अभिभावक शिक्षकों के लिए प्रवचन - एस एन गोयनकाजी
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अभिभावक शिक्षकों के लिए प्रवचन - एस एन गोयनकाजी

Vipassana Meditation 28.03.2026 19 801 просмотров 668 лайков

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मित्र उपक्रम यह महाराष्ट्र सरकार, विपश्यना विशोधन विन्यास (वीआरआई), इगतपुरी और स्थानीय विपश्यना ध्यान केंद्रों का संयुक्त कार्यक्रम है । मित्र उपक्रम का मुख्य उद्देश्य आनापान के नियमित अभ्यास के माध्यम से मानसिक जागरूकता, सतर्कता और मन की एकाग्रता को उचित तरीके से बढ़ाना है, और इस आधार पर, कम उम्र में ही छात्रों का मानसिक, बौद्धिक और गुणवत्ता सहित सर्वांगीण व्यक्तिगत विकास करना है। मित्र या MITRA का अर्थ है Mind in training for Right Awareness। यद्यपि यह पहल मुख्य रूप से प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के शिक्षकों और कक्षा 5 से 10 तक के विद्यार्थियों के लिए क्रियान्वित की गई है, लेकिन यह उच्चतर माध्यमिक, कनिष्ठ और वरिष्ठ महाविद्यालयों के साथ-साथ तकनीकी और उच्च शिक्षा संस्थानों के शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए भी समान रूप से लाभकारी है। Public Talk + Q/A For: Parents and Teachers April 8, 1990 Nanavati College, Bombay Hindi Download Vipassana Meditation App Google App - https://play.google.com/store/apps/details?id=com.vipassanameditation Apple iOS - https://apps.apple.com/in/app/vipassanameditation-vri/id1491766806 Subscribe to Vipassana Meditation YouTube Channel Here: https://www.youtube.com/user/VipassanaOrg Anapana Meditation for All: An effective tool to deal with Stress, Fear and Anxiety. Anapana Meditation in Hindi - https://www.youtube.com/watch?v=TMfMdj7XAbk Anapana Meditation in English - https://www.youtube.com/watch?v=aYJmFdeBfVQ Exclusive dedicated Anapana sessions of around 60min can be arranged on request for government departments, schools, educational institutions, private companies and any other institutions. Please write to childrencourse@vridhamma.org To get more information on Anapana or to ask any question please email us your query at: questions@vridhamma.org Join Telegram Channel: https://t.me/joinchat/AAAAAExY2poP-74GPqFClg Also you can connect with us on: Official Social Profiles of Vipassana Meditation https://www.facebook.com/Vipassanaorganisation/ https://www.instagram.com/vipassanaorg/ https://twitter.com/VipassanaOrg Official Vipassana Organization Websites https://www.vridhamma.org/ http://www.globalpagoda.org/ https://www.dhamma.org Introduction to Vipassana Meditation by S N Goenkaji https://www.youtube.com/playlist?list=PLPJVlVRVmhc7K5cRpUxOcm4wOrK6_8O9G These videos are bought to you by Vipassana Research Institute (VRI) a non-profit-making body with the principal aim of conducting scientific research into the Vipassana Meditation Technique. The financing for running VRI comes mainly from donations. If you wish to make a contribution to this effort (100% tax exemption for Indians), please visit https://www.vridhamma.org/donate-online or through the mobile app mentioned above. May all be benefited. May all beings be happy. © Vipassana Research Institute

Оглавление (15 сегментов)

Segment 1 (00:00 - 05:00)

शांति प्रेमी सद गृहस्थ सज्जनों सनारियों शांति किसे नहीं चाहिए? सभी तो अशांत हैं। सभी बेचैन हैं। सभी दुखियारे हैं। किसी को किसी बात का दुख, दुख। आज किसी बात का दुख तो कल किसी दूसरी बात का दुख। बेचारा गृहस्थ किस कदर दुखों से संतप्त रहता है। अभाव में हो तो स्पष्टतया अभाव के कारण बड़ा दुखियारा है। पर जानता हूं जिन्हें कोई अभाव नहीं। घर में बहुत समृद्धि है। फिर भी सुख शांति तो नहीं है। बड़ी बेचैनी है। बड़े दुखी हैं। गृहस्थ को सुख शांति चाहिए। समृद्धि आवश्यक है। लेकिन केवल समृद्ध हो जाने से ही शांति नहीं आती। पश्चिम के देश आज हमसे कहीं ज्यादा समृद्ध हैं। कहीं ज्यादा धनवान है। लेकिन शांति जरा सी भी नहीं है। धनी से धनी व्यक्ति को रात को नींद नहीं आती तो सोने की गोलियां लेकर सोता है। उन देशों में टनों मनो नहीं टनों सोने की गोलियां रोज बिकती हैं। तनु ट्रंकलाइजेस रोज बिकते हैं। और हम देखते हैं ऐसी हालत अपने भी होने लगे। कितने लोग स्लीपिंग पल्स ले सोते हैं। कितने लोग ट्रक लेकर के सोते हैं। धन है, समृद्धि है, सब कुछ है। पर शांति नहीं है। क्यों नहीं है? शांत होने के जो तरीके थे वो खो बैठे। भारत तो बहुत बड़ा समृद्धिशाली देश था। केवल भौतिक संपदा में ही समृद्धिशाली नहीं था। अध्यात्म में बड़ा समृद्धिशाली था। जैसे आज भौतिक संपदा के लिए लोग पश्चिम के देशों की ओर देखते हैं। वैसे ही कभी भारत को भौतिक संपदा के लिए ही नहीं आध्यात्मिक संपदा के लिए भी बड़े सम्मान से देखा जाता था क्योंकि द्वेष में दोनों बातें थी। समृद्धि भी थी और आध्यात्मिक शांति भी थी। दोनों खो बैठे। भागदौड़ शुरू हुई समृद्धि के लिए। अच्छी बात है। समृद्धि चाहिए ही। गृहस्थ कंगाल होता है तो सुखी नहीं रह सकता। देश देश सुखी नहीं रह सकता। धर्म हमें कंगाली नहीं सिखाता। लेकिन केवल भौतिक संपदा ही प्राप्त कर लेंगे और फिर तनु ट्रकलाइजेस रोज का रोज कंज्यूम करेंगे। स्लीपिंग पीस कंज्यूम करेंगे तो वो संपदा हमारे क्या काम आएगी? तो पश्चिम की तरह हम भी दुखियारे हो जाएंगे। भारत के पास यह आध्यात्मिक शांति का जो तरीका था उसे खो बैठे। वो जागे और वो उपदेशों से नहीं जागता है। वो प्रवचनों धर्म ग्रंथों को पढ़ने से नहीं जागता। वह चर्चा परिचर्चा से नहीं जागता। उसके लिए मेहनत करनी होती है। परिश्रम करना होता है। पुरुषार्थ करना होता है। बातें तो बहुत करते हैं अध्यात्म की। सारा देश अध्यात्म की बातों में कितना मशगूल है। लेकिन अध्यात्म जीवन में कैसे उतरे? इसे भूल गए। और बड़ा कारण यह हुआ कि शिक्षा से आध्यात्म खो दिया।

Segment 2 (05:00 - 10:00)

ये विद्यालय ऐसे देश में हजारों लाखों विद्यालय जहां बच्चे पढ़ाए जाते हैं। उनको कह गए लिखना सिखाया जाता है। आगे जाकर के बहुत ऊंचा विज्ञान सिखाया जाता है। हर तरह की भौतिक शिक्षा दी जाती है। पर धर्म की शिक्षा नहीं दी जाती। यह देश का दुर्भाग्य हुआ। हम नहीं जानते इस पुस्तकालय इस विद्यालय में धर्म की कितनी शिक्षा दी जाती है। लेकिन ब्रह्म देश से यहां आने पर यह जानकर बड़ा दुख हुआ कि भारत की पाठशालाओं में धर्म को इसलिए दूर रखा गया कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष देश है। सेकुलर गवर्नमेंट है। तो सेुलर गवर्नमेंट है तो धर्म कैसे सिखाए? बड़ी भूल हुई। सरकार कभी धर्मनिरपेक्ष हो नहीं सकती। कहना यह चाहते थे कि सरकार संप्रदाय निरपेक्ष है। किसी संप्रदाय की तरफदारी नहीं करेगी। किसी संप्रदाय में लोगों को बांधने का काम सरकार नहीं करेगी। धर्मनिरपेक्ष नहीं धर्म सापेक्ष होगी। कठिनाई सबसे बड़ी यह हो गई हमारे देश की कि धर्म और संप्रदाय यह दोनों हमारे लिए पर्यायवाची शब्द हो गए। पिछले 20 वर्षों से देखता हूं कि जहां किसी समुदाय में समाज में धर्म शब्द का प्रयोग करता हूं तो लोगों के कान खड़े होते हैं। यह आदमी अब कौन से धर्म की बात करेगा? हिंदू धर्म की बात करेगा कि बौद्ध जैन धर्म की बात करेगा कि मुस्लिम धर्म की कि ईसाई धर्म की कि सिख धर्म की कि पारसी धर्म की बड़ा आश्चर्य होता है क्या धर्म अपने आप में अकेला कुछ नहीं क्या उसका कोई अस्तित्व ही नहीं जो देश इतना धर्मवान था आज उस देश में हिंदू धर्म प्रधान हो गया बौद्ध जैन धर्म प्रधान हो गया। मुस्लिम ईसाई धर्म, सिख धर्म, पारसी धर्म, यहूदी धर्म प्रधान हो गया। धर्म गौण हो गया। धर्म की जरूरत नहीं। बच्चे को बचपन से यह बात सिखाई जाती है। हिंदू परिवार में जन्मा है तो उसे सिखाया जाता है देख तुझे कट्टर हिंदू बनना है। प्राण चले जाए लेकिन तेरा हिंदू धर्म ना छूट जाए। मुस्लिम घर में जन्मा है तो बचपन से उसे सिखाया जाता है। तुझे कट्टर मुसलमान बनना है। तेरे प्राण चले जाए पर तू मुसलमान धर्म मत छोड़ देना। ऐसे ही जैन कट्टर जैनी बनना चाहता है। बौद्ध कट्टर बौद्ध बनना चाहता है। सिख कट्टर सिख बनना चाहता है। क्या हो गया इस देश को? कोई धार्मिक नहीं बनना चाहता। कोई नहीं कहता कि मैं कट्टर धार्मिक बनूंगा। बच्चों को नहीं सिखाया जाता कि तुम्हें कट्टर धार्मिक बनना है। वो बड़ा कठिन है। कट्टर हिंदू बनना बड़ा आसान है। कट्टर मुसलमान सिख बनना, ईसाई बनना बड़ा आसान है। कट्टर धार्मिक बनना बड़ा कठिन है। क्या धार्मिक होता है? जिसके जीवन में धर्म उतर गया। जिसके व्यवहार चारे चाल चलन में धर्म उतर गया। जिसका जीवन सदाचार से भर गया जिसका जीवनशील वो आदमी धार्मिक है। वो अपने को मुसलमान कहे या जैन कहे या हिंदू कहे या बौद्ध कहे या ईसाई कहे कुछ फर्क नहीं पड़ता। उसका जीवन कहता है कि ये व्यक्ति धार्मिक व्यक्ति है। यह व्यक्ति धर्मष् व्यक्ति है। शरीर और वाणी से कोई ऐसा दुष्कर्म नहीं करता जिससे अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग हो जाए। ऐसा काम नहीं करेगा। तो धर्मिष्ट हो गया। वो हत्या नहीं करेगा। हत्या करेगा तो अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होगी। वो चोरी नहीं करेगा। चोरी व्यभचार नहीं करेगा। व्यभचार करेगा तो अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होगी। वो झूठ बोल के किसी को नहीं ठगेगा। वो कड़वी बात बोलकर के किसी का जी नहीं दुखाएगा। वो चुगली की बात कह परनिंदा नशा पता करके किसी की हानि नहीं करेगा। तो धर्मवान हो गया है। वो अपने को हिंदू

Segment 3 (10:00 - 15:00)

कहता फिरे, वो अपने को जैन कहता फिरे, बौद्ध कहता फिरे, ईसाई कहता फिरे, पारसी कहता फिरे, सिख कहता फिरे। क्या फर्क पड़ा? अच्छा आदमी है ये। इसका चाल चलन अच्छा है। इसका व्यवहार अच्छा है। यह कोई ऐसा काम नहीं करता जिससे अन्य प्राणियों की सुख शांति भंग होती है। यह बात हमें बचपन में ही सिखाई जाती थी। हमारी सारी पाठशालाएं गुरुकुल कहलाते थे। क्या गुरुकुल होता है? जहां सिखाने वाला गुरु होता है। माने गौरवपूर्ण व्यक्ति होता है। ऐसा व्यक्ति जिसके जीवन में धर्म समा गया। ऐसा व्यक्ति धर्म ही सिखाएगा। सारे बच्चे उसके कुल के बच्चे हैं। ऐसा ऋषि कुल होता था। ऐसा गुरुकुल होता था। क्यों आज नहीं हो सकता? क्यों धर्म को हिंदू धर्म कह के सिखाया जाए? क्यों धर्म को बौद्ध जाए या ईसाई धर्म या जैन धर्म कह के सिखाया जाए? धर्म को धर्म कह के सिखाया जाए तो सरकार सेुलर रहे। हमारा क्या बिगड़ता है? अच्छी बात है। सरकार को सेकुलर होना ही चाहिए। सरकार को संप्रदाय निरपेक्ष होना ही चाहिए। जो सरकार किसी एक संप्रदाय का पक्षपात लेने लगी। बड़ी गई गुजरी सरकार है। वो देश का कल्याण नहीं कर सकेगी। समाज राष्ट्र का कल्याण नहीं कर सकेगी। लोगों में भेदभाव पैदा करेगी। तो सरकार को तो संप्रदाय निरपेक्ष होना ही चाहिए। धर्मनिरपेक्ष नहीं। धर्म सापेक्ष होना चाहिए। और है धर्म सापेक्ष। लेकिन पागलपन से शिक्षा में से क्यों निकाल दिया गया? यह बहुत बड़ी भूल हो गई। सरकार का सारा का सारा विधान संविधान कास्टिट्यूशन धर्म सापेक्ष ही है। देश का पीनल कोड क्या कहता है? कोई व्यक्ति हत्या करता है तो सरकार उसे दंड देती है ना? कोई आदमी चोरी करता है झूठ बोल के किसी को ठगता है सरकार उसे दंड देती है ना? कोई व्यभचार करता है सरकार दंड देती है ना? कोई नशा पता करके समाज की शांति भंग करता है। सरकार दंड देती है ना तो धर्म सापेक्ष हुई ना धर्मनिरपेक्ष कैसे हुई? कठिनाई ये हो गई देश की बहुत बड़ा दुर्भाग्य हो गया कि धर्म और संप्रदाय इन दोनों का भेद भूल गए। एक ही मान लिया दोनों। तो हिंदू बड़ा गर्व करता है कि मैं हिंदू हूं। मुसलमान मुसलमान हूं। बौद्ध बड़ा गर्व करता है मैं बौद्ध हूं। जैन जैन हूं। सिख बड़ा गर्व करता है। मैं सिख हूं। कोई यह गर्व नहीं करता कि मैं धार्मिक हूं। सिखाया ही नहीं गया। हमें बांट दिया गया। हिंदू धर्म का अलग टुकड़ा, बौद्ध जैन धर्म का अलग टुकड़ा, ईसाई धर्म का अलग टुकड़ा। ऐसे त्यौहार मना लिया करो। तो तुम इस संप्रदाय के व्यक्ति हो। ऐसे त्यौहार मनाने वाले ऐसे व्रत उपवास करने वाले इस संप्रदाय के व्यक्ति ऐसे पूजा पाठ करने वाले उस संप्रदाय के व्यक्ति ऐसा कर्मकांड करने वाले इस संप्रदाय के व्यक्ति ऐसे कर्मकांड करने वाले उस संप्रदाय के व्यक्ति ऐसी भेशभूषा वाले इस वेशभूषा वाले उस संप्रदाय के व्यक्ति ऐसी दार्शनिक मान्यता को मानने वाले इस उस संप्रदाय के व्यक्ति अरे इन सारी बातों का धर्म से जरा सा भी संबंध नहीं दूर पर का भी संबंध नहीं और इसको हमने धर्म मान लिया तो बच्चों को सचमुच क्या सिखाएंगे स्कूलों में बच्चों को यही सिखाना शुरू कर दें कि देख तुझे ऐसा पूजा पाठ करना चाहिए तुझे ऐसे कर्मकांड करने चाहिए तू हिंदू है तो ऐसी लंबी चोटी रखनी चाहिए। तू मुसलमान दाढ़ी रखनी चाहिए। तू सिख है तो तुझे लंबे केस रखने चाहिए। तुझको ऐसे कपड़े, ऐसी व्यवहार, ऐसी बात जो बाहर से दिखावा है। तुझको ऐसा करना चाहिए। तुझको वैसा करना चाहिए। तो सचमुच हिंदू धर्म सिखा रहे हैं। बौद्ध जैन धर्म सिखा रहे हैं। ईसाई धर्म सिखा रहे हैं। धर्म नहीं सिखा रहे। बच्चों को यही सिखाएं कि तुम्हें हत्या नहीं करनी है। तुम्हें चोरी व्यभचार नहीं करना है। तुम्हें झूठ नहीं बोलना है। कड़वी बात नहीं बोलनी है। चुगली की पर निंदा तुम्हें नशा पता नहीं करना है। तो धर्म की बात हुई ना? वो अपने व्रत त्यौहार चाहे जैसे मनाए हिंदुओं के मनाए मुसलमान मुसलमानों के मनाए सिख सिखों के मनाए। वो अपनी पूजा पाठ ऐसी करे वैसी करें। अपनी दार्शनिक मान्यता ऐसी माने वैसी माने अपने मंदिर में जाए मस्जिद में जाए गुरुद्वारे

Segment 4 (15:00 - 20:00)

में जाए कहीं जाए मूल बात तो धर्म की यह कि शरीर और वाणी से कोई ऐसा काम नहीं करूंगा जो अन्य लोगों की सुख शांति भंग करता है। यह पाठ बचपन से बच्चों को सिखा दें। आसान है सिखाना। बचपन से हम बच्चों को देखो तुम्हें यह पांच व्रत पालने होंगे। बच्चा उसे याद कर लेगा। अभी छोटी उम्र है। मन बड़ा कोमल है। जो मां-बाप कहेंगे पाठशाला में जो बात सुनाई जाएगी वो उसे अच्छी लगेगी। उसे स्वीकार करेगा। लेकिन फिर देखिएगा कि यह उपदेश देने वाले चाहे मां-बाप है, चाहे मेरे स्कूल के टीचर हैं, यह खुद तो पालन नहीं करते ना। एक व्यापारी अपने बच्चे को कहता है, तुम्हें रोज सच बोलना चाहिए। झूठ मत बोलना। झूठ बोलने से बहुत पाप लगता है। बच्चे के मन पर बड़ी अच्छी छाप पड़ती है। झूठ नहीं बोलना चाहिए। बाप कहता है ना और बाप की दुकान पर किसी छुट्टी के दिन बैठता है तो देखता है बाप सुबह से झूठ बोलना शुरू करता है शाम तक झूठ ही बोले जाता है तो बच्चा उसकी ओर देखता है कि हमें तो कहता है सच बोलो और ये तो झूठ ही बोलता है मां उसे कहती है देख हमेशा सच बोला कर झूठ नहीं बोलना पड़ोसी का टेलीफोन आता है तेरी मां को बुला अरे कह दे उसको घर पे नहीं है बच्चा उसके मुंह की ओर देखता है घर पे नहीं है। घर पे है ना? घर पे कैसे नहीं है? मैं कहती हूं ना बोल दे घर पे नहीं है। धीरे-धीरे बच्चे के बात समझ में आने लगती है कि भाई ये पाठ तो अपनी जगह है और करना अपनी जगह है। धर्म अलग है। कर्म अलग है। धर्म और कर्म के दो कंपार्टमेंट है अलग-अलग। धर्म की बातें किया करो। धर्म की बातें सुना करो। धर्म को पालन मत करो। पालन करोगे तो तुम सुखी कैसे होगे? तुम धनवान कैसे होगे? तुम्हारे घर में पैसा कैसे आएगा? बाप देखो इतना झूठ बोलता है तो पैसा आता है ना उसके पास। झूठ नहीं बोलता तो पैसा नहीं आएगा ना। तो झूठ बोल। कर्म में झूठ और उपदेश में सच तो बचपन से ही बच्चे के समझ में आने लगता है। यह कोरे उपदेश हैं। इनको पालन करना जरूरी नहीं है। तो पहली बात तो ये कि घर में माता-पिता धर्म का पालन नहीं करेंगे और चाहेंगे कि हमारे बच्चे धर्मवान बन जाए तो होने वाली बात नहीं है। मां-बाप इस बात में खुश हैं कि मैं कट्टर हिंदू हूं। मैं कट्टर मुसलमान हूं। मैं कट्टर जैन हूं। मैं कट्टर बौद्ध हूं। मैं कट्टर ईसाई हूं। क्योंकि उनके ऐसे जो त्यौहार होते हैं सब मनाता हूं। उनके जैसेजैसे व्रत होते हैं सब करता हूं। उनके जो पूजा पाठ है सब करता हूं। ये काम करता हूं। वो काम करता हूं। सदाचार का पालन करना जरूरी नहीं है। कट्टर हिंदू बनने के लिए मुसलमान बनने के लिए कट्टर बौद्ध कट्टर ईसाई कोई जरूरी नहीं है। ये कर्मकांड पूरे कर लो। बस तुम कट्टर हिंदू हो गए। ये कर्मकांड पूरे कर लो। तुम कट्टर मुसलमान हो गए। कैसे अपने बच्चों को धर्म सिखाएंगे? कठिन बात हो गई ना? तो इस कठिन बात को कैसे सुधारें? अगर बच्चों को केवल उपदेश देकर ही रह जाए तो बात बनती नहीं। उनके सामने एक उदाहरण होना चाहिए। स्कूल में टीचर कहती है कि देखो तुम्हें गुस्सा नहीं करना चाहिए। और थोड़ी देर के बाद वही बैत पीटती है गुस्से के मारे। वो बच्चा देखता है कि देखो ये उपदेश तो देती है। तुम्हें गुस्सा नहीं करना चाहिए। और खुद इतने गुस्से के मारे बैठ पीटती है। अच्छा यह भी उपदेश की बात है। गुस्सा नहीं करना चाहिए। ये एक उपदेश की बात करने की बात नहीं। अरे ये सारी बातें जब सिखाने वालों के जीवन में नहीं उतरेगी तो बच्चों के जीवन में कैसे उतरेगी? तो पहली बात तो जिनको धर्म सिखाना है और क्यों सिखाना है? शांति नहीं मिलेगी। बिना जीवन में धर्म उतरे हुए हजार संपदा आ जाए। शांति नहीं आएगी। सहूलियत खूब आ जाएगी। सीढ़ियों पर नहीं चढ़ना पड़ेगा। लिफ्ट लगा लेंगे। चढ़ जाएंगे लिफ्ट से। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। यहां से 10 कदम भी चलना हो तो कार सामने होगी। कार में बैठ के चले जाए। कहीं गर्मी ना लग जाए इसके लिए एयर कंडीशन लगा के बैठ जाएंगे। ये सारी सुविधा आ जाएगी। शांति कहां से आएगी? सुविधा में और शांति में जमीन आसमान का फर्क सारी सुविधाएं होते हुए भी आदमी बेचैन रहता है। बड़ा बेचैन रहता है। ऐसा क्यों हो गया?

Segment 5 (20:00 - 25:00)

ऐसा क्यों नहीं हुआ? ये मेरी मनचाही बात क्यों नहीं हुई? ये अनचाही बात क्यों हो गई? अरे सारे जीवन भर यही करता है। मेरी मनचाही नहीं हुई। उसने ऐसा क्यों कर दिया? उसने ऐसा क्यों कह दिया? दुखी है ना। क्योंकि सीखा ही नहीं धर्म पालन करना। उपदेश बहुत सुने। उपदेश देता भी बहुत है, उपदेश सुनता भी बहुत है। पालन नहीं करता। कैसे करें? करने की विद्या लुप्त हो गई। मन ही वश में नहीं हो तो कैसे पालन करें? एक शराबी आदमी नहीं चाहता कि उसका बच्चा शराबी बने। नहीं चाहता क्योंकि वो जानता है शराब पीना बहुत बुरा है। लेकिन मुझे लत लग गई। मैं क्या करूं? अपने बच्चे को बचाना चाहता है। एक जुारी आदमी नहीं चाहता है कि उसका बच्चा जुआ खेले। उससे दूर रखना चाहता है। एक व्यभचारी व्यक्ति नहीं चाहता कि उसके बच्चे व्यभचारी बन जाए। दूर रखना चाहता है लेकिन खुद नहीं निकल पाता। उन व्यसनों से आसक्तियों से स्वयं नहीं निकल पाता। कैसे बच्चे को दूर रखेगा? तो ये विद्या पहले मां-बाप को सीखनी होगी। स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक अध्यापिकाओं को सीखनी होगी। अपने मन को कैसे वश में करें। जिसका मन वश में नहीं वह बुद्धि के स्तर पर हजार समझता रहे कि हमको सदाचार का जीवन जीना है। हमको दुराचार का जीवन नहीं जीना। यह खूब समझता है। स्वीकार भी करता है। फिर भी मन वश में नहीं है तो सदाचार से दूर रहता है। दुराचार का ही जीवन जीता है क्योंकि मन का मालिक नहीं है। तो हमारे यहां देश में केवल उपदेश नहीं हुआ करते। धर्म शब्द का अर्थ यही है कि उपदेश मत दो। धारण करो। धार धर्म धारण करता है तो धर्म है। धारण नहीं करता तो धर्म नहीं है। कोरी बातें हैं। हमारे देश में धर्म को कोरी बातें कोई मानता ही नहीं था। धारण करने को ही धर्म मानते थे। अब तो बात करने को धर्म मानते हैं। धारण करने की जरूरत नहीं। खूब बातें करो। हम भी आ गए। घंटे भर बोल जाएंगे। बहुत अच्छा बोला। देखो धर्म कितना समझाया हमको। बोलने वाला अगर यह ना सोचेगा कि मैं जो बोल रहा हूं उसको मैं धारण कर रहा हूं कि नहीं। सुनने वाले यह नहीं सोचेंगे कि आज जो बात सुने उसको कैसे धारण करें। कोई तरीका होना चाहिए। हम भी सीखे उस तरीके को तो वाणी विलास बुद्धि विलास अरे सारा देश डूब गया इस वाणी विलास में इस बुद्धि विलास में भारत जैसा कोई देश दुनिया में नहीं जहां धर्म की चर्चा ना होती हो। कितनी बातें धर्म ही धर्म की पुस्तकें देखो तो ढेर लग गया धर्म की पुस्तकों का और लोगों को देखो तो कोई धारण नहीं करता क्योंकि बोलने में ही रस है सुनने पढ़ने में ही रस है चर्चा करने में ही रस है धारण करना भूल गए ना तो धारण कैसे करें उसकी विद्या भारत में हुआ करती थी और वो शुद्ध विद्या होती थी संप्रदाय की विद्या नहीं ये बात भारत के लोगों को जितनी जल्दी समझ में आ जाएगी सारी विद्यालयों में सही मायने में ऋषिकुल आरंभ हो जाएगा। ऋषियों का आश्रम होने लगेगा। वहां पर शील सदाचार केवल उपदेश की बात नहीं होगी। जीवन में कैसे उतारे मन को कैसे वश में करें? बहुत तरीके होते हैं मन को वश में करने के। थोड़ी देर आंख बंद करके बैठ जाओ। और जिस किसी देवी में, देवता में, ईश्वर में, ब्रह्म में, किसी महापुरुष में, किसी संत में बड़ी श्रद्धा हो उसका नाम लेना शुरू कर दो। भीतर ही भीतर बार-बार उसका नाम उच्चारण करो। बार-बार नाम जप करो। जपते जपते मन शांत होने लगेगा। मन एकाग्र होने लगेगा। मन के मालिक हो गए। और एक तरीका सिखाया गया कि जिस किसी देवी देवता ईश्वर ब्रह्म अल्लाह मियां कोई संत कोई महापुरुष जिस किसी के प्रति श्रद्धा हो तो उसका कोई रूप का ध्यान करो। उसकी आकृति का ध्यान करो। बंद आंखों के सामने कल्पना करो। ऐसा हमारा देवता है। ऐसा हमारा ईश्वर है। बार-बार उसका ध्यान करते मन एकाग्र हो जाएगा। मन के मालिक हो जाओगे। लेकिन फिर संप्रदाय की बात हुई। हर संप्रदाय का अपना ईश्वर है। अलग-अलग ईश्वर सबके परमात्मा सबके अलग-अलग अपने देवी, अपनेप देवता, अपनेप संत तो किसी एक संप्रदाय के ईश्वर का नाम दूसरा संप्रदाय वाला कैसे लेगा? स्कूल में ये पढ़ाया जाए कि तुम थोड़ी देर आंख बंद करके राम राम राम बोलो। तो जो मुस्लिम बच्चे होंगे राम क्यों बोले भाई? हमको अल्लाह बोलना सिखाओ तो हम बोलेंगे नहीं तो नहीं बोलेंगे। जो ईसाई बच्चा होगा हमको गॉड बोलना सिखाओ तो बोलेंगे नहीं तो नहीं बोलेंगे। जो जैन बच्चा होगा वो हमको अनरंत अनंत महावीर बोलना सिखाओ तो बोलेंगे नहीं तो नहीं बोलेंगे जो बौद्ध होगा हमको बुद्ध बोलना सिखाओ तो अरे फिर संप्रदाय की बात हो गई ना फिर झगड़े तो हमारे देश में एक विद्या सिखाई गई जिसका संप्रदाय से कोई लेनदेन नहीं हर बच्चे को बूढ़े को औरत को मर्द को यही सिखाया जाता था आंख बंद करके अपने सांस को जान सांस

Segment 6 (25:00 - 30:00)

आता है सांस जाता है बस इसको जानते रहे। सांस आ रहा है तो हमने जान लिया आ रहा है। सांस जा रहा है हमने जान लिया जा रहा है। जैसा भी सांस है लंबा है तो जान लिया लंबा है। ओछा ओछा है। सांस की कसरत नहीं करनी सिखाएगी। सांस को नियंत्रण करना नहीं सिखाया। प्राणायाम नहीं सिखाया। वो बिल्कुल अलग विद्या है। ये केवल पहरेदार बन जाओ अपने सांस के। आता है तो जान लो आता है। जाता जाता है। भारी है तो जान लो भारी है। हल्का है तो जान लो हल्का है कि लंबा है कि ओछा है कि बाई नाक से गुजर रहा है कि दाहिनी है। बात तो बड़ी अजीब सी लगेगी। अरे इसको देख के क्या मिलेगा? ये तो आ ही रहा है ना। हम ना देखें तो भी आ रहा है। जा रहा है। अरे बाबा इसको क्या देखें? ये भी कोई बात हुई। लेकिन बड़े समझदार थे हमारे देश के ऋषि। महापुरुष। उन्होंने यह विद्या क्यों सिखाई? एक तो इसलिए कि किसी संप्रदाय में नहीं बंधोगे। सांस तो हर एक देख सकता है। हिंदू का सांस भी वैसा ही, मुसलमान बौद्ध का, जैन का, ईसाई का कोई फर्क नहीं। हम किसी सांस को नहीं कह सकते। ये तो अब के जो आ रहा है ये हिंदू सांस आ रहा है। देख अब के मुस्लिम सांस आना शुरू हो गया। ये इसको जैन सांस आता है। इसको बौद्ध सांस आता है। ऐसा नहीं होता ना। सांस तो सांस है। सार्वजनिक बात है। सबकी एक जैसी बात है। तो सबसे बड़ा कारण तो यह कि केवल सांस को देखना शुरू करो ताकि किसी संप्रदाय से नहीं बंधोगे। तो आज के जैसी सरकार होगी, सेकुलर सरकार होगी जो कहती है कि हम धर्मनिरपेक्ष हैं। हम कहते हैं तुम संप्रदाय निरपेक्ष हो। अच्छा बाबा अपने को धर्मनिरपेक्ष कहो चाहे पर बच्चों को यह तो सीखने दो कि सांस आता है सांस जाता है। मां-बापों को भी देखते जाएंगे देखते जाएंगे तो एक ऐसा आलंबन मिल गया जिस आलंबन के सहारे मन टिकना शुरू हो गया। गया तो धीरे-धीरे मन के मालिक होने लगे। एक बड़ी बात हुई। इसके आगे बढ़ेंगे तो और बड़ी बात हो जाएगी। आदमी को यह देखना है कि हमको कहा गया तू हत्या मत कर। लेकिन जब किसी पर गुस्सा आ जाता है तो हम तो हत्या कर देते हैं। तो मूल बात यह है कि हमको गुस्सा ना आए। हम में क्रोध नहीं जागे। हम में द्वेष दुर्भावना नहीं जागे। हमको कहा गया चोरी मत कर। पर एक चीज बड़ी अच्छी लगी। हम में लोभ जाग गया। हमने चोरी कर ली। हमको कहा गया व्यभचार मत कर। और वासना जागी। हमने व्यभचार कर लिया। अरे भाई मत कर मत कर। तो सब कहते हैं। पर कैसे मत कर? अच्छा मन का मालिक भी हो गए तो भी क्या हुआ भीतर से जो विकार जागा वो सिर पर ऐसा सवार हो गया कि मन की सारी मलकियत धरी रह गई और हमको जो नहीं करना था हम तो कर गए तो इसलिए हमारे देश के महापुरुषों ने संतों ने सत्पुरुषों ने ये सिखाया कि मन को निर्मल करना सीख केवल वश में करना नहीं निर्मल हो उसमें विकार नहीं आए तो जल्दी से जल्दी दूर हो जाए कोई विकार तेरे सिर पर सवार नहीं हो जाए तुझको पागल नहीं बना दे। विकार कैसे दूर करें? तो उसके लिए देखना सिखाया कि विकार कहां जागता है। अरे देख तेरे भीतर मन में विकार कहां जागा? देखना ही भूल गए ना। किसी ने हमें गाली दी। हमें क्रोध आ गया। अब क्रोध कहां जागा ये नहीं देखते। उसने गाली दी। हमारे लिए जिसने गाली दी वो प्रमुख हो गया। बार-बार उसी का चिंतन उसने गाली दी। देखो उसने गाली दी। बार-बार उसका चिंतन करते हैं। मानो उस गाली को ही देखते हैं। गाली देने वाले को देखते हैं। तेरे भीतर क्रोध जागा उसको नहीं देखता ना। क्योंकि देखना आता ही नहीं ना। कैसे देखे? क्रोध तो सिर पर ऐसे भूत की तरह सवार हो गया। उसको कैसे देखे? जिसने गाली दी वो खूब दिखता है। इसने गाली दी। 5 वर्ष भी याद रखेगा। 10 वर्ष भी उसने गाली दी। उसने मेरा उस वक्त अपमान किया था। बदला लेकर छोडूंगा। खूब याद रखता है। अरे तेरे भीतर क्रोध जागता है। उसको नहीं देख पाया ना। तुझे पता ही नहीं ना कैसे क्रोध जाग गया। तेरे भीतर वासना जागी। तुझे पता ही नहीं लगा कैसी वासना जागी। तू सिर पर सवार हो गई। तेरे अंदर भय जागा भय सिर पर सवार हो गया। तेरे अंदर जो विकार जागा तेरे सिर पर सवार हो गया। वो तूने कहां देखा? तो देश के संतों ने ऋषियों ने, महापुरुषों ने उसे देखना सिखाया। उसे देखने के लिए सांस देखना सिखाया। जो आदमी अपना सांस देखना शुरू कर देता है। शुद्ध सांस। उसके साथ कोई शब्द नहीं जोड़ेगा। उसके साथ कोई रूप, कोई आकृति नहीं जोड़ेगा। एक वैज्ञानिक की तरह अपने भीतर यह माइंड और मैटर इनका इंटरेक्शन कैसे होता है? माइंड कैसे काम करता है? कैसे बॉडी पर उसका इन्फ्लुएंस होता है? कैसे बॉडी के इन्फ्लुएंस होने पर कैसे माइंड फिर रिएक्ट करता है? ये सारा का सारा करंट और अंडर करंट एक्शन और रिएक्शन उसको देख के अपने विकारों से मुक्ति पा सकता है। तो खाली सांस देखेगा शुद्ध सांस देखेगा तो बड़ी जल्दी ये बात समझ में आने लगेगी कि जब मेरे मन में कोई विकार जागता है

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क्रोध जागे कि द्वेष जागे कि ईर्ष्या जागे कि भय जागे कि वासना जागे कि अहंकार जागे कोई विकार जागे सांस अपनी स्वाभाविकता खो देगा। सांस स्वाभाविक रह नहीं सकता। तेज हो जाएगा, भारी हो जाएगा। और जैसे ही विकार दूर हुआ सांस फिर वैसा का वैसा स्वाभाविक हो गया। अरे तो इन विकारों का मेरे सांस से बहुत गहरा संबंध है। इसलिए देश के ऋषियों ने, मुनियों ने, महापुरुषों ने सांस का दर्शन करना सिखाया कि सांस को देखना सीख। सांस को देखतेदेखते तू अपने मन को देखने लगेगा। और मन को देखतेदेखते मन के विकारों को देखने लगेगा। और जब देखने लगेगा तो भीतर से जाग उठेगा। अब तो भीतर से सोए हैं ना बाहर से जागे हैं। और जो भीतर से जाग गया उसमें विकार नहीं जागते। उसमें विकार जाग गए तो टिकते नहीं। जिस घर का मालिक सोया है उस घर में चोर आते हैं। जिस घर का मालिक जाग रहा है चोर आते नहीं। डरते हैं। और आ भी गए और देख लिया मालिक जाग रहा है तो भाग जाएंगे। टिकेंगे नहीं। यही बात हमारे मन की है। हम भीतर से जागते रहेंगे। विकार अंदर आने नहीं पाएंगे। भूलेके आ भी गए तो टिकने नहीं पाएंगे। भागना पड़ेगा उनको। बस ये विद्या को ही पुरानी भाषा में विपश्यना कहते थे। पश्चना माने देखना। विपश्यना माने साक्षी भाव से देखना। तटस्थ भाव से देखना। भोगता भाव से नहीं। गुस्सा आया और उसे भोगने लगे तो गुस्से को और बढ़ाएंगे। गुस्सा आया उसे साक्षी भाव से देखने लगेंगे। अच्छा भाई ये गुस्सा आया है। तुझे भी देखते हैं तो कब तक रहता है। तुझे भी देखें है? देखें तो तुझे और देख गुस्सा आया तो हमारे शरीर पर क्या होने लगा? इसको भी देखते हैं तो देखेगा धड़कन बढ़ गई। देखेगा तनाव बढ़ गया या देखेगा कि होठ कांपने लगे। आंख लाल होने लगी। मुंह लाल होने लगा। अरे क्या होने लगा? सांस तेज हो गया। इसको भी देख। इसको भी देखता है। अरे देखते देखतेदे गुस्सा ठंडा हो गया। भाग गया। चोर को देख लिया ना। चोर घर में आ गया था। उसको देख लिया वो टिकेगा नहीं भागना ही पड़ेगा तो भाई ये जागृति भीतर की जागृति ये नहीं आएगी तो विकारों से छुटकारा नहीं होगा और तो मन को हजार कंट्रोल कर ले फिर भी बार-बार ये विकार जाग करके सारा कंट्रोल तोड़ देंगे हमारा धरा रह जाएगा हमारा कंट्रोल काम नहीं आएगा और फिर सदाचार का जीवन जी नहीं सकेंगे चाहे तो भी नहीं जी पाएंगे तो पहली बात धर्म की ये कि शील सदाचार का जीवन जिए दूसरी बात यह जीने के लिए मन को वश में करना सीखें और तीसरी बात मन को सही ढंग से वश में करने के लिए मन को निर्मल करना सीखें। उसके विकार दूर करें। सांस को देखतेदे अपना सारा शरीर में क्या हो रहा है इसका दर्शन होने लगेगा। अपने चित्त जब और आगे बढ़ जाता है। आदमी इस साधना को एक वैज्ञानिक की तरह देख रहा है। जैसे रिसर्च स्कॉलर एक साइंटिस्ट रिसर्च का होता है। वह देखता है कि यह क्या प्रपंच है? यह क्या फिनोमना है? हमारे माइंड और मैटर में क्या होता है? तो देखता है जैसे बाहर से किसी ने कोई अप्रिय बात कह दी, कोई अप्रिय काम कर दिया और देख हमको बड़ा बुरा लगा। बुरा लगते ही हमने विकार जगाया। अब क्या हुआ? विकार जगाते ही शरीर में एक बायोकेमिकल रिएक्शन होना शुरू हो गया। गर्मी बढ़ी कि धड़कन बढ़ी कि कोई ऐसा प्रवाह चला, केमिकल प्रवाह चला हमारे रक्त के साथ। हम बड़े व्याकुल हुए और जितने व्याकुल हुए उतना विकार बढ़ाया हमने। मानो हमको गुस्सा आया। किसी ने गाली दी वो तो बाहर की एक घटना हुई। हमारे भीतर क्या होने लगा? उसने गाली दी। हमको बुरा लगा। बुरा लगते ही हमने विकार जगाया। क्रोध जगाते ही हमारे भीतर ऐसा एक बायोकेमिकल रिएक्शन होना शुरू हो गया कि हमारे रक्त की धमनियों में रक्त की शिराओं में रक्त के साथ-साथ एक केमिकल ऐसा बहने लगा। पुरानी भाषा में उसको कहते थे आश्रव बहने लगा। कुछ बहने लगा हमारे शरीर में कुछ बहने लगा वो क्या बहने लगा जो बहने लगा उसने हमें और व्याकुल बनाया हमने क्रोध किया तो इस तरह का केमिकल बहने लगा जिसने हमको बहुत व्याकुल बनाया क्रोध भी करे और व्याकुल नहीं हो असंभव बात है कोई आदमी क्रोध करे और क्रोध करते हुए मुझको बड़ी शांति मालूम होती है। बड़ा सुख होता है। अरे क्रोध भी जागा और देख कितना सुख मालूम होता है। बावली बात हो नहीं सकता। अरे क्रोध जागेगा तो ऐसा केमिकल तेरे भीतर बहेगा तुझको व्याकुल बना देगा तू हिंदू है तो भी बना देगा तू मुसलमान है तो भी व्याकुल बना देगा तू जैन है कि बौद्ध है कि ईसाई है कुदरत इस बात को नहीं देखती प्रकृति कि इस आदमी ने अपने माथे पर क्या नाम लिख रखा है हिंदू का बिल्ला लगा रखा है कि मुसलमान सिख का कि जैन का कि बौद्ध का कि ब्राह्मण का कि शूद्र का क्या बिल्ला लगा रखा है कुछ नहीं देखती वो क्रोध जगाया है ना तुरंत दंड देगी क्रोध जगा लगाते ही ऐसा बायोकेमिकल रिएक्शन शुरू होगा व्याकुल हो जाएगा। अब एक और पागलपन शुरू होगा कि जैसे ही वो बायोकेमिकल हमारे

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अंदर होने लगा और व्याकुल हुए हमने और क्रोध जगाया। हमने और क्रोध जगाया वो और बायोकेमिकल बहने लगा। वो बायोकेमिकल और बढ़ा। हमने और क्रोध जगाया। अरे ये विषयस सर्कल चल पड़ा। ये दुष्टचक्र चल पड़ा। घंटों क्रोध ही क्रोध करते चले जाएंगे। जिस आदमी ने गाली दी उसने तो एक बार गाली दी और चला भी गया। वो तो भूल भी गया होगा। हम नहीं भूलते ना। हम क्या करते हैं? उसने तो हमको एक बार व्याकुल बनाने के लिए गाली दी। हम एक बार भी व्याकुल हुए। यह भी अपनी मूर्खता थी। पर हो गए भाई। एक बार तो व्याकुल हो गए। अब घंटों व्याकुल रहेंगे। अरे दिनों व्याकुल रहेंगे। बरसों व्याकुल रहेंगे। उसने गाली दी थी। तब गाली दी थी। ऐसा अपमान किया। जन्म भर नहीं भूलूंगा। मत बोल जन्म भर। किस पर एहसान करता है? जन्म भर नहीं भूलेगा। जन्म भर व्याकुल रहेगा। कर क्या रहा है? बेचारे को होश नहीं है ना। अपने भीतर देखता नहीं कि जब उस घटना को याद करके मैं क्रोध जगाता हूं तबतब ऐसा एक बायोकेमिकल ऐसा एक आश्रव अपने भीतर बहाने लगता हूं ऐसा एक केमिकल बहाने लगता हूं जिससे और क्रोध जागता है और आश्रव बहता है और घंटों व्याकुल रहता हूं। घंटों व्याकुल ऐसे ही वासना जागी। किसी व्यक्ति को देखकर के वासना जागी। वासना जागते ही ऐसा एक बायोकेमिकल अंदर रिएक्शन शुरू हो जाएगा। ऐसा आश्रव बहने लगेगा कि और वासना जागी। और वासना जागेगी और वैसा बायोकेमिकल जागेगा और वासना जागेगी आश्रव जाग रहा है और विकार जाग रहा है हम व्याकुल ही व्याकुल होते चले गए ना कोई विकार ऐसा नहीं है कि जिसका हमारे शरीर पर असर ना पड़े जिसकी वजह से कोई आश्रव कोई केमिकल रिएक्शन हमारे अंदर ना होने लगे ये कुदरत के बंधे बंधाए नियम है जो सब पर लागू होते हैं हमारे देश के बड़े-बड़े ऋषि किस लिए ऋषि कहे गए जिन्होंने ने ऋत का दर्शन किया वो ऋषि कहलाया। कुदरत का कानून क्या है? उसको रित कहते थे। ऐसी प्रज्ञा भीतर जगाई। रितम भरा प्रज्ञा जो रित को जानती है। कुदरत के कानून को जानती है। लॉ को जानती है। नेचर को जानती है। ऐसा होगा तो भाई ये परिणाम आएगा ही। दो हिस्से का हाइड्रोजन और एक हिस्से का ऑक्सीजन मिलेगा तो पानी बन ही जाएगा। इसमें हिंदू पने की क्या बात? इसमें बौद्ध पने की बात क्या है? इसमें जैन बनेगी कि ईसाई बनेगी रहे ना हिंदू अपना हिंदू रहे बौद्ध अपना बौद्ध रहे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन मिलेंगे तो पानी बन ही जाएगा ऐसे ही हमने कोई विकार जगाया और केमिकल ज्यादा उसके जैसा तो हम व्याकुल हो ही जाएंगे रहे ना हिंदू रहे बौद्ध रहे जैन रहे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन नहीं मिलेंगे पानी नहीं बनेगा हिंदू रहे बौद्ध रहे जैन रहे ईसाई रहे क्या फर्क पड़ गया हम विकार नहीं जगाएंगे ऐसी बायोकेमिकल रिएक्शन नहीं होने देंगे हम व्याकुल नहीं होंगे हम बड़े शांत रहेंगे बड़े सुखी रहेंगे तो भाई ये करने के लिए कोई अभ्यास करना पड़ता है ना। छोटे से छोटा काम भी बिना अभ्यास के नहीं होता। किसी बच्चे को दो चक्के की साइकिल पर चढ़ा दो। कोई चला क्या चलाएगा बेचारा? अपना संतुलन नहीं रख पाएगा। कभी इधर गिरेगा, कभी उधर गिरेगा। दो चक्के की साइकिल है ना? लेकिन धीरे-धीरे अभ्यास करते-करते ऐसा चलाएगा कि हाथ छोड़ के चलाएगा। अब तो सीख गया। किसी को पानी में छोड़ो। तैरना सिखाओ। अरे आंख में पानी गया, नाक में पानी गया। हाय रे मरा रे मत डूबा रे। और यूं करते-करते यूं तैरने लगा। नदी रही, समुद्र भी पार कर जाए। इतना तैरने लगा अभ्यास करना होता है ना अरे मन को विकारों से विमुक्त करना है और भीतर सही सुख शांति प्राप्त करनी है और वो किसी की कृपा से हो जाएगी गुरु महाराज अल्लाह मियां की कृपा से हो जाएगी हमको कुछ नहीं करना हम कुछ नहीं करते तो भाई कोरे के कोरे रह जाओगे कुछ नहीं होगा प्राप्त कुछ नहीं होगा बड़ा पुरुषार्थ करना पड़ता है बड़ी मेहनत करनी पड़ती है और तरीका मालूम हो तो पुरुषार्थ अपना फल तत्काल देने लगता है स्कूलों में बच्चों को केवल पहला पाठ सिखाया विपसना का कि तुम केवल सांस देखना सीखो। सुबह शाम बच्चे थोड़ी-थोड़ी देर 101 मिनट केवल सांस देखना सीखे। दो चार छ महीने में रिजल्ट आने लगे कि बच्चे में बड़ा परिवर्तन आने लगा। उनके माता-पिता लिखने लगे। हमारे बच्चे में बड़ा परिवर्तन आया। कुछ बच्चे आते हैं इगतपुरी में तीन दिन का शिविर लगता है केवल सांस सीखने का। और उसके बाद देखते हैं रोज सुबह शाम करते हैं। बड़ा परिवर्तन आने लगा। पढ़ाई में तेज हो गए। स्मरण शक्ति तेज हो गई। उनकी याददाश्त बड़ी तेज हो गई। उनमें जो नर्वस पना था वो निकल गया। बच्चे ने साल भर खूब मेहनत की है। अपने विषय को अपने सब्जेक्ट को खूब समझ गया है। उससे चाहे जब पूछ लो अपना सब्जेक्ट खूब समझा के बोल देगा। लेकिन जब परीक्षा देने के लिए बैठा एग्जामिनेशन में गया तो नर्वस हो गया। वो पेपर खोलते ही नर्वस हो गया। सब भूलभाल गया। तो जवाब नहीं देकर आया या गलत तरीके से देकर आया तो पास नहीं हुआ या फेल पास भी हुआ तो बहुत कम नंबरों से पास हुआ तो क्यों भाई पढ़ाई तो उसने बिल्कुल ठीक की थी ना तो कमी क्या रह गई कि उस बेचारे को नर्वस नहीं होना चाहिए सिखाया नहीं गया कहने को तो सब ने कहा नर्वस मत हो जाना देखो तुम एग्जामिनेशन में जाओ ना तो नर्वस मत हो जाना अरे मत हो जाना तो

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कहते हो कैसे मत हो जाना ये तो सिखाया नहीं ना किसी ने उसी बच्चे को ये सिखाया जाए कि तुम रोज सुबह शाम 10-10 मिनट जो सांस देखते हो ना पर्चा खोलने के पहले आंख खोले ही थोड़ी देर अपने सांस को देखो 5 मिनट देखो बस फिर पर्चा खोलो जरा सा नर्वस पने का नामोनिशान नहीं रहेगा बल्कि जो बात भूल गई थी वो सर याद आ जाएगी बहुत अच्छा पर्चा करके आएगा उन बच्चों के एग्जामिनेशन रिजल्ट अच्छे आने लगे अरे जीवन में भी तो जो हमारे भीतर हीन भावना होती है हमको कितना नर्वस बनाती है बहुत पढ़ लिख गया एमए कर ली डॉक्टरेट कर ली ये कर ली हीन भावना नहीं निकली किसी बड़े आदमी के पास जाता है तो भीतर कांपता है तो कैसे सफल होगा जीवन में हीन भावना निकलनी चाहिए ना उसका नर्वसपना निकलना चाहिए ना अरे इतनी बड़ी विद्या हमारे देश के पास जो ये सारी हीन भावना निकाल के फेंक देवे सारी विकार बचपन से सिखाई जानी चाहिए ना तो देखा जिनजिन स्कूलों में बड़े उत्साह के मारे इन विपशना के सह आचार्यों ने सहायक आचार्यों ने जाकर के आनापान सिखा दिए बड़े उत्साह के मारे और उन स्कूलों के किसी अध्यापक ने साधना की नहीं। उस स्कूल के मैनेजमेंट के किसी आदमी ने साधना की नहीं। तो बच्चे बेचारे दो चार महीने तो करते रहे। फिर छोड़छाड़ दिया। कोई करता ही नहीं ना। हम क्यों करें? और जिसज स्कूल में स्कूल के टीचर भी विपशना करने वाले हो। उसके मैनेजमेंट के लोग हो और जिस परिवार में माता-पिता विपशना करने वाले हो। हम देखते हैं उन बच्चों का कैसा बड़ा कितना बड़ा उत्थान होने लगा। कितनी उन्नति होने लगी हर क्षेत्र में अध्यात्म में जहां आदमी पका के फिर तो सारे क्षेत्रों में उन्नति करता चला जाएगा अध्यात्म में कमजोर है अपने मन का मालिक नहीं है अपना मन विकारों से भरा हुआ है कैसे सुखी होगा दुखी होगा ना तो बचपन से ही ये विद्या सिखानी चाहिए हिंदू भी कर सकता है जैन भी बौद्ध भी ईसाई भी मुसलमान भी बिल्कुल सेुलर मान करके ये किसी संप्रदाय के साथ नहीं जुड़ी हुई सांस देखना है भाई और भीतर शरीर और चित्त पर क्या होने लगा इसको देखना है भाई ताकि हम विकारों से मुक्त हो जाए काम यह करना है इसमें हिंदू पना क्या कहेगा बौद्ध पना क्या कहेगा जैन पना क्या कहेगा रह रहे हिंदू अपना हिंदू को हिंदू कहते रह बौद्ध कहते रहे जैन कहते रह अपने व्रत उपवास उसी तरह मनाते रहें अपने पूजा पाठ उसी तरह करते रह अपने और कुछ जो मान्यताएं हैं दार्शनिक मान्यताएं उनको मानते रहें पर यह काम तो करें अपने मन को वश में करना सीखें अपने मन को निर्मल करना सीखें तो बच्चों में यह बात जाननी बहुत जरूरी है एक समय था भारत का कोई 2000 वर्ष पुरानी बात है। बाहर से कोई विदेशी इस देश में घूमने के लिए आया और सारे देश की यात्रा करते हुए उसने देखा कि पनघट पर जाकर के वो देखता है कि यहां की औरतें आपस में क्या बात करती हैं। तो देखता है वो लिखता है पुस्तक उसकी बाहर की। वो देखता है कि यहां की औरतें पनघट पर बात ही करती है। अरे तेरी विपसना साधना कैसी चल रही है रे? कहां तक अनुभूति हुई तुझे? कैसी अनुभूति हुई? शाम को किसी चौपाल में चले जाता है। वहां बड़े बूढ़े बैठे गप लगाते हैं। तो वहां बैठ के सुनता है उनकी बात ये क्या बात करते हैं। कहते वही बात करते हैं तेरी विपना कैसी हो रही है रे? तुझे क्या कठिनाई आ रही है विपसना में? तुझे क्या लाभ हो रहा है विपना का? अरे सारे देश में यही चर्चा और कहता है लिखता मैं जिस घर में चला जाऊं उस घर में एक दिन दो दिन मेहमान रहूं तो घर का मालिक और मालकिन ही नहीं। घर के नौकर चाकर भी दास दासी भी और घर के बच्चे भी सब सुबह शाम बैठ के विपचना करते हैं और ऐसी देश की हालत उस समय देश इतना धनवान इतनी समृद्धि को ठिकाना नहीं और इतनी शांति आज तो पश्चिम को हम इसलिए देखते हैं कि उसके पास समृद्धि है शांति नहीं है। कभी भारत को लोग इसलिए देखते थे कि उसके पास समृद्धि भी है और शांति भी दोनों बात है। तो ऐसा भारत फिर बने। ऐसा भारत बनने के लिए नई पीढ़ी को धर्म देना होगा। हिंदू धर्म नहीं बौद्ध धर्म नहीं जैन धर्म नहीं दीजिए वो अपने घरों में दीजिए लेकिन स्कूलों में हिंदू धर्म नहीं बौद्ध धर्म नहीं जैन धर्म नहीं ईसाई धर्म नहीं धर्म देना है ताकि शरीर और वाणी से कोई दुष्कर्म करना छोड़ दे उनको अपने मन को वश में करना सिखाना है और वो शुद्ध सांस के सहारे अपने मन को वश में करना सीखें। उनको अपने मन को निर्मल करना सिखाना है और अपने शरीर और चित्त को दृष्टा भाव से देखतेदे विकारों से मुक्त होना सीख जाए। बड़ी विद्या उनको प्राप्त हो गई। बहुत बड़ी आध्यात्म विद्या प्राप्त हो गई। बड़ा कल्याण हो गया। लेकिन बच्चों में यह बात फैलाने के पहले फिर एक बार कहूंगा कि जो गृहस्थ आए हैं अगर वह खुद नहीं करेंगे और चाहेंगे मेरा बच्चा तो सच बोले पर मैं तो झूठ ही बोलूंगा। मेरा बच्चा शराब नहीं पिए पर मैं तो शराब ही पूंगा। मेरा बच्चा जुआ ना खेले पर मैं तो जुआ ही खेलूंगा। तो भाई बच्चे तुम्हारे कर्म को देख के उसी तरह का कर्म करेंगे। तुम्हारी वाणी को सुनकर के उस मानने वाले नहीं। पहले स्वयं करना सीखे। भारत में यह भारत की पुरानी विद्या फिर जाग गई। धर्म

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की गंगा फिर बहने लगी। अपने जीवन के 10 दिन इस धर्म की गंगा में डुबके लगाने के लिए निकालना चाहिए। अपने बच्चों के भले के लिए ही नहीं, अपने परिवार भले के लिए जो आदमी अपना भला नहीं कर सका, वो अपने परिवार का भला नहीं कर सकेगा। वो अपने बच्चों तो पहले अपना भला करने के लिए अपने जीवन के 10 दिन देने होंगे। और फिर धीरे-धीरे परिवार के अन्य लोग भी इस गंगा में डुबकी लगाने लगेंगे। बच्चों को भी यह विद्या मिलने लगेगी। घर में बड़ी सुख शांति आने लगेगी। घर में समृद्धि भी आए। हम नहीं कहते कि परिवार कंगाल रहे। देश कंगाल हो, खूब समृद्धि हो, लेकिन उसके साथ-साथ खूब शांति हो, चित्त की निर्मलता हो, जीवन आदर्श जीवन हो। लोग हमारी ओर देखें कि ये भारतीय हैं। देखो कितना अच्छा जीवन जीते हैं। 2000 वर्ष पहले यही हालत थी भारत की। लोग भारतीयों की ओर देखते थे। कितने अच्छे जीवन जीने वाले हैं। आज कोई ऐसा नहीं देखता भारतीयों की ओर। बाहर फिरता हूं जगह-जगह तो खूब जानता हूं कि भारतीयों को कुछ है ही दृष्टि से देखते हैं। बातें बहुत करते है आध्यात्म की। इनके जीवन में अध्यात्म नहीं है। ऐसा सब जानते हैं। अपने जीवन में अध्यात्म आए। इसके लिए मेहनत करनी सीखें। परिश्रम करना सीखें। जीवन के अपने 10 दिनों का त्याग करना सीखें। बच्चों को जो विद्या सिखानी है उसे पहले खुद सीखें। खुद सीख करके स्वयं ध्यान करने लगे। बच्चों को साथ बैठा के ध्यान करने लगे। देखें बहुत बड़ा प्रभाव आना शुरू हो जाएगा। विद्यार्थियों को सिखाने के पहले जो स्कूल के टीचर हैं वो स्वयं ध्यान करने लगे। फिर बच्चों के साथ 10 मिनट बैठ के ध्यान करें। देखें कितना बड़ा फर्क आने लग गया। भारत अध्यात्म देश है। इसमें तो अध्यात्म जागना ही चाहिए। केवल बात बातों वाला अध्यात्म नहीं जागे। वो तो बहुत जाग गया। अब करने वाला अध्यात्म जागे। अध्यात्म शब्द का अर्थ यह है कि अपने भीतर की सच्चाई को स्वयं देखना को अध्यात्म कहा जाता है। तो अपने भीतर की सच्चाई को स्वयं देखना की देखने की ऐसी अनमूल विद्या भारत की ऐसी वैज्ञानिक विद्या ऐसी संप्रदाय विहीन विद्या किसी संप्रदाय में बंधने की जरूरत नहीं। किसी में कन्वर्शन होने की जरूरत नहीं। हम जो हैं वो हैं लेकिन अपने मन को निर्मल रखेंगे। अपने मन को वश में रखेंगे। अपने शरीर और वाणी से कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे अन्य प्राणियों के सुख शांति भंग हो। बस ऐसा जीवन जरा सा भी आना शुरू हुआ तो उतने धार्मिक बनने लगे। हिंदू है तो धार्मिक हो गया। मुसलमान ईसाई है कि सिख है कि बौद्ध है कि जैन है धार्मिक हो गया। ज्यादा जीवन में आने लगी। बहुत धार्मिक हो गया। पूर्ण धार्मिक हो गया। इसकी पढ़ाई अपने घरों में शुरू करें। पाठशालाओं में शुरू करें। बड़ा मंगल होगा। बड़ा कल्याण होगा। आज की इस धर्म सभा में सदगृहस्थ आए हैं, माता-पिता आए हैं और सभी माता-पिता चाहते हैं कि हमारे जीवन हमारे बच्चों का जीवन बड़ा उज्जवल हो। उनका जीवन बहुत सुख शांति से बीते। तो साथ-साथ यह भी कि हमारा जीवन भी सुख शांति से बीते। हम उनके सामने एक आदर्श रखें कि अपने मन को कैसे एकाग्र किया जा सकता है। निर्मल देख मैं भी ऐसा करती हूं। तू भी करके देख। देख मैं भी ऐसा करता हम करेंगे घंटे भर बच्चे से कराएंगे 10 ही मिनट। बहुत है। देखेंगे उसका असर आने लगा। हम नहीं करेंगे। एक मिनट भी बच्चे से कहेंगे तू तो कर 10 मिनट। होने वाला नहीं चलेगी नहीं बात। तो अच्छी तरह से धर्म को समझ करके हिंदू धर्म अलग, बौद्ध धर्म अलग, जैन धर्म अलग, ईसाई धर्म सारे अलग। लेकिन धर्म तो एक ही धर्म अलग-अलग नहीं होता। संप्रदाय अलग-अलग होते हैं। तो जो एक ही धर्म है, शरीर और वाणी से दुष्कर्म नहीं करना। यह एक ही धर्म है। मन को वश में कर लेना यह एक ही धर्म है जो सबका धर्म है। मन को निर्मल बस उस धर्म को धारण करने की इतनी सरल विद्या, इतनी वैज्ञानिक विद्या इसे आजमा के देखें। आज आए हैं। धर्म की बात सुनने के लिए आए हैं। इसका मतलब सब में धर्म का बीज है। धर्म का बीज तो है लेकिन वो विकसित नहीं हुआ। वह फूला नहीं, वह फला नहीं। अरे तो खाली बीज ही लेकर के सारा जीवन बिता देंगे। धर्म का बीज तो भीतर रहेगा। उसको विकसित नहीं होने देंगे। तो काम की बात नहीं हुई। तो जो लोग आए हैं सब में धर्म का बीज है। नहीं तो आता नहीं। आज तो संडे है ना सिनेमा जाएंगे, वीडियो खेलेंगे, देखेंगे, अमुक करेंगे, अमुक करेंगे। कोई नहीं आता। जो आए हैं इस बात का प्रमाण है। इस बात की सबूत है कि सबके बीच भीतर धर्म का बीज है। अरे भाई अब उस धर्म के बीज को विकसित करो। खूब फूले खूब फले। स्वयं भी सुख शांति भोगे। अपने परिवार में भी खूब सुख शांति आए। अड़ोस पड़ोस में सारे समाज राष्ट्र में खूब सुख शांति आए। सारे विश्व में खूब सुख शांति आए। यह भारत की अनमोल संपदा सुख शांति की संपदा है। सबका मंगल

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हो। सबका कल्याण हो। सबको सुख शांति मिले। सुख शांति। इसको कोई प्रश्न हो तो आप पूछ सकते हैं। दे दो सारे अभी दिखा अच्छा सांस को देखना कैसे अच्छा प्रश्न किया उसका कोई रूप तो होता नहीं उसकी कोई आकृति तो होती नहीं तो क्या देखें सांस को भारत की पुरानी भाषा में देखना किसको कहते थे अनुभव करने को कहते फील करने को देखना कहते थे उन दिन तो देखो माने अपना सांस फील करो सांस भीतर आ रहा है तो हमें मालूम होता देख ना और बाहर जा रहा है अपना ध्यान नाक के दरवाजे पर लगा लिया और सांस जाएगा तो नाक में से जाएगा बाई में से जाए कि दाहिने में से जाए तो पता लगेगा देखिए भीतर जा रहा है उसकी कुछ सुरहट होगी। हवा भीतर जा रही है। ऐसा मालूम होगा। ऐसे बाहर आने लगा तो मालूम होगा बाहर आ रहा है। शुरू में कठिनाई होगी। लेकिन काम करते-करते खूब मालूम होने लगेगा। 10 दिन बलाते हैं तो यही सिखाते हैं। कैसे देखो ये सिखाते हैं। बड़ा अच्छा प्रश्न किया। धर्म विवश कब होता है? जब हम विवश हो जाते हैं तो धर्म विवश हो जाता है। बेचारा हम ही अपने वश में अपने को नहीं रख सकते तो धर्म को कैसे वश में रखेंगे? धर्म तो धारण करें तो धर्म जब धारण ही नहीं कर पा रहे तो बड़ा विवश हो गया। और जिस दिन धर्म हिंदू धर्म बन जाता है विवश हो गया। बौद्ध जैन धर्म बना कि बौद्ध धर्म बना कि ईसाई धर्म विवश हो गया। हिंदू प्रधान हो गए। बौद्ध प्रधान हो गए। जैन प्रधान हो गए। मुसलमान प्रधान हो गए। धर्म बेचारा विवश हो गया। अब धर्म को बलवान बनाओ और इन संप्रदायों को जरा कम महत्व दो। भले भले। अपने सांस को देखना चाहिए। मन को स्थिर करना चाहिए। वह प्रयोग कैसे करके दिखाएं? वह प्रयोग कैसे करें? इसीलिए तो तुम्हारे जीवन के 10 दिन मांगे हमने। अपने हमें दो। तो हम बताएंगे कैसे करो। यहां तो बड़ा आसान हमने कह दिया बस आंख बंद करके देखो। सांस आता है जाता है। थोड़ी देर देखोगे फिर जी उबने लगेगा। घबराने लगोगे। क्या सांस को देखें बाबा एक बार देख लिया, दो बार देख लिया। इसको क्या देखें? बड़ा जी घबराएगा। और जब वहां आओगे जी घबराएगा तो फिर भी कहेगा बैठ कर काम कर यही कर घबराएगा एक दिन घबराएगा दो दिन घबराएगा तीन दिन में तो गंगा में बहने लगेगा धारा में बहने लगेगा मन एकदम टिकने लगेगा तो वो धर्म का जो वातावरण होता है तपोभूमि की जो व्यवस्था होती है उनके जो नियम होते हैं अनुशासन होता है उससे तप करना असंत हो जाता है इसलिए जीवन के 10 दिन देने पड़ते हैं विद्या सीखने के लिए हमेशा वहां रहने के लिए नहीं आदमी बीमार होता है तो अस्पताल जाता है अपना इलाज करने के लिए वहां रहने के लिए नहीं तो अपना इलाज करने के लिए एक बार आ जाओ 10 दिन फिर बड़े स्वस्थ हो के आओ जीवन में स्वस्थ जीवन जियो वन हैज़ टू कम अक्रॉस सिचुएशंस ऑफ टेंशन एंड वन कम अक्रॉस एकशंस व्हिच हर्ट्स समवनस फीलिंग्स। हाउ कैन दिस बी अवॉयडेड? इट कैन नॉट बी अवॉयडेड बाय दीज़ सरमंस। इट इज़ इंपॉसिबल टू अवॉयड दैट यू हैव टू गो टू द डेप्थ ऑफ़ द माइंड वेयर यू स्टार्टेड जनरेटिंग द डिफाइलमेंट व्हिच हर्ट्स द फीलिंग ऑफ़ अदर पीपल। अनलेस यू कैन गो टू द डेप्थ ऑफ़ योर माइंड। व्हाट यू कॉल अनकॉन्शियस माइंड, यू गोटमस ऑफ़ आल दिस इम्प्युरिटीज़ डीप इनसाइड, अनलेस यू टेक आउट दिस कॉम्प्लेक्सेस योर सेल्फ, यू कैन

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नेवर कम आउट ऑफ इट। मेयर सरमन्नस कैन नोट हेल्प। यू हैव टू प्रैक्टिस योरसेल्फ, यू हैव टू गो टू दैट डेप्थ एंड टेक आउट योर कॉम्प्लेक्सेस। देन यू विल फाइंड दैट यू आर नॉट हर्टिंग एनीबडी। एनी टाइप ऑफ सिचुएशन कम्स। एंड स्माइलिंग यू कैन फेस इट। यू वोंट डू एनीथिंग एट द फिजिकल लेवल और वोकल लेवल व्हिच विल हर्ट अदर बीइंग्स। बट नाउ बिकॉज़ यू कांट कंट्रोल योरसेल्फ। नाउ बिकॉज़ योर माइंड इज़ फुल ऑफ कॉम्प्लेक्सेस। यू कीप ऑन रिएक्टिंग इन द रोंग वेच मेक्स यू मिसरेबल एंड मेक्स अदर्स मिसरेबल। लर्न दिस टेक्निक। गिव 10 डेज ऑफ योर लाइफ एंड देन यू विल सी दैट ए बिगनिंग इज मेड नॉट दैट इन 10 डेज यू विल बिकम परफेक्ट बट ए बिगनिंग इज मेड एंड यू विल कम आउट इट सर्टनली विपसना हम कैसे करें और विपसना क्या है कैसे करें इसके लिए तो कहा ना 10 दिन देने होंगे हम दो चार मिनट में बता सकते हैं विपना कैसे करें पर कर नहीं पाओगे भाई किसी आदमी को 10 मिनट में बता दिया जाए कार ऐसे चलाया जाता है। ऐसे स्टार्ट कर दिया करो। फिर ऐसे गियर बदल लिया करो। फिर ऐसे व्हील चला दिया करो। ये कर लिया करो। अब चलाओ जाओ चलाओ। क्या होगा? उस आदमी का क्या होगा? लोगों का क्या होगा? तैरने वाले को कह दे कि बस पानी में कूद गए। ये हाथ ऐसे थोड़ा चलाओ। फिर वो ऐसे चलाओ। पांव को ऐसे करो। बस जाओ अब चलाओ। क्या होगा उस आदमी का? भाई ऐसी ही बात है। इससे ज्यादा खतरनाक बात है। ये केवल उपदेशों से नहीं आने वाली। 10 दिन आओ फिर खूब समझ में आएगा। विपसना माने विशेष रूप से देखना। हम भोक्ता भाव का जीवन हमेशा जीते हैं। दृष्टा भाव का जीवन कैसे जिए? बस ये विपसना सिखाएगी। हां धर्म को समझ सकते हैं। उसके बारे में सोच सकते हैं। लेकिन उसको क्यों निभा नहीं सकते? बहुत पुराना प्रश्न है भाई। यह प्रश्न तो आज नहीं सदियों से किया जाता रहा। दुर्योधन महाभारत देखते हो ना आजकल दुर्योधन पूछता है कहता है कि जाना धर्मम न चमे निवत्ति जानाम अधर्मम न चमे प्रवृत्ति खूब जानता हूं कि यह धर्म है लेकिन वैसी प्रवृत्ति नहीं होती खूब जानता हूं ये अधर्म है पर उससे निवृत्ति ही नहीं होती बेचारा पूछता ही रह गया उसको कोई जवाब देने वाला नहीं मिला विपचना सिखाने वाला होता तो सिखा देता देख इस प्रकार जो तू जानता है अधर्म है उससे ऐसे दूर हो सकता है यह धर्म है इसको ऐसे पालन कर सकता है केवल उपदेशों से नहीं होता उसके लिए मेहनत करनी होती है उसकी अपनी एक्सरसाइज होती है बॉडी को स्वस्थ रखने के लिए हम बॉडी एक्सरसाइज सीखते हैं कि नहीं हम आसन प्राणायाम जाके सीखते हैं तो हमारा शरीर स्वस्थ रहे इसे सीखते हैं ऐसे मन को स्वस्थ रखने के लिए भी भारत में कोई वैज्ञानिक एक्सरसाइजेस थी वो भूल गए उसको फिर से शुरू कर देंगे तो मन बड़ा स्वस्थ रहने लगेगा बहुत प्यार करने पर भी अगर बच्चे जिद्दी और गुस्से वाले हो तो क्या करें पहले अपने आप को देखो तुम तो जिद्दी नहीं हो ना देखो अपने आप को तुम तो गुस्से वाले नहीं हो ना अरे तुम कितने जिद्दी हो तो बच्चा जिद्दी सीखेगा ना अभी तुम कितने गुस्से वाले हो बच्चा गुस्सा ही सीखेगा ना पहले अपने आप को सुधारो फिर देखो बच्चे को सुधारना बड़ा आसान हो जाएगा बहुत आसान हो जाएगा। विपसना कहां सिखाई जाती है? 10 दिन कहां जाना पड़ता है? ये तो ये लोग बता देंगे व्यवस्था करने वाले। यहां के पास ही धर्म की गंगा है। इस विपसना की साधना का केंद्र है। वहां आकर 10 दिन सीख सकते हो। आज के जमाने में इंसान सच बोलना कैसे सीखे? जगह पर झूठ ही झूठ है। सच का प्रयोग कैसे करें? अरे जगह अंधेरा है तभी तो प्रकाश चाहिए ना। बहुत अंधेरा है। तुमने एक आदमी ने अपनी कैंडल जला ली, दिया जला लिया। थोड़ी दूर में तो प्रकाश हो गया ना। ऐसे दो आदमियों ने दिए जला लिए। दो जगह प्रकाश हो गया ना। यूं करते अंधेरा दूर होगा। सारे संसार में झूठ ही झूठ है। इसलिए हम सच करेंगे ही नहीं। सारे संसार में झूठ है। नाम क्यों करेंगे? सब जगह अंधेरा है। हम तो दीपक जलाएंगे। अरे भाई तो अंधेरे में जीवन बीत जाएगा ना। उस जीवन से बाहर ऐसे अंधेरे वाले जीवन से बाहर निकलने के लिए भीतर का दीपक जलाने की विद्या है। सांस को देखना व प्राणायाम या तो यह तो योग नहीं है। अगर नहीं है तो कैसे है? प्राणायाम के अपने लाभ होते हैं। यह एक

Segment 13 (60:00 - 65:00)

कसरत है शरीर की कि सांस को इतना गहरा खींचो और फिर उसको रोको और फिर उसको इतना धीमे से छोड़ो इससे हमारे फेफड़े मजबूत होते हैं। हमारे रक्त का शोित स्वच्छ होता है। शुद्ध होता है। उसके बहुत लाभ होते हैं। लेकिन ये जो विद्या है कि जैसा सांस आ रहा है उसी को वैसे ही देखो। उस पर नियंत्रण मत करो। कंट्रोल मत करो। यह मन की कसरत है। वह शरीर की कसरत है। मन को जो हमेशा भोगता भाव का जीवन जीता था। उसको दृष्टा भाव का जीवन जीना कैसे सिखाएं? सांस आ रहा है ना हमको अच्छा लगता है ना हमको बुरा लगता है। नदी बहती है। हम तट पर बैठे हैं और देख रहे हैं नदी बहती है। ना हमको अच्छी लगती है ना बुरी लगती है। हम तो देख रहे हैं। बह रही है वो। ऐसे सांस के प्रवाह को हम देख रहे हैं। आ रहा है। आ रहा है तो आ रहा है। जा रहा है तो जा रहा है। तो स्वभाव पलटने लगेगा। मन का वह स्वभाव जो हमेशा रिएक्ट करने वाला था, प्रतिक्रिया करने वाला था, अब वह प्रतिक्रिया से बाहर निकल कर के क्रिया में स्थापित होने लगेगा। ये बड़ा अंतर आना शुरू हो जाएगा। आगे जाके बहुत गहराई से साक्षी भाव जागेगा। दृष्टा भाव जागेगा, तटस्थ भाव जागेगा। इट कांट बी कंडक्टेड एट दिस प्लेस यस इट कैन बी कंडक्टेड हियर रिमेन विद मी फॉर 10 डेज आई विल स्टे हियर फॉर 10 डेज बट इज इट पॉसिबल दिस इज़ अ पब्लिक प्लेस ए स्कूल अनलेस द स्कूल्स ऑल एक्टिविटीज़ आर क्लोज हाउ कैन यू वर्क हियर इगतपुरी इज़ नॉट फार जस्ट थ्री आवर्स जर्नी एंड कम एंड स्टे देयर फॉर 10 डेज इन कजीनियल एटमॉस्फियर वेयर यू कैन वर्क मच बेटर। चंद्र स्वर और सूर्य स्वर क्या है? उसका सांस मन किस तरह की शांति आ सकती है। भाई चंद्र सूर्य चंद्र स्वर हो चाहे सूर्य स्वर हो। उसे देखना आ जाएगा तो देखेंगे बड़ी शांति आने। अन्यथा चाहे जैसा स्वर चलता हो हम तो उसी तरह प्रतिक्रिया करते हैं। क्रोध जगाते हैं, भय जगाते हैं। ईर्ष्या जगाते हैं। तो ना चंद्र स्वर काम आया ना सूर्य स्वर काम आया। और उसको देखना सीख गए तो दोनों काम आ गए। देखना सीखना है। क्या बच्चों को भी यह साधना सीखने के लिए 10 दिन रहना होगा? क्या बच्चों को यह साधना सिखाना आसान है? नहीं। बच्चों को 10 दिन नहीं सिखाते। आरंभ केवल सांस का काम से करते हैं और तीन दिनों का शिविर लगाते हैं। इगतपुरी में बच्चों के लिए छुट्टियों के दिनों में तीन-ती दिन के शिविर होते हैं। उसमें बच्चे आ सकते हैं और उसके बाद घर जाकर वो सांस का ही काम करेंगे। कुछ और बड़े हो जाएंगे तब उनको और गहराई से सिखाना शुरू कर देंगे। वुड यू प्लीज गिव सम आईडिया व्हाट वन हैज़ टू डू फॉर 10 डेज एंड वेयर वी हैव टू स्पेंड और गो टू अटेंड दिस 10 डेज। देयर इज अ मेडिटेशन सेंटर बाय द नेम ऑफ धम्मगिरी इन इगतपुर अबाउट 80 माइल्स फ्रॉम हियर थ्री आवर्स ड्राइव फ्रॉम हियर यू हैव टू कम देयर एंड स्टे देयर डे एंड नाइट देयर आर सर्टन कोड्स ऑफ़ डिसिप्लिन यू हैव टू अबाइड बाय ऑल दोज़ को्स नियम्स द होल एटमॉस्फियर इज़ सच दैट यू कैन मेडिटेट वेरी कामली ईजीली विदाउट डिस्टरबेंसेस फॉर द फर्स्ट थ्री डेज यू विल बी टॉट हाउ टू ऑब्ज़र्व योर नेचुरल रेस्पिरेशन फ्रॉम द फोर्थ डे ऑनवर्ड यू विल स्टार्ट ऑब्जर्विंग द रियलिटी विदिन योरसेल्फ। दैट मींस द रियलिटी ऑफ़ माइंड एंड मैटर। द इंटरकनेक्शन बिटवीन माइंड एंड मैटर? द इंटरेक्शन ऑफ़ द माइंड एंड मैटर। वन हाउ वन इन्फ्लुएंस दी अदर। हाउ वन रिएक्ट्स विथ दी अदर। दी इन इन्फ्लुएंस ऑफ़ अदर। द रिएक्शन ऑफ़ अदर दी करंट द अंडर करंट एंड हाउ यू बिकम हेजिटेड बिकॉज़ ऑफ़ ऑल दे। इफ यू स्टार्ट ऑब्ज़र्विंग इट, देन यू स्टॉप रिएक्शन। यू जस्ट ओब्ज़र्व इट एंड यू आर कमिंग आउट ऑफ दिस मेड हैबिट ऑफ़ रिएक्टिंग। एंड द लाइफ विल बी फुल ऑफ एक्शन। व्हेनवर यू रिएक्ट इट इज फुल ऑफ नेगेटिविटी। यू मेक योरसेल्फ अनहैप्पी यू मेक अदर्स अनह। व्हेन इट अ लाइफ ऑफ एक्शन इट इज़ ऑलवेज फुल ऑफ़ पॉजिटिविटी। यू रिमेन हैप्पी यू मेक अदर्स हैप्पी। इट इज़ अ वे ऑफ़ लाइफ। इट इज़ अ कॉड ऑफ़ कंडक्ट। इट इज़ एन आर्ट ऑफ लिविंग। कम फॉर 10 डेज। जस्ट थ्री आवर्स जर्नी फ्रॉम हियर एंड फॉरगेट यू आर अदर रेस्पोंसिबिलिटीज़ फॉर 10 डेज एंड यू विल लर्न दिस टेक। गुड और है रिलीजन इन पॉलिटिक्स एंड रिलीजन व्हाट इज द वे आउट फॉर द कॉमन मैन वी क्वेश्चनाइज टुडे व्हाट यू कॉल पॉलिटिक्स एंड रिलीजन धर्म एक्चुअली ली इट इज नो धर्म एज आई सेड इट

Segment 14 (65:00 - 70:00)

इज ओनली ए से हिंदू से मुस्लिम से जैन से एंड व्हेन पॉलिटिक्स गेट पोल्यूटेड बाय द सेक्टेरियन थॉट्स सेक्टेरियन बिलीव्स इट बिकम्स वेरी डेंजरस बट व्हेन द पॉलिटिक्स गेट्स धर्म प्योर धर्म वेयर दिस सेक्टेरियन बिलीफ हैज़ नथिंग टू डू दिस इज़ लॉ ऑफ़ नेचर इफ यू प्यूरिफाई योर माइंड यू विल ऑब्ज़र्व पीस एंड हार्मोनी विद इन योरसेल्फ इफ यू डिफाइल योर माइंड यू विल बिकम वेरी एजिटेटेड यू विल बी कम वेरी अनहै। दिस इज़ लॉ ऑफ़ नेचर। वेदर यू कॉल इट हिंदू और बुद्ध, बुद्धिस्ट और मुस्लिम मेक्स नो डिफरेंस। इफ पॉलिटिक्स हैज़ दिस धर्म विद इट, मोरालिटी विद इट, देन द पॉलिटिक्स विल बी अ ग्रेट बून फॉर द कंट्री। टुडे द पॉलिटिक्स हैज़ बिकम अ ग्रेट कर्स फॉर द कंट्री। बिकॉज़ इट इज़ पोल्यूटेड बाय व्हाट यू कॉल रिलजन एंड दैट इज़ नथिंग बट सेक्टेरियलिज्म। इज़ इट सेम लाइक मेडिटेशन? एंड इफ समवन इज वेरी सेंसिटिव व्हाट वन शुड डू यस पीपल कॉल इट मेडिटेशन बट एक्चुअली इट इज़ ए टेक्निक टू ऑब्जर्व द रियलिटी एज इट इज़ इन मेडिटेशन यू गॉट ओनली वन ऑब्जेक्ट एंड यू ट्राई टू कंसंट्रेट योर माइंड यू गेट योर माइंड अब सबमर्ज इन दैट ऑब्जेक्ट बट इन दिस टेक्निक यू कीप ऑन ऑब्जर्विंग थिंग्स कीप ऑन चेंजिंग विद इन द फ्रेमवर्क ऑफ द बॉडी एंड यू आर जस्ट ऑब्ज़र्विंग इट इज़ साइलेंट ऑब्जरवेशन ऑब्जेक्टिव ऑब्जरवेशन ऑफ़ द रियलिटी एज़ इट इज़ नॉट जस्ट एज इट अपीयरर्स टू बी सीम्स टू बी बट एज इट इज़ इन इट्स ट्रू नेचर इन इट्स ट्रू करैक्टरिस्टिक एंड व्हेन यू स्टार्ट ऑब्ज़र्विंग इट एज़ इट इज़ यू विल नोटिस दैट द हैबिट पैटर्न ऑफ योर माइंड इज़ चेंज चेंजिंग द बिहेवियर चेंजिंग बिकॉज़ यू रिमेन इनवॉल्व्ड विथ द रियलिटी व्हिच सीम्स टू बी सो व्हिच अपीयरर्स टू बी सो देन यू कीप ऑन रिएक्टिंग टू इट व्हेन यू अंडरस्टैंड द रियलिटी एज़ इट इज़ देन यू डोंट रिएक्ट टू इट। यू जस्ट ऑब्ज़र्व एंड दिस इज़ अ टेक्निक हाउ टू ऑब्ज़र्व द रियलिटी ऑब्जेक्टिवली। इज देयर एनी एज लिमिटेशन फॉर द चाइल्ड? कैन पर्सन कम देयर विद फैमिली एंड स्टे देर? व्हाट एज लिमिट कैन देयर बी? दोस हु प्रैक्टिस विपश्य एंड दोज हु अंडरस्टुड द वैल्यू ऑफ विपश्य द टीचिंग टू द चाइल्ड स्टार्ट्स व्हेन द चाइल्ड इज़ इन द वूम इन द वेस्ट नाउ इट हैज़ बिकम सो पॉपुलर दैट प्रेग्नेंट वूमेन कीप कमिंग टू द कोर्सेज सो दैट द चाइल्ड गेट्स दिस विपशना इवन बिफोर बर्थ द वाइब्रेशन दैट यू गिव टू द चाइल्ड इट कम्स आउट टू सच अ धम्मा बेबी सो पीसफुल सो क्वाइट सो गुड यू गिव इट एट दैट टाइम इफ यू हैव मिस्ड दैट ऑलराइट देन गिव इट बिगेन एज़ सून एज़ द चाइल्ड इज़ एबल टू अंडरस्टैंड मे बी इवन फोर ऑर फाइव इयर्स जस्ट द ब्रेथ अवेयरनेस ऑफ़ ब्रेथ 2 मिनट्स 3 मिनट्स डजंट मैटर एंड एज़ ही ग्रोस शी ग्रोस यू कीप ऑन प्रोलोंगिंग द पीरियड देयर इस नो टाइम लिमिट यू कैन स्टार्ट एट एनी टाइम। इट इज इंपॉसिबल फॉर अ हाउसवाइफ टू लीव द ड्यूटीज फॉर 10 डेज़। कैन यू प्लीज टेक दिस इन टू कंसीडरेशन एंड फाइंड अ वे आउट सर्टेनली। आई वांटेड टू डू दैट एंड आई हैव ट्राइड दैट बट आई फेल्ड मिज़रेबली। इट्स वेरी ईजी टू गिव सरम। ओह! लुक यू कांट कम फॉर 10 डेज बिकॉज़ यू सो बिज़ी। ऑलराइट सिट डाउन नाउ एंड लर्न हाउ टू ऑब्जर्व रेस्पिरेशन। लर्न, लर्न 5 मिनट्स, 10 मिनट्स। हा वंडरफुल। नाउ आई गॉट इट। एंड आफ्टर टू, थ्री, फोर डेज़, यू स्टॉप इट। बिकॉज़ यू डोंट गेट एस्टेब्लिश्ड। यू से दैट यू आर वेरी बिजी विद योर ड्यूटी? व्हाई डोंट यू टेक दिस एस अ पार्ट ऑफ द ड्यूटी? ए मदर हैज़ टू बी अ गुड मदर। ए फादर फादर। फॉर दैट द मदर हैज़ टू लर्न हाउ टू बी अ गुड मदर। दी फादर फादर। दिस इज़ द ट्रेनिंग फॉर दी मदर। फादर। अनलेस यू गेट दिस ट्रेनिंग। हाउ यू विल फुलफिल योर ड्यूटी? यू आर नॉट फुलफिलिंग योर ड्यूटी। यू सिंपली सेट आई बिजी विद माई ड्यूटी। यू आर नॉट फुलफिलिंग योर ड्यूटी प्रोपरली। लर्न दिस टेक्निक एंड यू विल फाइंड दैट यू आर फुलफिलिंग योर ड्यूटी मच बेटर। हाउ मच डोनेशन वन हैज़ टू गिव। द टाइप ऑफ मेडिटेशन आई हैव लर्न इज़ नॉट कंसंट्रेटिंग बट जस्ट क्लोज़ योर आईज एंड ऑब्ज़र्व योर थॉट्स कमिंग एंड गोइंग। सो अकॉर्डिंग टू यू, इज इट लाइक दिस? टू क्वेश्चन सेपरेटली। हाउ मच डोनेशन यू हैव टू गिव? दैट मींस व्हाट इज द प्राइस ऑफ योर धर्म? हाउ मच लेबल यू हैव पुट? व्हाट प्राइस टैग यू हैव पुट? कैन एनीबडी पे द प्राइस ऑफ़ धर्म? कैन एनीबडी चार्ज एनी मनी फॉर धर्म? देन इज़ नो धर्म। देयर

Segment 15 (70:00 - 72:00)

आर मेनी टाइप्स ऑफ थिंग्स गोइंग ऑन अराउंड द वर्ल्ड वेयर फॉर देम धर्म इज़ अ कॉमर्स। दे वांट टू मेक मनी आउट ऑफ इट। वेयरवर यू हैव टू पे एनी चार्ज फॉर धर्म। देन अंडरस्टैंड इट्स नॉट धर्म इज़ अनदर बिजनेस। बिजनेस इन द नेम ऑफ धर्म इज गोइंग ऑन। सो देयर आर नो चार्जेस। नो चार्जेस इवन फॉर यू आर बोर्डिंग एंड लॉजिंग। पीपल हु कम देयर एंड दे फाइंड दैट इट इज़ सो गुड एंड दे गेट बेनिफिटेड देन दे गिव डोनेशन फॉर द कमिंग स्टूडेंट्स नॉट फॉर देमसेल्व्स। दे लिव वि द डोनेशन ऑफ़ अदर्स एंड दे गिव डोनेशन फॉर द फ्यूचर स्टूडेंट्स। दे मे गिव दे मे नॉट गिव। नोबडी क्वेश्चंस। नोबडी इवन नोज़ जस्ट वन और टू हु प्रिपेयर दी अकाउंट्स। अदरवाइज़ अदर्स वोंट नो हु हैज़ पेड व्हाट? अदरवाइज़ इट वोंट बी धर्म। इन धर्म कमर्शियलिज्म शुड बी केप्ट फार अवे। नॉट अ ट्रेस ऑफ़ कमर्शियलिज्म शुड बी देयर। सो नो चार्ज। एंड देन यू सेड अबाउट कंसंट्रेटिंग एंड ऑब्जर्विंग योर थॉट्स। इट इज़ इजी टू से दैट यू ऑब्ज़र्व योर थॉट्स। बट विद व्हेन यू प्रैक्टिस विपश्न। यू विल फाइंड दैट यू यू यू यू नॉट ऑब्ज़र्विंग योर थॉट। यू आर रोलिंग इन टेकिंग इंटरेस्ट इन द थॉट एंड यू से यू आर ऑब्ज़र्विंग योर थॉट। व्हेन यू रियली स्टार्ट ऑब्ज़र्विंग द थॉट नॉट इवन वन सेंटेंस कैन बी कंप्लीटेड। इट विल स्टॉप। द मोमेंट यू रियली ऑब्ज़र्व दी थॉट इट विल स्टॉप। बिकॉज़ द टेक्निक इज़ लॉस्ट। सो यू कीप ऑन रोलिंग इन द थॉट एंड यू से आई एम ऑब्ज़र्विंग माय थॉट। ओह वंडरफुल। दिस टेक्निक ऑफ़ ऑब्ज़र्विंग थॉट इज़ सो गुड। इट इज़ नॉट ऑब्जरवेशन ऑफ़ थॉट। जस्ट रोलिंग इन थॉट। यू विल फाइंड द डिफरेंस व्हेन यू टेक दिस टेक्निक। प्रैक्टिस दिस टेक्निक। गुड आप सबको अपने घर जाना है ना रोटी पकानी है बच्चों के लिए भी अपने लिए भी घर वालों के लिए भी और बाकियों को सिनेमा जाना है कहीं ना कहीं जाना होगा अच्छी बात अब छुट्टी लेकिन यहां की जो आज की सभा में आए उसको बुद्धि विलास वाणी विलास बना के नहीं चले जाए आज नहीं तो कल इस महीने नहीं तो अगले महीने इस साल नहीं तो अगले साल कभी ना कभी धर्म के गंगा में डुबकी लगाने के लिए जरूर आए तो यहां आने का लाभ होगा नहीं तो सिनेमा देख के मन खुश होता है थिएटर तो चलो आज ये विपसना वाला कोई गुरु आया इसकी बात सुन के बड़ा अच्छा लगा बस मन बड़ा खुश हो गया ऐसे मन बहलाने के लिए नहीं आए जो आए खूब धर्म का लाभ उठाए सबका मंगल हो कल्याण हो स्वस्थ भक्ति हो

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