The Guru Trap: 10 Reasons to Run Away from Gurus Immediately
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The Guru Trap: 10 Reasons to Run Away from Gurus Immediately

Critical Thinking Forum 09.05.2026 4 540 просмотров 351 лайков

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In this thought-provoking conversation, Awdhesh challenges one of the most deeply rooted institutions in spiritual history: the Guru-Sishya tradition. While often revered, Awdhesh argues that the traditional role of the Guru has evolved into a barrier to intellectual growth and personal autonomy. By placing teachers on divine pedestals, society has often traded critical thinking for blind faith—a trade-off that leaves individuals vulnerable to exploitation and stagnation. Explore why the modern world, with its vast abundance of accessible knowledge, demands a shift from seeking a Guru to becoming your own guide. We dive deep into the importance of independent learning, the flaws in traditional authority, and why "Truth" should always be placed above the "Teacher." ________________________________________ Key Takeaways from this Discussion: • The Impact of Tradition: How the Guru-Sishya system has historically limited intellectual curiosity. • The Divinity Trap: The dangers of equating human teachers with divine figures. • Intellectual Autonomy: Why critical thinking is the most essential tool for personal development. • Modern Resources: Utilizing the internet and self-education to bypass traditional gatekeepers. • The Call to Empowerment: Shifting from a follower mindset to a seeker mindset. ________________________________________ Video Chapters: 00:00 The Role of Gurus in Spiritual Knowledge 02:52 The Guru-Sishya Tradition and Its Impact 05:51 The Evolution of Knowledge Transmission 09:09 The Limitations of the Guru System 12:06 The Need for Critical Thinking 14:51 The Flaws in Guru Authority 17:47 The Dangers of Blind Faith 21:13 The Importance of Independent Learning 24:04 The Call for Intellectual Growth 26:55 Becoming Your Own Guru ________________________________________ Connect & Grow: If you believe in the power of independent thought and the evolution of knowledge, make sure to Like, Subscribe, and hit the Notification Bell to stay updated on future discussions. How has questioning established beliefs helped your personal growth? Share your thoughts in the comments below. ________________________________________ #Awdhesh #GuruSishya #CriticalThinking #SelfEducation #IntellectualGrowth #Spirituality #Logic #TruthSeeker #PersonalDevelopment #Philosophy #mindsetshift References 1. यकीन मानिए, आपने कभी ऐसा गुरु और शिष्य नहीं देखा होगा https://navbharattimes.indiatimes.com/astro/spirituality/motivational-stories/saint-kabir-das-and-his-guru-swami-ramanand/articleshow/91087955.cms 2. Why Indian Philosophy Isn't Recognised Globally: Critical Analysis of Science, Religion & Philosophy https://youtu.be/eA7wsT9a7cI

Оглавление (10 сегментов)

The Role of Gurus in Spiritual Knowledge

हेलो दोस्तों। जब भी मैं कोई भी वीडियो बनाता हूं फिलॉसोफी पर, रिलीजन पर तो अक्सर लोग यह कमेंट करते हैं कि आपको किसी गुरु की शरण में जाना चाहिए क्योंकि यह जो आध्यात्मिक ज्ञान है यह आप बिना गुरु के नहीं सीख सकते। दोस्तों दुनिया का कोई भी ऐसा कंट्री नहीं है जहां पर गुरुओं को इतनी ज्यादाेंस दी जाती है जितना हमारे देश में दी जाती है। लेकिन मेरा यह मानना है कि जो हमारे देश की जो इंटेलेक्चुअल ग्रोथ है वो अगर दुनिया में सबसे कम है तो उसका बहुत बड़ा कारण है यह जो गुरु शिष्य परंपरा है क्योंकि इसी ने जो है पिछले हजारों साल से हमारी इंटेलेक्चुअल ग्रोथ को रोक करके रखा हुआ है। आज हम इसी के बारे में चर्चा करेंगे कि क्यों हमें गुरु शिष्य परंपरा को छोड़ने की जरूरत है। क्यों हमें अपना गुरु खुद बनने की जरूरत है? और अगर हम चाहते हैं कि दुनिया में हम कभी भी विश्व गुरु का दर्जा हासिल करें। नॉलेज लीडर बने तो इस गुरु शिष्य परंपरा से हमें जल्दी से जल्दी दूर होना पड़ेगा। दोस्तों हमारे संस्कारों में गुरु का बहुत बड़ा महत्व रहा है। आदिकाल से कहा गया है कि साहब गुरु का स्थान जो है वो भगवान के बराबर होता है। गॉड एक बहुत ही फेमस श्लोक है। गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देव महेश्वरा गुरु साक्षात परम ब्रह्मा तस्मै श्री गुरुवे नमः गुरु ही ब्रह्मा है गुरु ही विष्णु है और गुरु ही भगवान शंकर है। गुरु ही साक्षात परम ब्रह्म है। ऐसे गुरु को मैं नमन करता हूं। तो आपने देखा कि यहां पर जो गुरु का स्टेटस है उसको ईश्वर के बराबर बनाया गया है। इसी तरीके से कबीर दास जी ने भी कहा कि गुरु गोविंद दो खड़े काके लागो पाए बलिहारी गुरु आपनो जो गोविंद दियो बताए। मतलब यहां पर वह यह कहते हैं कि साहब अगर गुरु और भगवान दोनों आपके सामने खड़े हो तो आपको गुरु के पैर छूने चाहिए क्योंकि गुरु भगवान से भी ज्यादा ऊपर है क्योंकि उसी ने आपको भगवान के बारे में बताया है। कबीर दास जी ने यह भी कहा कबीर ते नर अंध है जो गुरु को कहते और हरि रूठे गुरु ठौर हैं गुरु रूठे नहीं ठौर। इसका मतलब यह है कि अगर आपसे भगवान भी रूठ जाए, नाराज हो जाए तो आप गुरु की शरण में जा सकते हैं। लेकिन अगर गुरु आपसे नाराज हो जाए तो आप

The Guru-Sishya Tradition and Its Impact

कहीं भी नहीं जा सकते। तो यहां पर आपने देखा कि उन्होंने गुरु का जो स्थान है वह कितना ऊपर रखा है कि गुरु के बिना कुछ ज्ञान संभव नहीं है। हालांकि कबीर दास जी भी इस बात को जानते थे कि अच्छा गुरु मिलना बहुत जरूरी है क्योंकि अगर जो है गलत गुरु मिल गया तो वो आपको बर्बाद भी कर सकता है। इसीलिए उन्होंने कहा जाका गुरु भी अंधला चेला खरा निरंद अंधा अंधे ठेलिया धुंधु कूप पड़ंत। इसका मतलब यह है कि अगर गुरु अंधा हो और शिष्य भी अंधा हो तो उस तरीके से जैसे एक अंधा आदमी दूसरे अंधे आदमी को लेकर के जाए और दोनों अल्टीमेटली एक कुएं में गिर पड़ेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि गुरु लोभी शिष्य लालची दोनों देखें दांव दोनों बूढ़े बापरे चढ़ पत्थर की नाव। मतलब अगर गुरु जो है वह लोभी हो, शिष से लालची हो तो दोनों एक दूसरे के साथ दांव खेलते रहते हैं और अल्टीमेटली जैसे पत्थर की नाव पे अगर आप सफर करेंगे तो वो डूब जाएगी उसी तरीके से आप भी उसमें डूब जाएंगे। लेकिन जो बातें एकदम क्लियर है कबीर दास जी की वाणी से वो यह है कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं है। और इसका सबसे बड़ा एग्जांपल कबीर दास जी खुद थे। क्योंकि उनको यह मालूम था कि बिना गुरु के हमें काम नहीं बनेगा, ज्ञान नहीं मिलेगा। तो सबसे पहली बात जो उनके दिमाग में आई किसको वह गुरु बनाएं। अब उस समय एक रामानंद नाम के एक संत थे जो बहुत ही उच्च कोट के महापुरुष माने जाते थे और कबीर दास जी बड़े ही लोअर कास्ट में जन्मे थे। तो वह उनका गुरु बनाना चाहते थे। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। अब कबीर दास के दिमाग में यह बात बैठी हुई थी कि बिना गुरु के तो ज्ञान मिल नहीं सकता। तो क्या हुआ कि जो रामानंद जी थे वह रोज सुबह गंगा नहाने के लिए जाते थे और जब वो जा रहे थे तो कबीर दास जी सीढ़ियों के नीचे लेट गए और जब उनका पैर जो है रामानंद जी का उनके ऊपर पड़ा तो एकदम से वो अचकचा गए और उनके मुंह से निकला राम और कबीर दास जी का तो इससे काम ही बन गया। उन्होंने जो है इसको गुरु मंत्र मान करके उनको गुरु बना दिया और फिर उन्होंने जो है अब उनको सेटिस्फेक्शन था कि अब मेरा गुरु हो गया और इस वजह से अब उन्होंने मैं ज्ञान प्राप्त कर सकता हूं। जबकि कभी भी जो रामानंद जी थे उन्होंने उनको कभी ज्ञान नहीं दिया। और कबीर दास जी का जो स्टेटस था वो रामानंद जी से कहीं ऊपर था। लेकिन फिर भी यह जो दिमाग में बात है वो यह है कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं वो उनके अंदर बहुत डीपली बैठी हुई थी। गौतम बुद्ध के बारे में भी आपको मालूम होगा कि उन्होंने सालों साल तक गुरुओं के शरण में जाकर के ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश की। लेकिन अल्टीमेटली ज्ञान उनको तभी मिला जब उन्होंने अपने अंदर से उसको ढूंढा और सारे गुरुओं की तलाश को खत्म कर दिया। दोस्तों

The Evolution of Knowledge Transmission

गुरुओं ने शिष्यों का बहुत एक्सप्लॉयटेशन किया है। आज से नहीं हजारों साल से। एकलव्य की स्टोरी कौन नहीं जानता? जैसा कि आप जानते हैं कि जो द्रोणाचार्य थे वो अर्जुन को सबसे बड़ा धुरंधर बनाना चाहते थे। एकलव्य जो है एक निषाद प्रिंस थे और उनको इन्होंने शिक्षा देने से मना कर दिया। लेकिन जो एकलव्य थे उन्होंने इनकी मूर्ति बना करके सिर्फ इनसे इंस्पिरेशन लेकर के खुद उसने ट्रेनिंग की और अल्टीमेटली उसका जो लेवल था वो अर्जुन से भी ऊपर हो गया और जब गुरु द्रोण को यह पता चला तो अल्टीमेटली जैसा आप जानते हैं कि उन्होंने उनसे अंगूठा मान लिया और इस तरीके से एकलव्य को पूरी तरीके से विकलांग कर दिया कि वह जिंदगी में कभी भी अच्छे धनुर्धर नहीं बन सकते और यह बात एकलव्य के अंदर भी थी कि उन्होंने खुद को भरोसा करने की जगह एक गुरु की जरूरत समझिए। तो दोस्तों, गुरु क्यों इंपॉर्टेंट हुआ करता था पहले जमाने में? यह भी जानने की जरूरत है। और क्यों लोगों के दिमाग में यह बात बैठी थी कि गुरु के बिना ज्ञान नहीं हो सकता। दोस्तों, पुराने जमाने में कोई किताबें नहीं हुआ करती थी। कोई रिटेन मटेरियल नहीं था, ना कोई इंटरनेट था। ना कोई सोशल मीडिया था। यह कुछ भी नहीं था वहां पे। तो कैसे ज्ञान कम्युनिकेट होता था? गुरु शिष्य परंपरा से। गुरु सीखता था और उसको ओरली जो है वह अपने शिष्य को बताता था। अब जो ओरल ज्ञान है वह शिष्य के दिमाग में है और जो आगे बढ़ेगा फिर वो अगला गुरु बन जाता था। इस तरीके से आपको अगर ज्ञान चाहिए तो जैसे आज आप किताबों पे जाते हैं या डिफरेंट सोशल मीडिया प्लेटफार्म पे जाते हैं वैसे ही आपको गुरु की शरण में जाना पड़ेगा। क्योंकि गुरुओं के पास में नॉलेज की मोनोपोली हुआ करती थी। दोस्तों उस जमाने में बहुत ही कम लोग ऐसे थे जो पढ़े लिखे हुआ करते थे। मेनली अपर कास्ट के लोग होते थे जैसे ब्राह्मणस होते थे। कुछ क्षत्रिय भी होते थे। लेकिन सब अपने-अपने एरिया का ज्ञान उनको मिलता था। और इस तरीके से गुरुओं ने अपनी जो पोजीशन थी उसको बुरी तरीके से एक्सप्लइट किया और अक्सर वह एक पर्टिकुलर जो है कास्ट को भी बिलोंग करते थे और इस वजह से उनकी टोटल इस पे मोनोपोली थी और यह मिथ उन्होंने बिल्कुल फैला दिया कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिल सकता। जैसे कि राजा का बेटा ही राजा होगा वैसे ही गुरु का शिष्य ही अगला गुरु बनेगा। बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं है। दोस्तों, यह सब चीजें आजकल एकदम आउटडेटेड हो गई हैं। आज आपके पास कोई भी ऐसी किताब नहीं है। वेद, पुराण, गीता, बाइबल, कुरान, एनीथिंग यू कैन थिंक अबाउट। सब चीजें आपको किताबों में अवेलेबल हैं या फिर इंटरनेट पर अवेलेबल है। कोई भी आदमी उसको जाकर के देख सकता है। और इसीलिए यह जो पुराना जो कांसेप्ट है वो पूरी तरीके से आज के समय में आउटडेटेड हो गया है। और यह दुर्भाग्य की बात है कि जहां दुनिया ने इस कांसेप्ट को डिस्कार कर दिया है। हमारे देश ने आज भी इस कांसेप्ट को पकड़ करके रखा हुआ है। और उनके दिमाग में यह बात बैठ गई है कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं हो सकता। खासतौर से जो आध्यात्मिक ज्ञान है। दोस्तों गुरु और टीचर में एक बड़ा मेजर फर्क होता है। जो टीचर होता है वो एक शिक्षक होता है जो आपको ज्ञान देता है, नॉलेज देता है, इंफॉर्मेशन देता है। वो

The Limitations of the Guru System

आपको बताता है कि भ कैसे किसी प्रॉब्लम को सॉल्व करेंगे, कैसे आप कोई लैंग्वेज बोलना सीखेंगे, कैसे कोई प्रोग्रामिंग करेंगे। वह आपके दिमाग को शार्प करता है। वहीं पर जो गुरु शब्द है वह डिराइव हुआ है गु और रूह से जिसका मतलब है डार्कनेस रिमूवर या जो अंधेरे को मिटाता है। और इस तरीके से यह माना जाता है कि जो गुरु है वह आपके अंदर जो अंधकार है अज्ञानता का उसको हटाता है। नया ज्ञान आपको देता है। आपका जो परसेप्शन है दुनिया के बारे में वो चेंज करता है। और अक्सर आपने देखा होगा कि टीचर तो हमारे बहुत होते हैं। आप किसी भी स्कूल कॉलेज में जाएंगे तो वहां पे हर सब्जेक्ट का अलग टीचर है। उसी तरीके से जब आप आगे बढ़ते हैं तो हर क्लास में अलग टीचर होता है। हर स्पेशलाइज टॉपिक का लेकिन जो गुरु होता है वह ऐसा माना जाता है कि सर्वगुण संपन्न है। सर्वज्ञान संपन्न है। उसको सब कुछ पता है। और इसीलिए यह सबसे बड़ी प्रॉब्लम है आज के समय में। जबकि ज्ञान इतना बढ़ गया है कि कोई व्यक्ति नहीं हजारों व्यक्ति मिलके भी जो है उस ज्ञान को इकट्ठा नहीं कर सकते। तो दोस्तों ये जो गुरु शिष्य परंपरा है इसने हमारे देश को बर्बाद किया है। क्योंकि यहां पे जो गुरु का स्थान है वो हमेशा शिष्य से ऊपर रहता है और ईश्वर के बराबर रहता है इसलिए जो शिष्य है उसकी जिम्मेदारी है कि गुरु को फॉलो करें और कभी उसको क्वेश्चन ना करें। उसको कभी करेक्ट करने की कोशिश ना करें और इसीलिए आपने देखा होगा कि जो वेदों में उपनिषदों में जो ज्ञान दे दिया गया दो-दो तीन-तीन हजार साल पहले वही ज्ञान तोते की तरह जो है गुरु उस शिष्य को बताता है और वो फिर अपने वो आज तक चलता आ रहा है क्योंकि किसी ने क्वेश्चन ही नहीं किया कि उसके अंदर प्रॉब्लम क्या है कमियां क्या है और चकि गुरु से ज्यादा तो शिष्य समझदार हो ही नहीं सकता इसलिए जो इंटेलेक्चुअल लेवल है हर जनरेशन के साथ नीचे चला जाता है क्योंकि अल्टीमेटली तो गुरु ही सुपीरियर होता है। इसीलिए आज आप लोगों से सुनेंगे कि भाई हमारे जितने भी महान काम हैं, जितने महान ग्रंथ हैं वो तो हजारों साल पहले लिख दिए गए। अब हम उससे आगे तो सोच ही नहीं सकते। यह सब इस गुरु शिष्य परंपरा का हिस्सा है। यहां तक कि आपको मालूम है कि जो द्रोणाचार्य और अर्जुन थे जब उनके बीच में युद्ध चल रहा था महाभारत में तो यह था कि साहब अर्जुन तो द्रोणाचार्य को हरा ही नहीं सकते। जबकि आप कभी इमेजिन करिए तो द्रोणाचार्य तो बुजुर्ग हो चुके होंगे उस समय जब ये युद्ध चल रहा था और अर्जुन बिल्कुल जवान थे और सबसे बड़े धुरंधर थे लेकिन यह हमारी संस्कारों का आप मान लीजिए कि जो दोष कह लीजिए या जो हमारे संस्कारों की हकीकत है कि साहब गुरु से बड़ा कैसे शिष्य हो सकता है और इसीलिए जो हमारा देश है वो हर जनरेशन में लेस इंटेलिजेंट होता चला गया। जबकि इवोल्यूशन जो होता है हमेशा हर जनरेशन में बेटर प्रोडक्ट बनाता है। हमने हर जनरेशन में इंफीरियर प्रोडक्ट को बनाया और इसीलिए आज हमारा इंटेलेक्चुअल लेवल

The Need for Critical Thinking

इतना कम हुआ है। दोस्तों टीचर जो होता है वो बहुत इंपॉर्टेंट होता है। इस बात से मैं डिनाई नहीं करता। यह बहुत इंपॉर्टेंट है। लेकिन टीचर आपके साथ परमानेंटली एसोसिएटेड नहीं रहता है। टीचर एक बोट की तरह है, नाव की तरह है। जिसको इस्तेमाल करके आप एक नदी के किनारे से दूसरे किनारे जा सकते हैं। लेकिन जब उस किनारे आप पहुंच गए तो आप जो नाव है उसको सर पे लेकर के आगे नहीं ढोते हैं। आप उसको वहीं छोड़ देते हैं। उसके बाद में फिर आप कोई बस पकड़ेंगे, कोई कार लेंगे, कोई आप जो है शिप लेंगे, एरोप्लेन लेंगे और फिर अगले डेस्टिनेशन तक पहुंचेंगे। और जब उसका पर्पस खत्म हो गया फिर आप वहां से बाहर निकल गए। इसी तरीके से जब आपको कोई ज्ञान चाहिए तो उसके लिए आपको बहुत सारे टीचर्स के माध्यम से गुजरना पड़ता है और उन सब से आप सीखिए तभी आप ज्ञानी बन पाएंगे। ज्ञान एक्वायर कर पाएंगे। आपका गोल है ज्ञान ढूंढना। सत्य को ढूंढना। किसी टीचर या गुरु से पकड़ करके नहीं रखना। अगर आप किसी एक गुरु को पकड़ करके रहेंगे तो आप का इंटेलेक्चुअल लेवल बहुत कम रह जाएगा क्योंकि कोई भी ज्ञान जो है किसी भी व्यक्ति के पास में संपूर्ण रूप से नहीं होता है और खासतौर से अगर आप उसकी कमियां नहीं बता सकते उसको करेक्ट नहीं कर सकते उसको इंप्रूव नहीं कर सकते तो इसका मतलब आपका इंटेलेक्चुअल लेवल हमेशा उससे कम रहेगा और आप कभी भी आगे नहीं बढ़ पाएंगे। जब आप गुरुओं को गॉड की तरह ट्रीट करने लगते हैं तो उनका ज्ञान फ्लोलेस हो जाता है। वह परफेक्ट हो जाते हैं और उसके बाद में आप उनको क्वेश्चन नहीं कर सकते। लेकिन अगर उनको आप इंसान की तरह ट्रीट करें तो आप उनके ज्ञान से सीख सकते हैं और अगर उसमें कोई कमी है तो उसको दूर भी कर सकते हैं। इसका बहुत बड़ा एग्जांपल है एिस्टोटलल का। जिन्होंने प्लेटो की बताई हुई बहुत सारी जो थ्योरीज है जो उनके गुरु थे या टीचर थे उसको उन्होंने रिजेक्ट किया और उनका एक बहुत ही फेमस कोट है डियर इज प्लेटो डियरर स्टिल इज ट्रुथ कि सच ज्यादा इंपॉर्टेंट है टीचर से भी ज्यादा इंपॉर्टेंट है और अगर आपका जो कॉन्फ्लिक्ट है सच और टीचर के बीच में हो तो हमेशा आपको सच को चूज़ करना चाहिए। दोस्तों जब गुरु जो है वो गॉड बन जाते हैं तो जो ट्रुथ होता है वो मिराज बन जाता है। जब गुरु का आप भगवान का दर्जा देते हैं तो सच नहीं मिलता सिर्फ उसका इल्लुजन या उसका धोखा आपको होता है। और यह ध्यान रखिए कि नॉलेज का गोल होता है सच को ढूंढना और टीचर सिर्फ एक गाइड है। तो चलिए दोस्तों अब हम बात करते हैं उन 10 कारणों की गुरु शिष्य परंपरा से संबंधित जिन्होंने हमारे एजुकेशन सिस्टम को डिस्ट्रॉय किया है और जो आज भी बहुत बड़ा आघात हमें पहुंचा रहे हैं। दोस्तों सबसे पहला कारण है कि गुरु लोगों के लिए कोई एजुकेशनल रिक्वायरमेंट

The Flaws in Guru Authority

ही नहीं है। आप कोई भी फील्ड ले लीजिए, मेडिसिन ले लीजिए, लॉ ले लीजिए, इंजीनियरिंग ले लीजिए, टीचिंग का फील्ड ले लीजिए। हर एक चीज के लिए कोई ना कोई डिग्री की जरूरत होती है। लेकिन गुरु के लिए कोई एजुकेशनल क्वालिफिकेशन की जरूरत नहीं है। जितने भी गुरु हैं वह एक समय शिष्य बनते हैं किसी फेमस गुरु का और उसके बाद में फिर वो जो गुरु होता है जिस शिष्य से खुश हो जाए जो उसका फेवरेट हो वो उसको अगला गुरु बना देता है। तो इस तरीके से यह जो लोग गुरु बनते हैं जो आपको बड़े-बड़े नाम दिखाई देते हैं ऐसा नहीं कि उनको अपने सब्जेक्ट में बड़ी नॉलेज है बल्कि इसलिए क्योंकि उनकी जो गुरु है उनके आशीर्वाद उनके साथ में है और उन्होंने अपने गुरु को खुश रखा इस वजह से उनको वो जगह मिल गई और बहुत सारे ऐसे गुरु आपको मिल जाएंगे जो सेल्फ अपॉइंटंटेड अथॉरिटी उनको तो किसी ने अपॉइंट भी नहीं किया वो खुद अपने को जो है गुरु डिक्लेअर कर देते हैं। दूसरी दोस्तों क्या है कि यह जितने भी गुरु होते हैं वह सब कॉपी कैट प्रीचर होते हैं। आप देखेंगे वह सब कथा सुनाते रहते हैं। वो उनका मेन काम है कथा सुनाना। वो वही फिलॉसोफी जो हजारों साल पहले लिखी गई वही कहानियां जो हजारों साल से सुनाई जा रही है। वही बार-बार घुमा फिरा करके आपको बताते रहते हैं। वही श्लोक वही इंस्पिरेशन वही कहानियां। अगर आप उनका जो सैफरॉन रोब होता है जो उनका जो ड्रेस होता है अगर उसको आप हटा दें और जो बैकग्राउंड में म्यूजिक बजता रहता है जो माहौल क्रिएट किया जाता है तो आपको पता चल जाएगा कि वो कुछ नई बात नहीं बता रहे वो वही बात बता रहे हैं जो कि हजारों साल से तोते की तरह सारे गुरु लोग रिपीट करते रहते हैं। उनके अंदर कोई ओरिजिनल आईडिया नहीं रहता है। वो कोई थिंकर नहीं है। वो परफॉर्मर हैं। उनके पास एक स्क्रिप्ट है और वह एक एक्टर हैं। बहुत बढ़िया जिसने परफॉर्म किया वह एकदम सक्सेसफुल गुरु हो जाता है। लेकिन आपको यह जानना पड़ेगा कि उनकी नॉलेज हजारों साल पहले लिखी गई उस सोसाइटी के लिए रेलेवेंट थी। आज वो बुरी तरीके से आउटडेटेड हो चुकी है और उनके पास में कोई ना तो काबिलियत है ना उनके अंदर विज़न है ना वो दूसरी जगह से पढ़ते हैं कुछ भी कि वो नई समय के लिए नई नॉलेज क्रिएट कर सकें। वो इसी टाइप से है कि आज के समय में कोई आदमी बैलगाड़ी से चले। जबकि दुनिया जो है वो सुपर सोनिक जेट से चल रही है। एरोप्लेन आप सोचते हैं कि आप बैलगाड़ी से चलके उसका मुकाबला करेंगे। उससे आगे निकल जाएंगे। तीसरा दोस्तों बहुत इंपॉर्टेंट चीज है कि जितने गुरु लोग होते हैं ये सब बहुत बायस्ड होते हैं, बहुत प्रजुडिस् होते हैं। इनको लगता है कि इनके पास ज्ञान का अथा भंडार है और जो उन्होंने जिंदगी में सीखा हुआ है, जो जिंदगी में एक्सपीरियंस किया है वही सच है। क्योंकि इनके जितने चेले लोग होते हैं

The Dangers of Blind Faith

वो इनको चढ़ाते रहते हैं। साहब आप तो एकदम भगवान परफेक्ट हैं। कोई क्रिटिसिज्म तो कर नहीं सकता है। तो वो अपना जो एक टिंटेड लेंस रहता है उससे सारी दुनिया को देखते हैं। जो एक असली टीचर होगा वो इंपार्शियली आपको दुनिया के बारे में बताएगा। दुनिया जैसी है। लेकिन जो गुरु होते हैं, वह आपको अपना परसेप्शन दुनिया के बारे में बताते हैं। और अगर आप कभी भी किसी गुरु का भाषण सुनेंगे, तो आप देखेंगे वो बहुत ही ज्यादा बायस्ड होते हैं। प्रिजुडिस्ट होते हैं और वो अपनी ओपिनियन को समझते हैं कि वो यूनिवर्सल ट्रुथ है। कारण क्या है कि वो किसी दूसरे ओपिनियन को जानते ही नहीं है। किसी दूसरे धर्म के बारे में जानते ही नहीं है। ना कुछ सीखना चाहते हैं। जैसे अनुरुद्धाचार्य जो हैं उनके बारे में आपको मालूम होगा कि कुछ दिनों पहले उन्होंने कहा कि 25 साल की उम्र तक जो महिलाएं होती हैं वो बड़ी जवान हो जाती हैं और चार जगह मुंह मार लेती हैं। मतलब इस तरीके की जो अभद्र भाषा है इस तरीके का जो उन्होंने बातें कही महिलाओं के लिए वो अगर सपोज़ करिए कि कोई पॉलिटिकल लीडर कह देता तो आज क्या होता? मुलायम सिंह के बारे में आज भी लोग कहते रहते हैं यह बातें। लेकिन धर्मुगुरु हैं जो कहें उसको कह सकते हैं। कोई उनको कुछ कह नहीं सकता। वो सब जो धर्मुरु हैं उनके दिमाग में वही पुरानी छवि है कि महिलाओं को घर में रहना चाहिए। उनको चूल्हा बर्तन या अपने घर को संभालना चाहिए। हस्बैंड को परमेश्वर की तरह ट्रीट करना चाहिए। बच्चों को बड़ा करना चाहिए। वही जो पुराने जमाने की जो मान्यताएं हैं उससे वह आगे नहीं बढ़ पाते हैं। क्यों? क्योंकि उनको कुछ आता ही नहीं है सिवाय इसके कि वही धर्म ग्रंथ जो हजारों साल पहले लिखे गए। चौथा दोस्तों बहुत इंपॉर्टेंट चीज है कि जो जितने गुरु लोग होते हैं उनका बड़ा टनल विज़न होता है क्योंकि उनकी नॉलेज बड़ी लिमिटेड होती है। उनके पास में वही कोई वेद है, गीता है, उपनिषद है, पुराण है वही नॉलेज है जो हजारों साल पुरानी है। दोस्तों, इन हजारों साल में मतलब करोड़ों टाइप की नॉलेज क्रिएट हुई है। टन्स ऑफ नॉलेज क्रिएट हुआ है। और यह जो गुरु लोग हैं, यह लोग किसी और, ना तो धर्म ग्रंथ को पढ़ते हैं, ना कोई और फिलॉसफी को पढ़ते हैं। ना इनको साइंस के बारे में पता है, ना टेक्नोलॉजी है। और वो जो है अपने फॉलोअ को कन्विंस करते हैं कि साहब मेरे पास प्योर नॉलेज है। प्योर नॉलेज क्योंकि बहुत हजार साल पुरानी है। असली में तो वो इंटेलेक्चुअल पावर्टी है क्योंकि उनको जैसे एक समुद्र हो तो सिर्फ एक बूंद के बारे में उनको मालूम है। वो कहते हैं कि साहब उनके पास में यूनिवर्सल ट्रुथ है। सारी दुनिया का सच उनको मालूम है। लेकिन सही बात यह है कि उनको किसी भी दूसरे धर्म के बारे में फिलॉसफी के बारे में जैसे कांत हो गए, निश्चय हो गए या फिर आपके एरिस्टोटल हो गए। कुछ भी नॉलेज नहीं है, जीरो नॉलेज है। ना ही उनको दूसरे धर्मों के बारे में भी नॉलेज है। ऐसा नहीं कि वह धार्मिक गुरु हैं तो कम से कम दूसरे धर्मों के बारे में नॉलेज एक्वायर करें। वह भी उनको नहीं पता है। लेकिन प्रॉब्लम क्या है कि जो शिष्य होते हैं उनको लगता है कि उनके गुरु सर्व गुण संपन्न है। सारा ज्ञान संपन्न है। और इसलिए वह भी और कुछ जानने की कोशिश नहीं करते हैं। और इस तरीके से वो एक फिलॉसफिकल आइसोलेशन का शिकार हो जाते हैं। मतलब क्योंकि वो दुनिया से कुछ सीखते नहीं है। और इसीलिए अगर आप स्टडी करेंगे तो आप

The Importance of Independent Learning

पाएंगे कि इंडियन फिलॉसफी को कोई भी दुनिया की फिलॉसोफी रिकॉग्नाइज नहीं करती है। मैंने बहुत सारी फिलॉसोफी की बुक्स पढ़ी हैं। टॉप 100 फिलॉसफर्स में आपको कोई भी इंडिया का फिलॉसफर नहीं मिलेगा। अगर कहीं पे मिलते हैं तो शायद गौतम बुद्ध आपको मिलेंगे क्योंकि कुछ ओरिजिनल फिलॉसोफी हमने क्रिएट ही नहीं की। इसके बारे में मैंने एक डेडिकेटेड वीडियो बनाया है। आप चाहे तो उसको देख सकते हैं। उसकी लिंक मैं डिस्क्रिप्शन में दे दूंगा। पांचवा दोस्तों कारण यह है कि गुरु शिष्य परंपरा को हमें रिजेक्ट करने की इसलिए जरूरत है क्योंकि जितने गुरु लोग होते हैं उनका फोकस होता है फेथ पे कि आप फेथ रखें विश्वास रखें रीजन ना करें और यह हमारे गुरु शिष्य परंपरा की सबसे बड़ी ट्रेजडी है। दोस्तों हमारे यहां पे जो हिंदू फिलॉसफी और हिंदू रिलीजन है उसमें कोई फर्क नहीं है। दोनों एक ही चीज के हैं क्योंकि जितनी हिंदू फिलॉसोफी है, वेद ले लीजिए, चाहे आप उपनिषद ले लीजिए, चाहे गीता ले लीजिए, सब ईश्वर का ही शब्द है। और आप उसको क्वेश्चन नहीं कर सकते क्योंकि ईश्वर का शब्द है तो कैसे वो क्वेश्चन कर सकते हैं? आपकी फिलॉसफी में वही सब कांसेप्ट हैं। गॉड है, भगवान है, आत्मा है, परमात्मा है, रिब्थ है, कर्म है। इन सब का जीरो एविडेंस है। लेकिन इसी के ऊपर हमारी सारी फिलॉसोफी टिकी हुई है। और क्योंकि ये सारे के सारे धर्म ग्रंथ जो हैं या फिलॉसोफी की बुक्स जो है, वह वर्ड ऑफ गॉड है। आप उनको क्वेश्चन नहीं कर सकते हैं। और गुरु आपको क्वेश्चन करने देता भी नहीं है। वह कहता है कि साहब गॉड या जो स्पिरिचुअलिटी है दैट इज बियनड लॉजिक बियनड रीज़न बियनड माइंड अपना दिमाग मत लगाओ। मैं जो कहता हूं उसको मान लो। डाउट तो एक पाप है। गुरु के शब्दों को अगर डाउट करें तो वह पाप है। तो इस तरीके से जो शिष्य होता है उसको वो रीजन का एनिमी बताते हैं और उसको वो टूल जिससे वो सच्चाई का पता लगा सकता है, रैशनलिटी है, क्रिटिकल थिंकिंग है, एविडेंस है। इस सब चीजों से वह उसको परमानेंटली दूर कर देते हैं। और यहां तक कि अगर कोई इन टूल्स का इस्तेमाल करके उनकी कमियां बताना चाहे तो वो भी जो है उसको रिजेक्ट कर देते हैं। क्योंकि साहब वो कहते हैं कि भई आध्यात्मिक ज्ञान जो है वो तो आप लॉजिक से नहीं समझ सकते। अरे भैया तुमको कहां से समझ में आया? क्या बेसिस है उसका? तो दोस्तों इस तरीके से जो छठा सबसे जो डैमेजिंग इफेक्ट होता है वो होता है कि आप अगर गुरु से सीखना चाहते हैं तो आपको अपनी क्रिटिकल थिंकिंग को पूरी तरीके से सरेंडर करना पड़ेगा। क्योंकि पहली चीज जो गुरु आपको बताएंगे कि अपने ईगो को डिस्कॉर्ड करो। अपने अहम को खत्म करो। क्योंकि अहम अगर आपके पास में है आप अगर मानते हैं कि हां भाई मैं भी कुछ हूं। मेरे अंदर भी कुछ दिमाग है तो आप इंडिपेंडेंट सोचेंगे और जब आप इंडिपेंडेंट सोचेंगे तो नेचुरली

The Call for Intellectual Growth

आप उनमें कमियां भी पाएंगे। इसीलिए ईगो को सरेंडर करना सबसे इंपॉर्टेंट है कि मतलब जो गुरु कहता है उसको आंख बंद करके मान लो। अल्टीमेट जो आपकी पराकाष्ठा है वो यह है कि आप मास्टर के बराबर पहुंच जाओ बस उससे ऊपर नहीं। मास्टर को आपको एक्सेल नहीं करना है। तो मास्टर को जितना पता है उससे ज्यादा आप नहीं पता कर सकते हैं। तो इस तरीके से जो गुरु होता है शिष्य को अपना क्लोन बनाता है बल्कि उसको ह्यूमन बीइंग नहीं कि उसका अपना एक दिमाग हो इंटेलेक्चुअल हो उसको अपना क्लोन बना देता है। अपनी इमेज बना देता है। तो दोस्तों जब गुरु यह कहता है कि सरेंडर योर ईगो इसका मतलब यह है सरेंडर योर क्रिटिकल थिंकिंग। और अगर आपने क्रिटिकल थिंकिंग सरेंडर कर दी तो फिर आप सच का पता नहीं लगा सकते। और इसीलिए कोई भी गुरु आपने देखा होगा कि वह आपको डिसरेज करता है कि आप इंडिपेंडेंट थॉट को डेवलप करें क्योंकि अगर आप इंडिपेंडेंट थॉट्स को डेवलप करेंगे तो गुरु आपको कंट्रोल नहीं कर पाएगा। सातवीं दोस्तों, जो बड़ी अह एक अह यूनिक चीज़ होती है भारतीय गुरुओं के साथ में कि सारे जो गुरु होते हैं, वह कुछ जैसे उनको जादुई शक्ति है, कुछ मिरेकल्स का वह दावा करते हैं कि उनके पास कुछ सुपर नेचुरल पावर है। और इसीलिए जो होते हैं जो मासेस होते हैं, आम आदमी होता है उनके साथ जुड़ता है। उनको लगता है कि बस गुरु का आशीर्वाद हो जाए, हमारी सारी प्रॉब्लम खत्म हो जाएगी। यहां तक कि अगर गुरु के चरणों की धूल मिल जाए, उनके पैर का धोया हुआ पानी मिल जाए तो उनकी सारी प्रॉब्लम दूर हो जाएंगी। क्योंकि वो समझते हैं कि जो गुरु होता है वो गॉड का चोजन पर्सन है। वह स्पेशल पर्सन है और उसके पास में स्पेशल पावर्स हैं। और यह सबसे बड़ा जो है रेड फ्लैग है क्योंकि यह आपको अंधा बना देता है गुरु के लिए। दोस्तों, अगर कोई गुरु खुद यह क्लेम करता है कि वह लॉ ऑफ नेचर को डिफाई करता है, लॉ ऑफ नेचर के ऊपर है, तो कैसे आप एक्सपेक्ट कर सकते हैं कि वो आपको रैशन थिंकिंग के बारे में बताएगा। कैसे वो आपको बताएगा कि भ लॉजिक कैसे इस्तेमाल करें? रीज़न कैसे इस्तेमाल करें? एविडेंस को क्या सहारा लें? क्योंकि जब वो खुद यह क्लेम करता है कि वो नेचर से परे है, लॉ ऑफ़ नेचर उसके ऊपर अप्लाई नहीं होता। मिरेकल्स कर सकता है तो वो रैशनलिटी आपको कैसे सिखा सकता है? बहुत सारे लोग गुरु लोग हैं जैसे धीरेंद्र शास्त्री जी हैं जो अपना कुछ मिरेकल्स दिखाते रहते हैं। साईं बाबा हुआ करते थे। सबके साथ में मिरेकल्स की स्टोरीज हैं। कुछ मिरेकल्स की स्टोरीज पब्लिक है। कुछ लोग जो शिष्य हैं वो डेफिनेटली इस बात को मानते हैं कि उनके गुरु के पास में सुपर नेचुरल पावर है। आठवां दोस्तों बहुत इंपॉर्टेंट रीज़न है एकिस्टेंस ऑफ़ गॉड। कोई भी जो गुरु है, वह यह कभी नहीं कहेगा कि गॉड एक्सिस्ट नहीं करता। वह यह मान के चलता है कि गॉड तो एग्जिस्ट करता ही करता है क्योंकि गॉड से ही वह अपनी सुपर नेचुरल पावर को डिराइव करता है। आपने कोई ऐसा गुरु नहीं देखा होगा जो यह करे कि गॉड पे क्वेश्चन भी आप कर सकते हैं, डाउट भी कर सकते हैं। और वह

Becoming Your Own Guru

बड़े एब्सर्ड आउटडेटेड लॉजिक देते हैं जस्टिफाई करने के लिए कि गॉड कैसे एग्जिस्ट करता है। ऐसे लॉजिक जिसको कि इंटेलेक्चुअल क्लास ने दुनिया ने सैकड़ों साल पहले डिस्कार कर दिया है। अब जैसे एक गुरु का मैं वीडियो देख रहा था। वो कहते हैं साहब क्या आप एयर को देख सकते हैं? हवा शिष्य ने कहा साहब नहीं देख सकते। तो कहते हैं कि आप विश्वास करते हैं कि है कि नहीं एयर? कहां है? तो फिर गॉड को आप नहीं देख सकते तो फिर आप क्यों विश्वास नहीं करते? भाई हवा का वेट होता है। हवा को महसूस कर सकते हैं। हवा में हम सांस लेते हैं। गॉड का क्या एविडेंस है? हवा तो एक मटेरियल है। उसी तरह एक गुरु जी कह रहे थे कि तुम्हें मालूम है तुम्हारा बाप कौन है? तुम्हें विश्वास है वह तुम्हारा बाप है। कैसे पता तुम्हारा बाप है? फिर उन्होंने कहा कि केवल आपकी मदर जानती है कि वह आपका बाप है और दुनिया में कोई नहीं जानता। इसी तरीके से केवल गुरु जानता है कि कौन गॉड है और कोई नहीं जानता। अब कितना एब्सोर्ड लॉजिक है सोचिए आप। मतलब आज के तारीख में इतने सारे टेस्ट अवेलेबल हैं कि आप पता कर सकते हैं कौन आपका बाप है। और फिर यह जो चीजें हैं इन दोनों जो एग्जांपल्स हैं इसके बीच में कोई तालमेल ही नहीं है। लेकिन इस तरीके के अब्सॉर्ड लॉजिक यूज़ करके वो प्रूफ करते हैं कि गॉड एक्सिस्ट करता है। जबकि हकीकत में ऐसा कोई भी एविडेंस नहीं है कि गॉड एक्सिस्ट करते हैं। और जो फॉलोअर्स होते हैं उनको आंख बंद करके फॉलो करते हैं। क्योंकि उन्होंने क्रिटिकल थिंकिंग में तो कोई ट्रेनिंग उनको है ही नहीं। ना साइंस के बारे में है। अगर साइंस पढ़ भी लिया है तो उसको यूज़ कर कैसे करना है उनको मालूम ही नहीं है। दोस्तों नौवां बड़ा इंपॉर्टेंट रीज़न है जिसकी वजह से हमें गुरु शिष्य परंपरा को डिस्कार करने की जरूरत है। वो ये है कि आप अगर किसी और फील्ड में जाएं वहां पे स्पेशलिस्ट की भरमार है। साइंस एक ऐसा फील्ड है जिसके अंदर आप देखेंगे पहले तो वो अलग-अलग ब्रांचेस में बट गया। फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी। उसके बाद में अगर आप जाएंगे इंजीनियरिंग हो गया। उसके बाद में मेडिसिन हो गया। फिर हर मेडिसिन में भी आप देखेंगे सैकड़ों फील्ड हैं। सुपर स्पेशलाइजेशन है। लेकिन गुरु लोग जो होते हैं वो हर टॉपिक के एक्सपर्ट हैं। बाकी लोगों को 10-10 20 साल तक स्टडी करने के बाद में एक्सपर्ट मिलती है। गुरु तो एक तरीके से पैदाइशी होते हैं और वो कुछ साल ट्रेनिंगव करके वो हर फील्ड के एक्सपर्ट बन जाते हैं। उनको रियल वर्ल्ड का कोई एक्सपीरियंस नहीं होता। ना ज्यादातर ने शादी नहीं की। फैमिली नहीं जानते। कॉर्पोरेट में कभी काम नहीं किया। पॉलिटिक्स के बारे में नहीं किया। लेकिन हर चीज के वो मास्टर हैं। कोई भी फील्ड में आप उनसे पूछिए हर चीज के उनके पास में स्यूशन है। तो बहुत बड़ा एक्सपीरियंस गैप होता है जो वो बताते हैं जो वो एक्सपीरियंस करते हैं जिसकी उनको नॉलेज है। दोस्तों जितने भी गुरु लोग हैं वो हमारी दुनिया में नहीं रहते हैं। जिस दुनिया में हम रहते हैं जहां पे हमें लोन लेना होता है। ऑफिस जाना होता है। हमें वहां पे बॉस के सामने परफॉर्मेंस डिलीवर करनी होती है। जॉब बचानी होती है। कॉर्पोरेट में ले ऑफ का खतरा रहता है। बच्चे बड़े करने हैं। उनको स्कूल भेजना है। यह गुरु लोग उस दुनिया में नहीं रहते हैं। और उनकी जो नॉलेज है इस दुनिया के बारे में बहुत ही सुपरफिशियल है। और वो जो स्यूशन देते हैं वन साइज फिट ऑल वो वाकई में काम नहीं करता अगर आप उसको यूज करेंगे तो। क्योंकि वह बिल्कुल बेईमानी है। इनको उस बारे में कुछ पता ही नहीं है। और फाइनली दोस्तों गुरु का मतलब है मास्टर ऑफ एक्सप्लइटेशन। अगर आप एब्सोल्यूट पावर को एब्सोल्यूट सबमिशन के साथ में जोड़ दें तो उसका एक ही रिजल्ट होता है फाइनेंशियल और सेक्सुअल एक्सप्लॉयटेशन। जब शिष्य जो है उसने टोटली आपको सरेंडर कर दिया और गुरु ने अब्सोल्यूट पावर आपके ऊपर गेन कर ली तो सब कुछ शिष्य का उसका हो गया। आप हर साल हेडलाइंस देखते रहते हैं कि किस तरीके से जो गुरु लोग हैं उन्होंने शिष्यों को एक्सप्लइट किया। यह कोई इंडिविजुअल इंसिडेंट नहीं है। यह सिस्टमैटिक रिजल्ट है। यह जो सिस्टम बना हुआ है उसका एक कॉन्सिक्वेंस है। क्योंकि शिष्य जो है गुरु को क्वेश्चन नहीं करते। और यहां तक कि जब गुरुओं को रेप, मर्डर, एक्सप्लॉयटेशन इसमें जेल की सजा हो जाती है सुप्रीम कोर्ट तक। तब भी इतने अंधभक्त होते हैं यह शिष्य लोग कि वह फिर भी जो है गुरु का पीछा नहीं छोड़ते। उसको समझते हैं कि गुरु उतना ही महान है। जबकि जितने केसेस जो रिपोर्ट होते हैं वो टिप ऑफ द आइसबर्ग है। एक्चुअल में जो एक्सप्लॉयटेशन लेवल है वो बहुत ज्यादा है। लेकिनकि गुरुओं का इतना ज्यादा पॉलिटिक्स में इन्फ्लुएंस है। इतना ज्यादा गवर्नेंस में इन्फ्लुएंस है कि उनके खिलाफ में कोई भी केस इन्वेस्टिगेट करने की हिम्मत नहीं करता। लेकिन यह गलती किसकी है? उन लोगों की है जो समझते हैं कि बिना गुरु के ज्ञान नहीं मिल सकता या गुरु जो हैं इतने पावरफुल हैं कि उनको कुछ मैजिकल स्यूशन प्रोवाइड कर देंगे। जिससे उनकी सारी प्रॉब्लम सॉल्व हो जाएंगी। तो दोस्तों, इस तरीके से हमने जाना कि गुरु की कोई आपको जरूरत नहीं है और यह जो गुरु शिष्य परंपरा है, वह हमारी इंटेलेक्चुअल ग्रोथ के लिए, हमारे देश के इंटेलेक्चुअल ग्रोथ के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है। इसलिए दोस्तों, कभी भी आप किसी गुरु को सीख ना करें। गुरु को ना ढूंढे। अपने गुरु खुद बने आप। आज आपके पास में ज्ञान के सारे स्रोत अवेलेबल हैं। आपके पास बुक्स हैं। अच्छे से अच्छे टीचर्स के वीडियोस मिल जाएंगे। एक्सपर्ट ऑनलाइन क्लासेस होती हैं। इंटरनेट पर जाइए। सब ज्ञान आपको अवेलेबल है। मैंने स्वयं हर चीज जो है वो बुक्स से सीखी। किताबों से सीखी। एथिक्स मेरा कोई सब्जेक्ट नहीं था। मैंने यूपीएससी को एथिक्स पढ़ाया। यूपीएससी स्टूडेंट्स को और मेरी उसमें टॉप रेटिंग थी। किताबें लिखी मैंने उस पर आज मैं फिलॉसफी के बारे में सीख रहा हूं। ऐसा कौन सा फील्ड है जो आप खुद नहीं सीख सकते? सब ज्ञान आपके पास में अवेलेबल है। आप गुरु की जगह पे सीधा ज्ञान के ओरिजिनल सोर्स पे जाइए। वहां से पढ़िए। अपना माइंड इस्तेमाल करिए। जज करने के लिए गुरु के चक्कर में मत पढ़िए। क्योंकि गुरु जो है वह सिर्फ आपको एक्सप्लइट करने के लिए है। उसका ज्ञान का लेवल बहुत लिमिटेड है। अगर आपको उसके ऊपर अंधभक्ति ना हो, अंध आस्था ना हो तो आप कभी उससे इंप्रेस हो ही नहीं सकते हैं। और सबसे बड़ी बात है जो ज्ञान आप एक्वायर करें उसको अपनी लाइफ में प्रैक्टिस करें ताकि आपको पता चले कि वो क्या सही है कि गलत है। अगर वह सही है तो उसको फॉलो करें। गलत है तो उसको रिजेक्ट करें। उसी तरीके से दूसरों के एक्सपीरियंस से सीखें। दूसरों की गलतियों से दूसरों की समझदारियों से सीखें। और कभी भी क्वेश्चन करना मत छोड़िए। अपने एक्शन को भी क्वेश्चन करें। दूसरे के एक्शन को क्वेश्चन करें। सारी की सारी जो साइंस है दोस्तों जिसने आज पूरी दुनिया को ट्रांसफॉर्म कर दिया है उसका मेन फाउंडेशन यह है क्वेश्चन करना। और जब हम क्वेश्चन करते हैं तभी हम दूसरों की कमियों को बता पाते हैं। नॉलेज के जो लूप होल्स हैं उसको जान पाते हैं और उससे बेटर नॉलेज को क्रिएट कर पाते हैं। दोस्तों अगर भारत ग्रो नहीं कर पाया और आज भी उस आउटडेटेड गुरु शिष्य परंपरा की जो चपेट में पड़ा हुआ है तो दोस्तों यह दुर्भाग्य है और इससे आगे हमें निकलने की जरूरत है। दोस्तों इसाक न्यूटन जो कि बहुत महान साइंटिस्ट हैं। उनको हम एक तरीके से फादर ऑफ द मॉडर्न साइंस भी कह सकते हैं। उन्होंने एक बात कही थी इफ आई हैव सीन फर्दर देन अदर्स इट इज बाय स्टैंडिंग ऑन द शोल्डर्स ऑफ जॉइंट्स। अगर मैं दूसरों से दूर देख पा रहा हूं क्योंकि मैं जो बहुत महान लोग थे उनके शोल्डर पे खड़े होकर के देख रहा हूं। इसका मतलब यह होता है कि जो हमारी पर्सनल, इंटेलेक्चुअल या फिजिकल जो प्रोसेस होती है वो अकेले नहीं होती है। जो लोग हमसे पहले जो ज्ञान को अर्जित करते हैं, ज्ञान पाते हैं, उस ज्ञान को यूज करके उस ज्ञान को अप्लाई करके कुछ उसमें अपना जोड़ करके हम नए ज्ञान का सृजन करते हैं। न्यूटन ने भी पुरानी जो नॉलेज थी उसको यूज करके ही अगली नॉलेज को क्रिएट किया और न्यूटन ने जो बताया उसको यूज़ करके फिर आगे जो साइंटिस्ट थे उन्होंने इस्तेमाल किया। आइंस्टाइन या जितने भी साइंटिस्ट सब ने अपने-अपने जो प्रीवियस जो उनके नॉलेज क्रिएटर्स थे उनकी नॉलेज को इस्तेमाल किया। तो दोस्तों आप गुरु ना बनाएं। गुरु की तरह बनने की कोशिश ना करें। अपने टीचर से ज्यादा नॉलेज एक्वायर करने की कोशिश करें। उसको सरपास और यह जो तोते की तरह जो पुरानी नॉलेज को बोलते रहते हैं उन पे कतई विश्वास ना करें। नई नॉलेज रोज क्रिएट हो रही है। सारी दुनिया में क्रिएट हुई है। उसको जाने उसको समझें। फाइनली मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि कोई गुरु के पीछे ना जाएं। खुद अपने गुरु बने। यही आपको आगे ले जाएगा। यही देश को आगे ले जाएगा। तो दोस्तों आज का वीडियो आपको कैसा लगा? अपने विचार को शेयर करें और अगर आप मुझसे डिसएग्री भी करते हैं अपना आप डिसए्रीमेंट दे सकते हैं। अगर आप एग्री करते हैं तो आप इसको और लोगों तक शेयर करें ताकि यह जो गुरु लोग हैं जो हमारे देश में जो एक्सप्लइट कर रहे हैं उस एक्सप्लॉयटेशन से इस देश को बचाया जा सके। इस सोसाइटी को बचाया जा सके और हम आगे बढ़ सकें। बहुत-बहुत धन्यवाद।

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