोध की तरंगे इतना पोल्यूशन बढ़ जाएगा। हर आदमी को वो वातावरण काटने लगेगा। मैं अपने अंदर मैत्री जगाऊंगा, करुणा जगाऊंगा, सद्भावना जगाऊंगा तो सारा पोल्यूशन दूर होगा। जैसे सारा वातावरण कितनी स्वस्थता से भर गया। हर व्यक्ति उसने बड़ा स्वस्थ महसूस करेगा तो यह बात अनुभव से समझ में आने लगेगी। उपदेशों की बात नहीं रहेगी। हत्या नहीं करें, चोरी नहीं करें, व्यभचार नहीं करें, झूठ नहीं बोले, कड़वी बात नहीं बोले, चुगली की बात नहीं बोले। पर निंदा वाणी से कोई ऐसा काम नहीं करें जिससे अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होती हो। एक लंबा इतिहास है अपने यहां। कुछ भारत के पुराने साहित्य भारत से दुर्भाग्य से लुप्त हो गए। पड़ोसी देशों में पड़े हैं। उन्हें देखने से मालूम होता है एक बड़ा रोचक इतिहास है कि मानव जाति एक समय घुमक्कड़ जाती थी। इधरउधर घूमती थी। फिर धीरे-धीरे बसने लगी। क्योंकि उसने देखा इस धरती में ये तो बड़ी उपजाऊ धरती है। इसमें अनाज उगता है। अरे इसमें फल उगता है। इसमें सब्जियां उगती है। अरे तो ये उगाएंगे खेती का काम करेंगे और अपने पशुओं का पालन करेंगे तो क्यों इधर-उधर घूमते फिरे? बसने लगे। तो आरंभ यह हुआ कि जहां जो लोग इकट्ठे हो गए बस गए सब खेतों में काम करेंगे जो उपजेगा वो मिलकर के बांटेंगे सबका है वो किसी एक व्यक्ति का नहीं है लगता है कई वर्षों तक हो सकता है कुछ सदियों तक यह बात चली मनुष्य स्वभाव उसमें से कोई इक्कादुक्का आदमी ऐसा निकला कि अरे मेहनत करूं परिश्रम करूं खेत में जाकर करके तो भी मुझे अपने हिस्से का तो वही मिलना है। नए करूं तो भी तो हिस्से का तो मिलना ही है। वो घर में तान के सोने लगा नहीं काम करता। उसके देखतेदेखते दो सोने लगे। चार सोने लगे तो लोगों को चिंता हुई कि लोग काम नहीं करेंगे तो उपज कैसे होगी? तो बंटवारा कर दिया। लोगों को अपनेप खेत बांट के दे दिए। भाई तू मेहनत करेगा तेरे खेत में जो उपजेगा सुख है ना तू नहीं मेहनत करेगा तुझे कुछ नहीं मिलेगा। काम शुरू हुआ। जो लोग आलसी थे नहीं काम करने वाले थे अपने खेत में भी नहीं काम किया तो पेट कैसे भरेंगे? तो इसकी खेती से चुरा लाए। उसकी उपज में से चुरा लाए। पहले पहल मनुष्य समाज में चोरी की बात शुरू हुई। चुराने लगे। फिर आगे बढ़े, झपटने लगे, छीनने लगे। डकैती करने लगे। फिर आगे बढ़े और परस्पर झगड़ा तू मैंम करने लगे। गाली गलौज करने लगे। बात बढ़ती गई, विकार बढ़ते गए। तो सब ने मिलकर के यह सोचा कि हम पर एक कोई शासक होना चाहिए और वो नियम बनाए। उस नियमों के अनुसार सबको चलना होगा और जो नियम को तोड़ेगा उसको राज्य की ओर से दंड मिलेगा। तो सबसे पहले मनुष्य समाज ने चुनकर के अपना एक शासक बनाया। उन दिनों की पुरानी भाषा में उसे महासम्मत कहा गया। माने सबकी सम्मति से इस महासमूह की सम्मति से यह व्यक्ति बना है शासक हमारा पड़ोसी देश में आज भी देश के प्रेसिडेंट के लिए सम्मत शब्द का इस्तेमाल होता है। महासम्मत है ये सबके चुनाव से बना है। अब अपनी उपज

### [35:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=2100s) Segment 8 (35:00 - 40:00)

का कुछ हिस्सा इसे देना पड़ेगा ताकि यह व्यवस्था कर सके। और हम में से कोई भी नियम तोड़ेगा उसको यह दंड देगा। चलिए कुछ दिनों बाद डंडे के जोर पर कब तक चलती? चारों नियम बने। यही चार नियम बने कि एक व्यक्ति किसी दूसरे की हत्या नहीं करेगा, चोरी नहीं करेगा, व्यभचार नहीं करेगा, झूठ नहीं बोलेगा, किसी को ठगने की कोशिश नहीं करेगा, कड़वी बात नहीं बोलेगा, चुगली की बात नहीं बोलेगा। इत्यादि नियम बने। उस समय का इतिहास बताता है कि किसी व्यक्ति ने ढूंढ लिया कि इस पेड़ की या इस लता के पत्तों से इनको सड़ाया जाए, रस निकाला जाए तो अरे बड़ा मादक पदार्थ तैयार होता है रे। बड़ा मजा आता है। बड़ा नशा आता है। तो लोग कुछ लोग इस नशे की ओर जाने लगे। इन पेड़ पत्तों से बना हुआ नशा अनाज और फिर इसके बाद इसी तरह से गांजा अफीम इत्यादि अनेक निकले तो ये चतुरयाम ये जो चार नियम थे उनकी जगह पांचवा नियम आया नशे पते से बचना होगा कोई नशा पता नहीं करे कुछ आगे बढ़े तो नशा पता केवल भांग और शराब इत्यादि का ही नहीं होता नशा पता जुए का भी होता है जो व्यक्ति जुए में लग गया। ऐसा नशा चढ़ता है। अब वो झूठ भी बोलेगा, कपट भी करेगा, सब कुछ करेगा। क्योंकि वह एक नशा है। जैसे मादक पदार्थ का सेवन करने वाला आदमी खूब समझता है। मुझे चतुरयाम का पालन करना चाहिए, हत्या नहीं करनी चाहिए, चोरी नहीं करनी चाहिए, व्यभचार नहीं करना चाहिए, झूठ नहीं बोलना चाहिए। फिर भी उस नशे में सब कुछ करेगा। ठीक इसी प्रकार यह भी नशा है जीए का। तो उसके साथ जोड़ा प्रमादना यह प्रमाद का और जितने भी स्थान है उनसे भी बचेगा तो जुआ एक प्रमाद का स्थान है नशे का स्थान है और देखा आगे चलते-चलते अरे एक और नशा है जो और भी बड़ा नशा है धन का नशा है जैसेजैसे घर में धन आते जाता है इतना नशा चढ़ता है कि बाकी सारे नशे उसके सामने तुच्छ हो जाते हैं तो कहा कनक ते सो गुणी ओ मादकता अधिकाए वो खाए बोराय नर ये पाए बराए ये जो नशे की चीज है और जो कनक सोना है इन दोनों में मादकता है लेकिन जो सोने की मादकता है धन की मादकता है वो तो हाथ में आते ही मादक हो जाता है। इसे तो खाना पड़ता है तब मादक होता है। बड़ा नशा आता है। धन कमाना कोई बुरी बात नहीं। गृहस्थ हैं अपना भरण पोषण करना है। अपने परिवार का भरण पोषण करना है तो ईमानदारी के साथ परिश्रम के साथ धन कमाने में कोई दोष नहीं। किसी गृहस्थ को हाथ पसार करके कंगाल नहीं होना चाहिए। किसी सन्यासी को धन एकत्र नहीं कर लेना चाहिए। उसके लिए अधर्म की बात हो गई। इसी प्रकार किसी गृहस्थ को कंगाल होकर हाथ पसारना अधर्म की बात हो गई तो परिश्रम करें कोई दोष नहीं ईमानदारी के साथ धन कमाए लेकिन ख्याल करें कि उसका नशा ना चढ़ जाए उसकी मादकता ना आ जाए परिग्रह ऐसा ना हो जाए जो हमको पागल बना दे तो होश हो तो एक नियम उस समय और लगा सम विभाग करो दान शब्द तो बहुत बाद में आया पुराना साहित्य उसमें सम विभाग शब्द का इस्तेमाल हुआ तेरे पास जो कुछ आया समाज से आया तो बांट उसे अपने भरण पोषण के लिए इस्तेमाल कर अपने परिवार के व्यापार रोजगार के लिए कोई पूंजी चाहिए उसके लिए रख लेकिन एक हिस्सा समाज कल्याण के लिए लोगों के कल्याण के लिए तुझे समविभाग करना पड़ेगा तो अहंकार नहीं जागेगा धन कमाएगा तो केवल मेरे लिए नहीं कमा रहा हूं सारे समाज के लिए करा रहा हूं सारा समाज उसमें हिस्सेदार है यह धर्म का लक्षण। यह बातें धीरे धीरे-धीरे चली। लेकिन कानून तो कानून है। डंडे के जोर से हम दंड देकर के किसी आदमी को धर्मवान बनाए। ये होने वाली बात नहीं। तो देश के संतों ने, सद्गुरुओं ने, महापुरुषों ने, अपने ढंग से समझाया लोगों को। डंडे की बात नहीं। तू समझ भाई कोई तुझे आकर के मारना चाहे तो तुझे अच्छा लगेगा बहुत बुरा लगेगा कोई मुझे मारे मुझे कैसे अच्छा लगेगा तो ऐसे ही तू किसी को मारेगा उसको कैसे अच्छा लगेगा अच्छा तो

### [40:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=2400s) Segment 9 (40:00 - 45:00)

नहीं लगेगा तेरी कोई बड़ी प्रिय वस्तु आगे कोई चुरा के ले जाए तुझे अच्छा लगेगा नहीं अच्छा लगेगा बहुत बुरा लगेगा तू किसी की प्रिय वस्तु चुराता है उसे कैसे अच्छा लगेगा बुरा लगेगा। तेरे परिवार के किसी सदस्य के साथ कोई व्यभचार कर ले तुझे बुरा लगेगा ना। तो इसी प्रकार तू किसी के परिवार के सदस्य के साथ व्यभचार करता है उन परिवार वालों को बुरा लगेगा ना? कोई तुझे झूठ बोल के ठगता है तुझे बुरा लगेगा ना? तो तू किसी को ठगेगा तो उसे बुरा लगेगा ना? कोई तेरी चुगली खाता है, तेरी निंदा करता है, कड़वी बात तुझे कहता है तुझे बुरा लगेगा ना? तो ऐसे औरों को बुरा लगेगा। तो अरे अपने आप को समझ भाई जो बात तुझे बुरी लगती है वो सबको बुरी लगती है। तुझे बचना चाहिए। कुछ लोग समझे इस तरह से। कुछ लोगों को यूं समझाया गया कि देख भाई तू अगर इस तरह का दुष्कर्म करते चला जाएगा तो मरने के बाद तुझे नरक मिलेगा। और इस तरह के दुष्कर्म नहीं करेगा, सत्कर्म करेगा, मरने के बाद तुझे स्वर्ग मिलेगा। कुछ लोग ऐसे उनको इस तरह की बातें समझ में आई कि मरने के बाद ना बाबा ना मैं नर्क नहीं जाना चाहता। मरने के बाद मैं स्वर्ग जाना चाहता हूं। इसलिए चलो बचता हूं दुष्कर्म से। सब लोग तो ऐसे नहीं होते। वो कहते हैं जो मरने के बाद जो होगा सो होगा। अब क्या होता है? हम नहीं मानते मरने के बाद की बात। अच्छी बात। और एक तरीके से समझाया उनको। देख भाई मनुष्य हो ना। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसको समाज के साथ रहना पड़ता है। परिवार अगर तूने समाज में परिवार में सर्वत्र वातावरण में तूने अशांति पैदा कर दी। बेचैनी पैदा कर दी। तुझे शांति कैसे मिलेगी? अगर तू अपने चारों ओर आग लगा ले तो तुझे शीतलता कैसे प्राप्त होगी? वो आग के संताप में तू भी तो जलेगा। तू अगर शील सदाचार तोड़ करके सारे वातावरण को दुखी बनाता है, संतापित बनाता है, तुझे उसी वातावरण में रहना है ना, तुझे शांति कैसे मिलेगी? तू जरा सोच तू जरा समझ। कुछ लोग इस प्रकार समझे। तो भिन्न-भिन्न लोगों को हमारे देश के महापुरुषों ने भिन्न-भिन्न लोगों को उनका मानसिक धरा तो देख के यह व्यक्ति इस बात को इसी प्रकार समझ सकेगा। तरह समझ सकेगा। यूं समझाया। लेकिन देखा कुछ लोग ऐसे हैं कि जो बड़े वैज्ञानिक ढंग से हर बात को देखते हैं। उनको गहराई से बात समझाई कि तू देख जब तू किसी की हत्या करता है। देख तू जरा अपने भीतर देखना सीख। सिखाया उनको भीतर देखना। देख भीतर देखना। जब किसी की हत्या करता है तू अपने भीतर क्रोध जगाता है, द्वेष जगाता है, दुर्भावना जगाता है। तब किसी की हत्या करता है। मैत्री जगाए, करुणा जगाए, सद्भावना जगाए और किसी की हत्या करे। ऐसा तो नहीं होता ना। तो देख तू विकार जगाता है कि नहीं? बात तो ठीक है। जब मैं किसी का प्राण लेता हूं तो भीतर क्रोध जगाऊं तो ही ले सकता हूं। नहीं तो नहीं ले सकता। तू जब चोरी करता है तेरे मन में लोभ जगाता है ना। लालच जगाता है ना लोभ भी नहीं जागे लालच भी नहीं जागे और तू चोरी कर ले ऐसा तो नहीं होता ना बात तो ठीक है लोभ जगाता हूं लोभ का विकार जगाता हूं जब व्यभचार करता है वासना जगाता है वासना का विकार बड़ा तेज करता है तब व्यभचार करता है बात तो ठीक है जब तू झूठ बोलता है कड़वी बात बोलता है द्वेष की बात बोलता है निंदा तो भीतर कोई ना कोई विकार जगाता है अहंकार जगाता और देख जब ये भी विकार जगाता है किसी तरह के विकार जगाए तू अपने मन की क्षमता खो देता है। तू अपने मन का संतुलन खो देता है। और जैसे ही मन की क्षमता खोई कि संतुलन खोया तू व्याकुल हो गया। बेचैन हो गया। अरे किसी दूसरे की हानि तो पीछे करेगा। पहले तो अपनी हानि करने लगा। हत्या किसी की करेगा और वो हत्या की वजह से वो आदमी व्याकुल हुआ, दुखियारा हुआ। उसके परिवार वाले व्याकुल हुए दुखियारे हुए यह पीछे होगा पहले तो तूने क्रोध जगाया ना तो कहा पुे हतिंग पक्षा हति सो परे अरे तू पहले तेरी हत्या करता है उसके बाद किसी और की हत्या करता है पहले तू अपनी सुख शांति की हत्या करता है उसके बाद किसी दूसरे की सुख शांति की हत्या होती है तो तू अपना स्वार्थ ही समझ भाई तेरा सही स्वार्थ किस बात में है देख तू कर क्या रहा है हर बार जब तू विकार जगाता है वो विकार के बाद जो तू वाणी से

### [45:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=2700s) Segment 10 (45:00 - 50:00)

शरीर से दुष्कर्म करता है उस दुष्कर्म से वातावरण दूषित होता है। लोग दुखियारे होते हैं। ये तो पीछे होता है। पहले तो तू व्याकुल हो जाता है। तेरे मन में जागा हुआ हर विकार तुझे व्याकुल बनाता है। दुखियारा बनाता है। बेचैन बनाता है। और चाहता तो शांति है ना तू। हर व्यक्ति शांति चाहता है। संसार में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो सुख शांति ना चाहे। चाहता तो है पर कैसे प्राप्त करें बेचारे को पता नहीं। चाहता तो सुख शांति है और सारे काम ऐसे करता है जो उसको सुख शांति से दूर ले जाते हैं। जो काम करता है वो मन में विकार जगाकर करता है। मन में विकार जगाता है। सुख शांति से दूर होते जा रहा है। अरे तो तू अपने लक्ष्य के दूर होते जा रहा है ना भाई। तू नहीं चाहता कि तू दुखी हो, बेचैन अशांत हो। लेकिन फिर भी करता यही है। जब देखो तब अपने मन में विकार जगाता है। कभी क्रोध जगा दिया, कभी वासना जगा दी, कभी ईर्ष्या जगा दी, कभी भय जगा दिया, कभी अहंकार जगा दिया और हो गया व्याकुल। हो गया। अरे तू अपने भीतर नहीं देखता ना। तू अपने आप को नहीं जानता। बाहर की सारी बातों को जानने का इतना प्रयत्न करता है। तेरे भीतर क्या हो रहा है इसको जान। यह तेरे लिए ज्यादा काम की बात है। पंजाब का एक संत कहता है संत है। मुस्लिम हो, हिंदू हो, जैन हो, बौद्ध हो कोई फर्क नहीं पड़ता। जिसने अपने मन को निर्मल करके शांत कर लिया वो संत हो गया। तो पंजाब का एक मुस्लिम संत कहता है कि हाशम तनहा रब पछाता ओ जिन्हा अपना आप पछाता जिसने अपने आप को पहचान लिया अपने आप को जान लिया उसने रब को जान लिया परमात्मा को जान लिया क्या परमात्मा होता है सत्य ही तो ईश्वर है परम सत्य ही तो परमेश्वर है अपने भीतर की सच्चाई को जान लिया, कुदरत के कानून को जान लिया, विश्व के विधान को जान लिया, निस्ग को जान लिया, ऋत को जान लिया, स्वभाव को जान लिया और उस स्वभाव के अनुसार अपना जीवन डालने लगा, सुख्यारा हो गया। दुखों से मुक्त हो गया। तो ऐसा व्यक्ति जो अपने आप को नहीं जान पाया, वो बेचारा धोखे में रह गया। सारा जीवन कुदरत का कानून तो वैसा ही है जैसा बाहर है। ठीक वैसा ही अपने भीतर काम कर रहा है। बाहर जो कुदरत का कानून काम करता है उसे हम बुद्धि से समझ सकते हैं। अनुभव से नहीं। बुद्धि बेचारे की अपनी सीमा है और अनुभव की सीमा नहीं। अनुभव असीम होता है। तो वही कानून जब हम अपने भीतर अनुभव से जानने लगेंगे तो असीम को जान लेंगे। अन्यथा ऊपर से बुद्धि के स्तर पर कानून जान के रह जाएंगे। इसीलिए भारत का एक महान संत कहता है कि बाहर भीतर एक को सच है। यह गुरु ज्ञान बताई रे। बाहर भीतर एक सच है जन नानक बिनया आपा चिने और कटे ना भ्रम की काई रे। कानून वो का वो है जो बाहर और लोगों पर लागू होता है वही मुझ पर लागू होता है। लेकिन जब तक हम अपने भीतर इस कानून को इस धर्म को इस सच्चाई को अपने भीतर अनुभूतियों से नहीं जानते तब तक भ्रम का जीवन जीते हैं। भ्रांति और ऐसा मनुष्य का जीवन, इतना कीमती जीवन, इतना मूल्यवान जीवन और उसको इस भ्रम भ्रांति में निकाल दें। मूल्यवान किस मायने में? मूल्यवान इस मायने में कि प्रकृति ने या यूं कहें परमात्मा ने केवल मनुष्य को इतनी बड़ी शक्ति दी है कि यह अंतर्मुखी हो सकता है। अंतर्मुखी होकर के सच्चाई को देख सकता है। सच्चाई को देखकर के कुदरत के कानून को समझ सकता है। धर्म को समझ सकता है और उसके अनुसार अपने जीवन को ढाल करके सारे दुखों से मुक्त हो सकता है। यह काम कोई पशु नहीं कर सकता। कोई पक्षी शरीर नहीं कर सकता। कोई कीट पतंग नहीं कर सकता। कोई प्रेत प्राणी नहीं कर सकता। मनुष्य कर सकता है। तो मनुष्य को इतनी बड़ी शक्ति प्रकृति ने दी है या परमात्मा ने दी है और उसका हम उपयोग नहीं करें तो सारा जीवन भ्रम में बीतेगा। जब दुखियारे होंगे तो यूं लगेगा इसकी वजह से दुखियारा हूं। जानेगा नहीं सही कारण क्या है मेरे दुखों का। घर में किसी बुढ़िया माई को पूछो कि आजकल तुम्हारे घर में बड़ी अशांति है। क्या बात है? तो कहती है क्या करूं? यह जो नई बहू आई ना यह ऐसी आ गई कि हमारी सारी परंपरा

### [50:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=3000s) Segment 11 (50:00 - 55:00)

को तोड़ती है। कुछ नहीं समझती। हमारे मूल्यों को नहीं समझती। हमारी सभ्यता संस्कृति को नहीं समझती। हमारे धर्म को नहीं समझती। ये जरा सी सुधर जाए। फिर देखो हमारा घर स्वर्ग हो जाएगा। उस बहू से पूछो। वो कहे ये बुढ़िया कितनी खिटखिट करती है। अरे आज दुनिया बदल गई। यह जनरेशन गैप आ गया और यह अपनी पुरानी बातों को लिए बैठी है। यह बुढ़िया जरा सी समझ में आने लगे। इसको जरा सुधर जाए। फिर देखो हमारा अगर स्वर्ग बन जाएगा। बहू चाहती है स्वर्ग सासू सुधर जाए। सास चाहती है बहू सुधर जाए। बाप चाहता है बेटा सुधर जाए। बेटा चाहता है बाप सुधर जाए। ये भाई चाहता है वो भाई सुधर जाए। वो भाई चाहता है ये भाई सुधर जाए। पड़ोसी चाहता है वो पड़ोसी। दूसरे सुधर जाए। मुझको सुधरने में क्या है? मैं तो बिल्कुल ठीक हूं। मेरे में कोई खोटी नहीं। अरे तूने अपनी ओर देखा नहीं ना भाई। अपनी ओर देखता तो यह मालूम होता तुझे कि हर बार तेरे दुख में मन में जो दुख आता है उसका कारण तेरे भीतर है। तू विकार जगाता है और व्याकुल होता है। विकार जगाता बाहर की परिस्थिति चाहे जैसी हो ना। अगर मैं विकार नहीं जगाऊं मैं तो नहीं व्याकुल होता। ये बात ही नहीं समझ में आएगी। तो विकार के बाहर निकलने का काम कैसे करेंगे? क्यों करेंगे? सुन के रह जाएंगे। राग नहीं करना चाहिए, द्वेष नहीं करना चाहिए। वीत राग होना चाहिए। वीत द्वेष होना चाहिए। वीत भय होना चाहिए। वीत क्रोध होना चाहिए। चित्त को सारी बातें अध्यात्म की सारी बातें बचपन से सुनते आए हैं। बचपन से पढ़ते आए हैं। अच्छी है। खूब स्वीकार करते हैं। करेगा नहीं ना। क्योंकि उसने जाना ही नहीं कि मेरे अंदर राग कहां जागता है। मेरे भीतर द्वेष कहां जागता है। कैसे जागता है। अंतर्मुखी होकर के अपने आप को देखने का काम किया ही नहीं। तो जब तक अपने आप को देखने का काम नहीं किया तब तक अपने दुख का सही कारण नहीं समझ में आएगा और जिस दिन अंतर्मुखी होकर अपने दुख का कारण समझ में आने लगा उस दिन देखो जीवन बदलने लगा। सारे जीवन का दृष्टिकोण बदलने लगा। क्योंकि चित्त विकारों से मुक्त होने लगा। जितना-जितना मुक्त होने लगा, उतना-उतना धार्मिक होने लगा। उतना-उतना सुखी होने लगा। जितना विकारों से ग्रस्त होने लगा उतना अधार्मिक होने लगा उतनाउतना दुखियारा होने लगा यह अनुभूति से समझेगा कि देख मन मेरा बिल्कुल विकार से विहीन था और मैं कितना शांत कितना सुख और एक लहर उठी द्वेष की और देख कितना व्याकुल हो गया एक लहर उठी ईर्ष्या की वासना अहंकार की कितना व्याकुल हो गया क्यों देखिएगा जब व्याकुलता आएगी तो यह देखिएगा मेरे भीतर क्या हुआ। बाहर की घटना उसके लिए प्रमुख नहीं होगी। अब मेरे भीतर क्या हुआ यह देखिएगा। मेरे भीतर विकार जागा। देख ऐसा विकार जागा। इतना गहरा जागा। इतना जितना गहरा जागा उतना ही मुझे दुखी बनाया। अधिक दुखी हो गया। जितनी देर तक विकार रहा उतनी देर तक मैं दुखी रहा। ये सारी बात समझ में आने लगेगी। और जितनी अनुभूति से समझ में आने लगेगी उतनाउतना उसके बाहर निकलना शुरू हो जाएगा। चित्त निर्मल होना शुरू हो जाएगा। जीना आ जाएगा। तो धर्मवान हो गया। धार्मिक हो गया। अब वो व्यक्ति अपने आप को चाहे जिस नाम से पुकारे कुछ फर्क नहीं पड़ता। यह व्यक्ति का जीवन धर्म से भर गया। धर्म और क्या होता है? जीवन जीने की कला इसी का नाम धर्म है। कैसे हम स्वयं सुख शांति का जीवन जिए? और कैसे हम औरों के लिए भी सुख शांति का वातावरण निर्माण करें। बस धर्म है। ना यह हिंदू है, ना यह बौद्ध है, ना यह जैन है, ना ईसाई है। और यह हिंदू भी है, बौद्ध भी है, जैन भी है, ईसाई भी है। सब है। क्योंकि हर धर्म की मूल बात तो यही है। हर संप्रदाय की, हर समाज की बात तो यही है। अपने मन को निर्मल रखो। अपने शरीर और वाणी से कोई ऐसा काम मत करो जिससे औरों की सुख शांति भंग होती हो। है कोई संसार में ऐसा कोई भी मजहब कोई ऐसा अपने आप को धर्म कहने वाला कोई भी समुदाय ऐसा है जो कहता हो कि तुम चाहे जितने दुष्कर्म करो कोई दोष नहीं इसमें कोई ऐसा कहने वाला है कि अपने मन को चाहे जैसे विकारों से भरो कोई दोष की बात नहीं है। सब तो एक स्वर से कहते हैं अपने मन को निर्मल करो। विकारों से छुटकारा पाओ और शरीर और वाणी से कोई ऐसा काम मत करो जिससे अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होती हो। कैसे नहीं करें? यह विद्या जब तक लुप्त रहेगी तब तक धर्म केवल बुद्धि विलास का विषय रहेगा। वाणी उसको जीवन में उतारने का जो काम है उससे वंचित हो जाएंगे। खूब समझते हैं। एक शराबी खूब जानता है मुझे शराब नहीं पीनी चाहिए। एक जुारी खूब जानता है मुझे जुआ नहीं खेलना चाहिए। देख बर्बाद हो रहा हूं जुए से। एक व्यभिचारी जानता है बेभचार बहुत बुरा है। मुझे नहीं करना चाहिए। पर क्या करें? जब समय आता है तो नहीं रहा जाता। जुारी जुआ खेल ही जाता है। शराबी शराब पी ही जाता है। व्यभचारी विभचार कर ही जाता है।

### [55:00](https://www.youtube.com/watch?v=8mNBa58GJfY&t=3300s) Segment 12 (55:00 - 58:00)

क्यों? क्योंकि मन वश में नहीं है। महाभारत का एक प्रसंग आता है। सुन सुना होगा पढ़ा होगा। दुर्योधन कहता है जाना धर्मम न चमे प्रवृत्ति जानाम अधर्मम न चमे निवत्त अरे मैं खूब जानता हूं भाई धर्म क्या है इसे खूब जानता हूं लेकिन क्या करूं उस ओर प्रवृत्ति नहीं होती अधर्म क्या है यह भी खूब जानता हूं क्या करूं उससे निवृत्ति ही नहीं होती सोच के देखें हर आदमी की अवस्था नहीं है क्या? हम दुर्योधन को हजार गाली दे दें। हम भीतर से स्वयं दुर्योधन बने हुए हैं। चाहते हैं धर्म का जीवन जिए। अच्छा जीवन जिए। विकार नहीं जगने दें। फिर भी विकार जगाए जा रहे हैं। व्याकुल वे जा रहे हैं। उस और प्रवृत्ति नहीं हमारी और इससे निवृत्ति नहीं हमारी। विकारों से निवृत्ति नहीं। और शुद्ध धर्म का जीवन जीने की प्रवृत्ति नहीं। तो भाई कोरे बुद्धि विलास से बात नहीं बनेगी। वाणी जिस दिन धर्म धारण करने का कोई अभ्यास शुरू कर दोगे, कोई प्रैक्टिस शुरू कर दोगे और प्रैक्टिस यही है कि अपने भीतर जाकर के इस सच्चाई को देखें। इस क्षण मेरे चित्त की क्या अवस्था है? व्याकुल है तो व्याकुल है। शांत है तो शांत है। व्याकुल है तो क्यों व्याकुल है? कोई विकार जरूर जागा होगा तो व्याकुल है क्या विकार जागा है और विकार जागा है तो शरीर में क्या होने लगा मानस में विकार जागा बस उसे देखने लगा देखतेदे वो विकार दूर हो गया शांत हूं तो क्यों शांत हूं ये ऊपर की शांति है कि भीतर तक शांत हूं भीतर तक तो खूब समझ में आएगा इस समय मेरे चित्त में विकार नहीं है विकार मुझसे दूर है इसलिए शांति मालूम हो रही इसलिए सुख मालूम हो रहा है। यह जैसे-जैसे अनुभव में आता चला जाएगा, जैसे-जैसे अनुभूति वाली प्रज्ञा, अपनी प्रज्ञा प्रत्यक्ष ज्ञान जागना शुरू हो जाएगा, वैसे-वैसे देखोगे, वैसे-वैसे देखोगे विकारों से मुक्ति होती जा रही है। तो दुखों अशांति और बेचैनियों से मुक्ति होती जा रही है। सुख आ रहा है, शांति आ रही है। जीवन जीने की कला आ रही है। अपना भी भला होता है। औरों का मानव जीवन की सफलता प्राप्त होती है। लोक सुधरता है। परलोक सुधरता है। जिसका लोक ही नहीं सुधरा वो परलोक की क्या आशा करेगा? मुझे अपना लोक सुधारना है। मैं स्वयं सुख शांति का जीवन जीू औरों के लिए सुख शांति का वातावरण तैयार करूं। इसके लिए मैं क्या करूं? यही करें। अंतर्मुखी होकर के अपने विकारों को दूर करना सीखें। बड़ा मंगल होगा। सचमुच बड़ा कल्याण होगा। बड़ी स्वस्थि होगी, मुक्ति होगी, विकारों से मुक्ति होगी। आज के धर्म सभा में जो जो आए हैं, उन सब के भीतर धर्म का बीज है। धर्म का बीज है तो वो खच लाया धर्म सभा में। नहीं तो किसी आमोद प्रमोद की जगह जाते यहां आ गए। धर्म का बीज तो है। लेकिन भाई वो धर्म का बीज ही बना रह जाएगा। तो हमें धर्म का कैसे लाभ होगा? वो धर्म का बीज अंकुरित हो, खूब बढ़े और खूब पुष्पित हो, खूब फलित हो और जीवन सुख शांति से भर जाए। जो आज की सभा में आए वो सब धर्म के सुख शांति महसूस करें। सबका मंगल हो। सबका कल्याण हो। सबकी स्वस्थ मुक्ति हो।

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*Источник: https://ekstraktznaniy.ru/video/50469*